अगुनही सगुनही नही कछु भेदा…

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श्री राम

निर्गुण और सगुण मे कोई भेद नहीं
वह निर्गुण ब्रह्म ही भक्तों के प्रेम के वशीभूत हो कर अधर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए हर स्थिति और काल में भिन्न भिन्न स्वरूपों में अवतार धारण करता है


सरभंग ऋषि पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ ऋषि थे वो साधना में ब्रह्म प्राप्ति होते ही समाधि लेने जा रहे थे तभी उन्हें दिव्य आकाशवाणी हुई कि आप अभी इस देह को समाधिस्थ न करें कुछ समय बाद निर्गुण निराकार पूर्ण ब्रह्म दुष्टों का वध करने के लिए और संतो की रक्षा के लिए स्वयं श्री राम के रूप में अवंतार धारण करेंगे

उस समय वो स्वयं आप को दर्शन देंगे
इसी आकाश वाणी को सत्य मान कर सरभंग ऋषि कई वर्षों से अपने आश्रम में प्रभू श्री राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे
अत्रि अनुसुइया से भेंट करने के पश्चात विराध का वध करके प्रभू श्री राम सरभंग ऋषि के आश्रम में पधारे


प्रभू के सुखद दर्शन कर सरभंग ऋषि बोले
प्रभू मै तो बहुत पहले इस शरीर को मिटाने जा रहा था केवल आपके दर्शनों की लालसा से मैंने प्राणों को रोके रखा था


अब आपके दिव्य दर्शनों से मेरी सभी कामनाएं पूर्ण हो गई इस लिए अब इस जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा


हे कृपालू कृपया आप तब तक यहां मेरे सन्मुख खड़े रहें जब तक मैं आपके धाम को न पहुंच जाऊं


ऐसा कह कर सरभंग ऋषि ने अपनी चिता सजाई और समाधि लगा कर बैठ गए और अपने साधना से अपने शरीर में योगाग्नि प्रकट की और प्रभू के सामने बैठे बैठे अपने नश्वर शरीर को भस्म कर लिया
ऐसे परम भक्त ब्रह्मनिष्ठ संत सरभंग ऋषि को बार बार प्रणाम
जय जय श्री राम

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