जो निराकार है वहीं साकार हैं

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जब से सृष्टि की रचना हुई तब से इस धरती पर बड़े-बड़े पंडित ज्ञानी ऋषि मुनि आए जिन्होंने परमात्मा की खोज की
उन्होंने बताया की नर ही नारायण है।
ये मनुष्य का शरीर आत्मा का घर है।आत्मा के कारण शरीर है। जो निराकार है वहीं साकार हैं।
इस बात को साधारण आदमी नहीं समझ सकता
क्योंकि
वो अज्ञानता में जी रहा है।
ये मनुष्य जन्मते ही अपने आपको देह,नाम,रूप मानने लगता है।
जबकि
इसका वास्तविक स्वरूप आनंद है।
अपने उस वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण ये जीवात्मा बन गया अपने आपको देह,नाम रूप मानने लगा
जीवात्मा नाम अज्ञानता का
इसी कारण ये अपने स्वरूप को बाहर संसार के पद पदार्थों में ढूंढता फिरता है।
इस कारण अच्छे बुरे कर्म करता‌ है।
शरीर कर्म करता दिखता है। लेकिन
शरीर कर्म नहीं करता
आत्मा की पावर, शक्ति से कर्म हो रहे हैं।
जैसे:
पंखा चलता दिखता है,पर बिजली दिखाई नहीं देती
ठीक ऐसे ही शरीर कर्म करते दिखाई देता है।पर आत्मा नहीं दिखती
लेकिन
आत्मा साक्षी, दृष्टा,अक्रिय है।
आत्मा का एक स्वभाव चेतना,
चेतना का स्वभाव चंचलता है।
जब चेतना अपने स्व स्वरूप आत्मा से अलग होती है,तब वो अपने आपमें अभाव मानती है।
अभाव क्या है?
अपने आनंद का अभाव
ये अपने स्व स्वरूप आनंद से अनभिज्ञ होकर‌
अपने उस आनंद को
चेतना,कर्म के द्वारा संसार के पद पदार्थों में ढूंढती फिरती है।
लेकिन
शरीर कर्म करता दिखता है।
आत्मा नहीं दिखती
तो फिर अच्छे बुरे कर्म का फल कोन भोगता है?
आत्मा या ये शरीर ?
हम अपने बुरे कर्म यानि पाप को धोने तीर्थों में, गंगा नदी में स्नान करने‌ जाते हैं ।
गंगा तो केवल शरीर के बाहरी मैल को ही धोती है।
चेतना को नही
आत्मा तो पहले से ही शुद्ध है।
गंगा तो चेतना को छू नहीं सकती
ये सब केवल
अज्ञानता के कारण ही दिखता है
जब तक अज्ञानता रहेगी
तब तक ये पाप पुण्य, स्वर्ग नरक है।
जीवात्मा नाम ही अज्ञान है।
अज्ञान नाम अभाव
अभाव अपने स्व स्वरूप को न जानना
इसलिए
ज्ञान होने के बाद न कोई पाप न पुण्य,न स्वर्ग न नरक ,न अच्छाई न बुराई
बस एक आत्मा अपने आपमें सत्य
जहां दूसरा कोई नहीं
जब दूसरा कोई है ही नहीं
तो क्रिया कहा सिद्ध होंगी



Ever since the creation of the universe, great scholars, wise sages came on this earth, who searched for God. He told that Nar is Narayan. This human body is the home of the soul. The reason for the soul is the body. The one who is incorporeal is corporeal there. Ordinary people can’t understand this because He is living in ignorance. As soon as this man is born, he starts considering himself as body, name and form. Whereas Its real form is bliss. Due to not knowing that real form of his, he became a soul and started considering himself as body, name and form. soul name of ignorance For this reason, it keeps searching for its form outside in the post-objects of the world. Because of this he does good and bad deeds. The body seems to be doing work. but body does not work Karma is being done with the power of the soul. As: The fan appears to be running but there is no electricity Just like this the body is seen doing work. But the soul is not visible. but The soul is the witness, the seer, the passive. Consciousness a nature of the soul, The nature of consciousness is fickle. When consciousness is separated from its self-soul, then it considers itself to be lacking. What is scarcity? lack of joy Unaware of the bliss of his own self that joy of yours Consciousness keeps searching for the position of the world in the objects through its actions. but The body seems to be doing work. no soul visible Then who bears the fruits of good and bad deeds? Soul or this body? We go to pilgrimages, to bathe in the river Ganga to wash away our bad deeds. Ganga only washes away the external dirt of the body. not to consciousness The soul is already pure. Ganga cannot touch the consciousness all this only seen only because of ignorance as long as ignorance lasts Till then this sin is virtue, heaven is hell. The very name of soul is ignorance. ignorance name absence absence not knowing one’s self that’s why After having knowledge, there is no sin, no virtue, no heaven, no hell, no good, no evil. just a soul true to itself where no one else when there is no one else then where will the action prove

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