कृष्ण भगवान परमसत्य,परमात्मा ब्रह्म है

आज का प्रभु संकीर्तन।।कृष्ण एक सत्य है।जब हम कृष्ण के सत्यस्वरूप को समझने लगते है, तब हम संसार मे रहकर भी संसार में नही रह रहे होते हैं।हर पल हमारा चिंतन कृष्ण में ही लगा रहता है, फिर हमें सत्य के सिवाय कुछ भी अनुभव नहीं होता।कृष्ण परमसत्य की पराकाष्ठा है।परमसत्य का ज्ञान,परमसत्य का अनुभव हमे कृष्णभक्ति से ही प्राप्त होता है।कृष्ण भगवान परमसत्य,परमात्मा तथा ब्रह्म दोनों के उद्गम है। जब हम कृष्ण की सत्यस्वरूप में पूजा अर्चना करते हैं तब हम कृष्ण के शुद्ध रूप को अपने अंतर्मन में विराजमान होने का अनुभव करते हैं।दिव्य जगत में कृष्ण अपने भक्तो के साथ दिव्य भाव मे उसी रूप में दिखते हैं,जिस रूप की भक्त कामना करता है।कोई भक्त कृष्ण को परमस्वामी के रूप में, कोई भक्त सखा के रूप में,कोई भक्त पुत्र रूप में, कोई माता पिता के रूप में और कोई कोई कृष्ण को अपना प्रेमी ही मान लेता है।कृष्ण सभी भक्तो को समान रूप से,उनकी भक्ति व भावना के अनुसार फल देते हैं, भौतिक जगत में इसी प्रकार लेन देन की अनुभति होती है।शुद्ध भक्त यहां पर और कृष्ण के दिव्यधाम में भी कृष्ण का सानिध्य प्राप्त करते हैं।कृष्ण की सत्ता को अंशतः उनके ब्रह्म ज्योति तेज में तथा प्रत्येक वस्तु के कण कण में रहने वाले सर्वव्यापी की अनुभूति केवल उनके भक्तो को ही होती हैं।कृष्ण की अनुभति पाने के लिए, भक्त को शुद्ध आराधना के साथ,नाम जप का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए। हमे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।
“हे गोविन्द” ,
“हे करुणानिधान” ,
“हे गोपाल” ,
“हे मेरे नाथ”
आप मेरा हाथ पकड़ लो और मुझे इस भवसागर से, इस दुखरूपी भौतिक संसार से बाहर निकाल कर अपने चरणों से लगा लो।मेरे जीवन की नैय्या को पार लगा दो प्रभु, मुझे इन 84 लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति दीजिय “गोविन्द”….राधे राधे जी।जय जय श्री राधेकृष्ण जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।

Today’s Prabhu Sankirtan. Krishna is the one truth. When we start understanding the true form of Krishna, then we are not living in the world even after living in the world. Nothing is experienced except Krishna. Krishna is the height of the Supreme Truth. The knowledge of the Supreme Truth, the experience of the Supreme Truth, we get only by devotion to Krishna. Lord Krishna is the origin of both the Supreme Truth, the Supreme Soul and Brahman. When we worship Krishna in his true form, then we experience the pure form of Krishna sitting within us. In the divine world, Krishna appears in the divine form with his devotees in the same form as the devotee desires. Some devotees consider Krishna as the Supreme Lord, some devotees as friend, some devotees as son, some as parents and some consider Krishna as their lover. Krishna treats all devotees equally, They give fruits according to their devotion and sentiments, in the material world this is how transactions are experienced. Pure devotees get the company of Krishna here and also in the divine abode of Krishna. The omnipresence residing in every particle of everything is realized only by His devotees. In order to realize Krishna, a devotee should practice the name chanting continuously, with pure worship. We should pray to God.
“Hey Govinda”,
“O Karunanidhan”,
“Hey Gopal”
“O my Lord”
You take hold of my hand and take me out of this material world, out of this physical world in the form of sorrows, and touch me at your feet. Lord, cross the boat of my life, give me freedom from the affair of these 84 lakh births “Govind”…. Radhe Radhe ji. Jai Jai Shri Radhekrishna ji. May Shri Hari bless you.

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *