मनुष्य अपने शरीर से अपनी आत्मा को अलग करना जान जाय–इसी का नाम समाधि है। वास्तव में ध्यान और समाधि शरीर को आत्मा से अलग करने की एक यौगिक कला है। इस कला द्वारा मनुष्य शरीर और आत्मा अलग-अलग जान-समझ सकता है। शरीर क्या है और आत्मा क्या है ?–समाधि में इन दोनों का ज्ञान अलग-अलग होता है। दोनों की भिन्नता समझ में आती है। दोनों का महत्व समझ में आता है। समाधि में मृत्यु से जब साक्षात्कार होता है तो मनुष्य को पहली बार यह समझ में आता है कि मृत्यु के बाद भी उसका अस्तित्व पूर्ववत है।
समाधि का बस एक मात्र यही अर्थ है कि स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश करना और लौटना तो उसके अनुभव को लेकर लौटना। वास्तव में मृत्यु के बाद जो अनुभव होता है वह जीते जी समाधि से प्राप्त हो जाता है। मृत्यु और समाधि में बस इतना ही अंतर है कि मृत्यु में शरीर से आत्मा अलग हो कर पुनः शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती जबकि समाधि की अवस्था में शरीर से आत्मा जैसे निकलती है, वैसे ही शरीर में प्रवेश भी करती है।
मनुष्य की मृत्यु न जाने कितनी बार हुई है। उसका जन्म भी न जाने कितनी बार हुआ है लेकिन जन्म और मृत्यु–इन दोनों अवस्थाओं में वह मूर्छित ही रहता है। इसी कारण वह दोनों के अनुभवों से वंचित रह जाता है।
मृत्यु का अनुभव आवश्यक है। जीवन-काल में ही मृत्यु के अनुभव को प्राप्त कर लेने का अर्थ है–मृत्यु के भय से मुक्ति और मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास। जो मृत्यु के अनुभव को प्राप्त कर लेता है–वह यह समझ जाता है कि जीवन की धारा कहीं और है और वह कभी टूटती नहीं। जीवन सतत है। मृत्यु के पहले जो जीवन है वही जीवन मृत्यु के बाद भी है। मृत्यु से जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता, केवल शरीर बदल जाता है और सबकुछ पूर्ववत ही रहता है।मृत्यु के स्वरुप से परिचित होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मृत्यु को जानने-समझने और उसका अनुभव प्राप्त करने का जो मार्ग है वह है–ध्यान और समाधि। ध्यान की चरम अवस्था है समाधि। एक-न-एक दिन शरीर से आत्मा को अलग होना ही है। शरीर को छूटना ही है। समाधि में मनुष्य अपनी इच्छा से अपने शरीर से अलग होकर यह जान समझ लेता है कि मृत्यु हो गई। उसकी आत्मा उसके शरीर से अलग हो गई। मृत्यु का अर्थ इतना ही है कि अभी तक जो आत्मा शरीर के भीतर रह कर यात्रा कर रही थी अब उसमें से निकल कर किसी दूसरे शरीर द्वारा अपनी यात्रा पर निकल पड़ी है। जैसे एक यात्री किसी सवारी पर बैठ कर यात्रा करता है और बीच में उस सवारी को छोड़ कर किसी अन्य सवारी में बैठ कर आगे की यात्रा करता है। उसी प्रकार आत्मा भी अपनी अनंत यात्रा-काल में एक शरीर को छोड़ कर किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ती है।
