Bhakti

[21]”श्रीचैतन्य–चरितावली

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामपिता का परलोकगमन रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातंभास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफेहा हन्त! हन्त!!

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प्रभु की कृपा

प्रहलाद ने भगवान से माँगा:- “हे प्रभु मैं यह माँगता हूँ कि मेरी माँगने की इच्छा ही ख़त्म हो जाए।”

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सत्संग 1

मित्रतापरमात्मा का वरदान हैएक खिलावट हैनिर्दोष सपनों, अहसासों, मुस्कानों की.वह निरुद्देश्य बहती ज़िंदगी की नदी है।और जो भी उसके किनारे

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