परिस्थितियों से घबराए नहीं परिस्थिति से समझौता करे

hintersee mountains lake

बड़े बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए बल्कि आत्मनिर्भर होना चाहिए क्योंकि किसी की दया के भरोसे व्यक्ति ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सकता है. यूं तो जीवन में परेशानियों का आना-जाना लगा ही रहता है और कभी-कभी ऐसी परेशानियां आ जाती हैं, जब हमें दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है और उस समय हम लेते भी हैं.

परेशानियां आने पर कभी-कभी तो सहायता लेना ठीक है, लेकिन बार-बार दूसरों की सहायता से ही अपनी परेशानियों का समाधान किया जाए, यह उचित नहीं है. किसी की दया के भरोसे जीवन को नहीं चलाया जा सकता, इसलिए दूसरों पर निर्भर रहने से हमें बचना चाहिए और स्वयं पर निर्भरता बढ़ानी चाहिए और स्वयं पर भरोसा भी रखना चाहिए.

अपनी परेशानियां हमें स्वयं ही हल करने की कोशिश करनी चाहिए. यदि हमारे जीवन में बहुत सारी परेशानियां एक साथ चल रही हों तो हमें यह बात समझनी चाहिए कि सोना तपने के बाद ही चमकता है. अतः समस्याओं का सामना करने के बाद ही हममें निखार आता है. यदि हम आने वाले कल को सुखद बनाना चाहते हैं तो आने वाली समस्याओं का हमें आज ही ईमानदारी से सामना करना होगा। इसी के साथ एक बात और है।दूसरों की खुशी में अपनी खुशी देखना एक बहुत बड़ा हुनर है और जो इंसान ये हुनर सीख जाता है, वो कभी भी दुःखी नहीं होता।
जिंदगी में हमारे उठाए गए कदम मायने नहीं रखते, बल्कि,महत्व उन पदचिन्हों का होता है। जो हम पीछे छोड़कर जाते हैं! वो ही एक इंसान की पहचान होती है।
जीवन में हमेशा सुख-दुख को सम्यक भाव से ग्रहण करें।जीवन दो पहियों की गाड़ी है। सुख और दुख दो पहिए है, जिन पर जीवन चलता है। इसे ही हम धूप-छांव कहते है और इसे ही जीवन का उतार चढ़ाव। मनुष्य की मानसिकता सुख पाने की रहती है और दुख आने पर वह दुखी हो जाता है। जो दोनों में समान रहता है वह कभी दुखी नही रहता। जिस परमात्मा से हमें सुख मिलता है उसी से यदि दुख मिले और हम दुखी ना हो हम सुख दुख से ऊपर उठ जाते है। इसे एक दृष्टांत से समझें
गंगानदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था। पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे। एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा। जो आड़ा गिरा वह अड़़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़़ने दूंगा।”
वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा– रुक जा गंगा….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा! पर नदी तो बढ़़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी.. वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े़ भी वहीं पहुंचेगा, जहां लड़कर.. थककर.. हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा। वहीं दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े़ मजे से बहता चला जा रहा था। यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा। नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढ़ती जा रही थी। पर पत्ता तो आनंदित है, वह तो यही समझ रहा है ,कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है। आड़े़ पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं पहुंचेगी जहां उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का…. उसके आनंद का काल बन जाएगा।
जो पत्ता नदी से लड़़ रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है, और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार का कोई उपाय संभव नहीं है। हमारा जीवन भी उस नदी के सामान है जिसमें सुख और दुःख की तेज़ धारायें बहती रहती हैं , और जो कोई जीवन की इस धारा को आड़े़ पत्ते की तरह रोकने का प्रयास भी करता है, तो वह मूर्ख है। क्योंकि ना तो कभी जीवन किसी के लियें रुका है और ना ही रुक सकता है। वह अज्ञान में है जो आड़े़ पत्ते की तरह जीवन की इस बहती नदी में सुख की धारा को ठहराने या दुःख की धारा को जल्दी बहाने की मूर्खता पूर्ण कोशिश करता है ।
क्योंकि सुख की धारा जितने दिन बहनी है… उतने दिन तक ही बहेगी। आप उसे बढ़ा नहीं सकते, और अगर आपके जीवन में दुःख का बहाव जितने समय तक के लिए आना है वो आ कर ही रहेगा, फिर क्यों आड़े़ पत्ते की तरह इसे रोकने की फ़िज़ूल मेहनत करना।बल्कि जीवन में आने वाली हर अच्छी बुरी परिस्थितियों में खुश हो कर जीवन की बहती धारा के साथ उस सीधे पत्ते की तरह ऐसे चलते जाओ….जैसे जीवन आपको नहीं बल्कि आप जीवन को चला रहे हो। सीधे पत्ते की तरह सुख और दुःख में समता और आनन्दित होकर जीवन की धारा में मौज से बहते जाएं, और जब जीवन में ऐसी सहजता से चलना सीख गए तो फिर सुख क्या? और दुःख क्या ?
अतः जीवन में हमेशा सुख-दुख को सम्यक भाव से ग्रहण करें।



Elders always say that a person should not depend on other people but should be self-reliant because depending on someone’s kindness, a person cannot survive for long. As such, problems keep on coming and going in life and sometimes such problems come when we need the help of others and at that time we also take them.