जैसाकि पूर्व में बतलाया जा चूका है कि मनुष्य दूसरे की मृत्यु का साक्षी होता है, अपनी मृत्यु का नहीं। इसलिए कि उस समय वह बेहोश होता है, मूर्छित रहता है और वह नहीं जान पाता है कि उसके साथ कौन-सी घटना घटी ? अपनी मृत्यु की घटना से वह अपरिचित ही रह जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मनुष्य स्वेच्छा से ही मृत्यु में प्रवेश करे। मृत्यु कैसे घटित होती है ? कैसा होता है उसका अनुभव ?–इन सारी बातों को भली भाँति जान-समझ लेने के बाद ही एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है मनुष्य को और वह यह कि एक बार मृत्यु का साक्षात्कार कर लेता है तो फिर मृत्यु पर उसका अधिकार हो जाता है। फिर मृत्यु उसके लिए मृत्यु नहीं रह जाती। मृत्यु का रहस्य अनावृत हो जाता है उसके लिए और उसके लिए हो जाती है मृत्यु असत्य। तब पूर्णरूप से जीवन ही सत्य होता है उसके लिए। फिर कभी उसकी मृत्यु होती ही नहीं। जीवन की धारा में बराबर बहता जाता है वह। बस बीच- बीच में जैसे नदी में नाव बदलते हैं, वैसे ही वह भी शरीर बदलता जाता है। लेकिन शरीर बदलते समय बराबर बोध होता रहता है उसे जीवन का। वह इस बात को जानता रहता है कि एक शरीर को छोड़ रहा है और दूसरे में प्रवेश कर रहा है। पहले शरीर और दूसरे शरीर के बीच में जो अंतराल रहता है, उस अंतराल में भीे जीने का बोध रहता है उसे।मृत्यु का ज्ञान ही मृत्यु का अभाव है। इसलिए योगियों का कहना है कि–ज्ञान मुक्ति है, ज्ञान शक्ति है, ज्ञान भक्ति है, ज्ञान मोक्ष है। जिस क्षण हम मृत्यु के ज्ञान को उपलब्ध हो जाते है, उसी क्षण जिसे वास्तविक जीवन कहते हैं, उससे हमारा सम्बन्ध जुड़ जाता है।
मृत्यु के समय शरीर छूटने के साथ-साथ संसार भी छूट जाता है और संसार के साथ ही सारे नाते-रिश्ते ,सारे सम्बन्ध भी छूट जाते हैं। सब कुछ छूट जाता है। केवल बचती है हमारी चेतना। जो बात मृत्यु के समय होने वाली है, वही बात ध्यान के समय होनी चाहिए। जो मरने पर छूटने वाला है, उसे हम ध्यान के समय छोड़ दें। मन में यह भाव हो कि हम संसार के लिए मर चुके हैं, अपने लिए भी मर चुके हैं और दूसरों के लिए भी मर चुके हैं। सारे विचार, सारे भाव सब छूट गए हैं हम से। अब हम हैं ,हमारी चेतना है अर्थात् मैं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। एकांत में बैठ कर यही भाव मन में लाएं। इसका धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर यह भाव अपने आप घनीभूत होने लगेगा और पूर्णरूप से घनीभूत होने पर वह समाधि बन जायेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के भाव का घनीभूत होना ही समाधि की अवस्था है। समाधि में केवलI चेतना रह जाती है, अपना बोध रह जाता है। सांसारिक बोध सारे समाप्त हो जाते हैं, केवल रह जाता है “मैं”।
मरकत मणि जैसे अद्भुत पत्तों से सुशोभित लटकते हुए विलक्षण नवरत्नों से अलंकृत ऐसे वट वृक्ष की मूल भाग में विश्व के स्वामी भगवान महादेव शिव का ध्यान करें सफटिक और चांदी जैसा उज्जवल शरीर प्यार कर कंधों में मणि जयमाला अमृत कलश विद्या और ज्ञान मुद्रा है वक्ष में नाग यज्ञोपवीत और मस्तिष्क पर चंद्रमा है तीन नेत्र सूर्य चंद्र अग्नि है मुख पर मुस्कान है दो कमल सरसों के मध्य विराजमान हैं चंद्रमा से प्रेरित अमृत के द्वारा शरीर आर्द्र है और आदि अलंकारों से सारे संसार को मुक्त करने वाले पति की भगवान मृत्युंजय का ध्यान इस तरह करना चाहिए।
शिव का बीज मंत्र क्या होता है इसे एकाक्षरी मंत्र भी कहते हैं मृत्युंजय मंत्र का त्र्यअक्षरी मंत्र ॐ जूं सः या #हौंजूंसः भी है मृत्युंजय मंत्र बहुत ही प्रकार के रोग और पीड़ा के निवारण के लिए उपयोग होते हैं और ग्रह पीड़ा के शमन में भी शुभ होते हैं।
शिव प्रतिमा पर अलग-अलग कार्य के लिए अलग-अलग अभिषेक द्रव्यों से किए जाते हैं अभिसार प्रीत आदि दोस्त के लिए सरसों का तेल उष्ण ज्वर ने दही का अभिषेक लक्ष्मी प्राप्ति में गन्ने के रस का अभिषेक ब्लड प्रेशर मे संतरा के रस का ह्रदय पीडा मे दुर्वा के रस का अभिषेक किया जाता है अन्य अलग कामनाओं के लिए अलग द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है।
उसी तरह जिन कन्याओं के विवाह नहीं हो रहे हैं अथवा पति से झगड़ कर माता-पिता के घर पर रह रही हो उनके लिए त्रियंबक मंत्र का उपयोग किया जाता है त्रियंबक मंत्र दो प्रकार के होते हैं इसी तरह महामृत्युंजय मंत्र भी विभिन्न प्रकार के होते हैं।
सबसे प्राचीन और पौराणिक मंत्र महामृत्युंजय भी अलग ही प्रकार का होता है शिव की प्राप्ति शुन्य भाव में होती है शुन्य भाव तथस्थ भाव है जब साधक मित्र शत्रु सुख-दुख विलासिता और अविलासिता का बिस्तर और पत्थर मिट्टी और सोने के अंतर से प्रभावित नहीं होता तभी वह शिव का पूजन व साधन भजन कर सकता है।
अपने विचारों को छोड़कर भगवान शिव में तन्मय हो गंगा तटवर्ती कुंज में निवास करता हुआ मस्तिष्क पर हाथ जोड़ अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान शिव के मंत्रों का उच्चारण हूं करता हुआ मैं कब सुखी होगा देवांगनाओ के सिर मे गुँथी हुई मौलशिरी के पुष्पों की माला उससे झड़ते हुए सुगंध से परम मनोहर शोभा के धाम रात्रि में दिन में आनंद प्रदान करने वाला जो सदाशिव के शरीर का की कांति समूह है
वह हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा वृद्धि प्रदान करें जो साधक गण रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र का पाठ स्वयं करते हैं वे आन्तरिक त्रिविध पाप से मुक्त होकर अग्नि तब स्वर्ण के समान शुद्ध बन जाते हैं जो भक्त साईं काल प्रदोष काल में शिवपूजन समाप्त होने पर रावण कृत स्तोत्र का पाठ श्रद्धान्वित होकर करते हैं भगवान शिव उन्हें अंकुर संपत्ति प्रदान करते हैं इसमें कोई संशय नहीं है
मनुष्य अपने शरीर से अपनी आत्मा को अलग करना जान जाय–इसी का नाम समाधि है। वास्तव में ध्यान और समाधि शरीर को आत्मा से अलग करने की एक यौगिक कला है। इस कला द्वारा मनुष्य शरीर और आत्मा अलग-अलग जान-समझ सकता है। शरीर क्या है और आत्मा क्या है ?–समाधि में इन दोनों का ज्ञान अलग-अलग होता है। दोनों की भिन्नता समझ में आती है। दोनों का महत्व समझ में आता है। समाधि में मृत्यु से जब साक्षात्कार होता है तो मनुष्य को पहली बार यह समझ में आता है कि मृत्यु के बाद भी उसका अस्तित्व पूर्ववत है। समाधि का बस एक मात्र यही अर्थ है कि स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश करना और लौटना तो उसके अनुभव को लेकर लौटना। वास्तव में मृत्यु के बाद जो अनुभव होता है वह जीते जी समाधि से प्राप्त हो जाता है। मृत्यु और समाधि में बस इतना ही अंतर है कि मृत्यु में शरीर से आत्मा अलग हो कर पुनः शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती जबकि समाधि की अवस्था में शरीर से आत्मा जैसे निकलती है, वैसे ही शरीर में प्रवेश भी करती है। मनुष्य की मृत्यु न जाने कितनी बार हुई है। उसका जन्म भी न जाने कितनी बार हुआ है लेकिन जन्म और मृत्यु–इन दोनों अवस्थाओं में वह मूर्छित ही रहता है। इसी कारण वह दोनों के अनुभवों