Sometimes it is okay to take help when problems arise, but it is not appropriate to solve your problems with the help of others again and again. Life cannot be run depending on someone’s kindness, so we should avoid depending on others and increase our dependence on ourselves and also have faith in ourselves.

अपनी परेशानियां हमें स्वयं ही हल करने की कोशिश करनी चाहिए. यदि हमारे जीवन में बहुत सारी परेशानियां एक साथ चल रही हों तो हमें यह बात समझनी चाहिए कि सोना तपने के बाद ही चमकता है. अतः समस्याओं का सामना करने के बाद ही हममें निखार आता है. यदि हम आने वाले कल को सुखद बनाना चाहते हैं तो आने वाली समस्याओं का हमें आज ही ईमानदारी से सामना करना होगा। इसी के साथ एक बात और है।दूसरों की खुशी में अपनी खुशी देखना एक बहुत बड़ा हुनर है और जो इंसान ये हुनर सीख जाता है, वो कभी भी दुःखी नहीं होता। जिंदगी में हमारे उठाए गए कदम मायने नहीं रखते, बल्कि,महत्व उन पदचिन्हों का होता है। जो हम पीछे छोड़कर जाते हैं! वो ही एक इंसान की पहचान होती है। जीवन में हमेशा सुख-दुख को सम्यक भाव से ग्रहण करें।जीवन दो पहियों की गाड़ी है। सुख और दुख दो पहिए है, जिन पर जीवन चलता है। इसे ही हम धूप-छांव कहते है और इसे ही जीवन का उतार चढ़ाव। मनुष्य की मानसिकता सुख पाने की रहती है और दुख आने पर वह दुखी हो जाता है। जो दोनों में समान रहता है वह कभी दुखी नही रहता। जिस परमात्मा से हमें सुख मिलता है उसी से यदि दुख मिले और हम दुखी ना हो हम सुख दुख से ऊपर उठ जाते है। इसे एक दृष्टांत से समझें गंगानदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था। पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे। एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा। जो आड़ा गिरा वह अड़़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़़ने दूंगा।” वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा- रुक जा गंगा….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा! पर नदी तो बढ़़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी.. वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े़ भी वहीं पहुंचेगा, जहां लड़कर.. थककर.. हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा। वहीं दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े़ मजे से बहता चला जा रहा था। यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा। नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढ़ती जा रही थी। पर पत्ता तो आनंदित है, वह तो यही समझ रहा है ,कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है। आड़े़ पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं पहुंचेगी जहां उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का…. उसके आनंद का काल बन जाएगा। जो पत्ता नदी से लड़़ रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है, और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार का कोई उपाय संभव नहीं है। हमारा जीवन भी उस नदी के सामान है जिसमें सुख और दुःख की तेज़ धारायें बहती रहती हैं , और जो कोई जीवन की इस धारा को आड़े़ पत्ते की तरह रोकने का प्रयास भी करता है, तो वह मूर्ख है। क्योंकि ना तो कभी जीवन किसी के लियें रुका है और ना ही रुक सकता है। वह अज्ञान में है जो आड़े़ पत्ते की तरह जीवन की इस बहती नदी में सुख की धारा को ठहराने या दुःख की धारा को जल्दी बहाने की मूर्खता पूर्ण कोशिश करता है । क्योंकि सुख की धारा जितने दिन बहनी है… उतने दिन तक ही बहेगी। आप उसे बढ़ा नहीं सकते, और अगर आपके जीवन में दुःख का बहाव जितने समय तक के लिए आना है वो आ कर ही रहेगा, फिर क्यों आड़े़ पत्ते की तरह इसे रोकने की फ़िज़ूल मेहनत करना।बल्कि जीवन में आने वाली हर अच्छी बुरी परिस्थितियों में खुश हो कर जीवन की बहती धारा के साथ उस सीधे पत्ते की तरह ऐसे चलते जाओ….जैसे जीवन आपको नहीं बल्कि आप जीवन को चला रहे हो। सीधे पत्ते की तरह सुख और दुःख में समता और आनन्दित होकर जीवन की धारा में मौज से बहते जाएं, और जब जीवन में ऐसी सहजता से चलना सीख गए तो फिर सुख क्या? और दुःख क्या ? अतः जीवन में हमेशा सुख-दुख को सम्यक भाव से ग्रहण करें।

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