से वंचित रह जाता है। मृत्यु का अनुभव आवश्यक है। जीवन-काल में ही मृत्यु के अनुभव को प्राप्त कर लेने का अर्थ है–मृत्यु के भय से मुक्ति और मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास। जो मृत्यु के अनुभव को प्राप्त कर लेता है–वह यह समझ जाता है कि जीवन की धारा कहीं और है और वह कभी टूटती नहीं। जीवन सतत है। मृत्यु के पहले जो जीवन है वही जीवन मृत्यु के बाद भी है। मृत्यु से जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता, केवल शरीर बदल जाता है और सबकुछ पूर्ववत ही रहता है।मृत्यु के स्वरुप से परिचित होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मृत्यु को जानने-समझने और उसका अनुभव प्राप्त करने का जो मार्ग है वह है–ध्यान और समाधि। ध्यान की चरम अवस्था है समाधि। एक-न-एक दिन शरीर से आत्मा को अलग होना ही है। शरीर को छूटना ही है। समाधि में मनुष्य अपनी इच्छा से अपने शरीर से अलग होकर यह जान समझ लेता है कि मृत्यु हो गई। उसकी आत्मा उसके शरीर से अलग हो गई। मृत्यु का अर्थ इतना ही है कि अभी तक जो आत्मा शरीर के भीतर रह कर यात्रा कर रही थी अब उसमें से निकल कर किसी दूसरे शरीर द्वारा अपनी यात्रा पर निकल पड़ी है। जैसे एक यात्री किसी सवारी पर बैठ कर यात्रा करता है और बीच में उस सवारी को छोड़ कर किसी अन्य सवारी में बैठ कर आगे की यात्रा करता है। उसी प्रकार आत्मा भी अपनी अनंत यात्रा-काल में एक शरीर को छोड़ कर किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ती है। जैसाकि पूर्व में बतलाया जा चूका है कि मनुष्य दूसरे की मृत्यु का साक्षी होता है, अपनी मृत्यु का नहीं। इसलिए कि उस समय वह बेहोश होता है, मूर्छित रहता है और वह नहीं जान पाता है कि उसके साथ कौन-सी घटना घटी ? अपनी मृत्यु की घटना से वह अपरिचित ही रह जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मनुष्य स्वेच्छा से ही मृत्यु में प्रवेश करे। मृत्यु कैसे घटित होती है ? कैसा होता है उसका अनुभव ?–इन सारी बातों को भली भाँति जान-समझ लेने के बाद ही एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है मनुष्य को और वह यह कि एक बार मृत्यु का साक्षात्कार कर लेता है तो फिर मृत्यु पर उसका अधिकार हो जाता है। फिर मृत्यु उसके लिए मृत्यु नहीं रह जाती। मृत्यु का रहस्य अनावृत हो जाता है उसके लिए और उसके लिए हो जाती है मृत्यु असत्य। तब पूर्णरूप से जीवन ही सत्य होता है उसके लिए। फिर कभी उसकी मृत्यु होती ही नहीं। जीवन की धारा में बराबर बहता जाता है वह। बस बीच- बीच में जैसे नदी में नाव बदलते हैं, वैसे ही वह भी शरीर बदलता जाता है। लेकिन शरीर बदलते समय बराबर बोध होता रहता है उसे जीवन का। वह इस बात को जानता रहता है कि एक शरीर को छोड़ रहा है और दूसरे में प्रवेश कर रहा है। पहले शरीर और दूसरे शरीर के बीच में जो अंतराल रहता है, उस अंतराल में भीे जीने का बोध रहता है उसे।मृत्यु का ज्ञान ही मृत्यु का अभाव है। इसलिए योगियों का कहना है कि–ज्ञान मुक्ति है, ज्ञान शक्ति है, ज्ञान भक्ति है, ज्ञान मोक्ष है। जिस क्षण हम मृत्यु के ज्ञान को उपलब्ध हो जाते है, उसी क्षण जिसे वास्तविक जीवन कहते हैं, उससे हमारा सम्बन्ध जुड़ जाता है। मृत्यु के समय शरीर छूटने के साथ-साथ संसार भी छूट जाता है और संसार के साथ ही सारे नाते-रिश्ते ,सारे सम्बन्ध भी छूट जाते हैं। सब कुछ छूट जाता है। केवल बचती है हमारी चेतना। जो बात मृत्यु के समय होने वाली है, वही बात ध्यान के समय होनी चाहिए। जो मरने पर छूटने वाला है, उसे हम ध्यान के समय छोड़ दें। मन में यह भाव हो कि हम संसार के लिए मर चुके हैं, अपने लिए भी मर चुके हैं और दूसरों के लिए भी मर चुके हैं। सारे विचार, सारे भाव सब छूट गए हैं हम से। अब हम हैं ,हमारी चेतना है अर्थात् मैं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। एकांत में बैठ कर यही भाव मन में लाएं। इसका धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर यह भाव अपने आप घनीभूत होने लगेगा और पूर्णरूप से घनीभूत होने पर वह समाधि बन जायेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के भाव का घनीभूत होना ही समाधि की अवस्था है। समाधि में केवलI चेतना रह जाती है, अपना बोध रह जाता है। सांसारिक बोध सारे समाप्त हो जाते हैं, केवल रह जाता है “मैं”। मरकत मणि जैसे अद्भुत पत्तों से सुशोभित लटकते हुए विलक्षण नवरत्नों से अलंकृत ऐसे वट वृक्ष की मूल भाग में विश्व के स्वामी भगवान महादेव शिव का ध्यान करें सफटिक और चांदी जैसा उज्जवल शरीर प्यार कर कंधों में मणि जयमाला अमृत कलश विद्या और ज्ञान मुद्रा है वक्ष में नाग यज्ञोपवीत और मस्तिष्क पर चंद्रमा है तीन नेत्र सूर्य चंद्र अग्नि है मुख पर मुस्कान है दो कमल सरसों के मध्य विराजमान हैं चंद्रमा से प्रेरित अमृत के द्वारा शरीर आर्द्र है और आदि अलंकारों से सारे संसार को मुक्त करने वाले पति की भगवान मृत्युंजय का ध्यान इस तरह करना चाहिए। शिव का बीज मंत्र क्या होता है इसे एकाक्षरी मंत्र भी कहते हैं मृत्युंजय मंत्र का त्र्यअक्षरी मंत्र ॐ जूं सः या #हौंजूंसः भी है मृत्युंजय मंत्र बहुत ही प्रकार के रोग और पीड़ा के निवारण के लिए उपयोग होते हैं और ग्रह पीड़ा के शमन में भी शुभ होते हैं। शिव प्रतिमा पर अलग-अलग कार्य के लिए अलग-अलग अभिषेक द्रव्यों से किए जाते हैं अभिसार प्रीत आदि दोस्त के लिए सरसों का तेल उष्ण ज्वर ने दही का अभिषेक लक्ष्मी प्राप्ति में गन्ने के रस का अभिषेक ब्लड प्रेशर मे संतरा के रस का ह्रदय पीडा मे दुर्वा के रस का अभिषेक किया जाता है अन्य अलग कामनाओं के लिए अलग द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। उसी तरह जिन कन्याओं के विवाह नहीं हो रहे हैं अथवा पति से झगड़ कर माता-पिता के घर पर रह रही हो उनके लिए त्रियंबक मंत्र का उपयोग किया जाता है त्रियंबक मंत्र दो प्रकार के होते हैं इसी तरह महामृत्युंजय मंत्र भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। सबसे प्राचीन और पौराणिक मंत्र महामृत्युंजय भी अलग ही प्रकार का होता है शिव की प्राप्ति शुन्य भाव में होती है शुन्य भाव तथस्थ भाव है जब साधक मित्र शत्रु सुख-दुख विलासिता और अविलासिता का बिस्तर और पत्थर मिट्टी और सोने के अंतर से प्रभावित नहीं होता तभी वह शिव का पूजन व साधन भजन कर सकता है। अपने विचारों को छोड़कर भगवान शिव में तन्मय हो गंगा तटवर्ती कुंज में निवास करता हुआ मस्तिष्क पर हाथ जोड़ अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान शिव के मंत्रों का उच्चारण हूं करता हुआ मैं कब सुखी होगा देवांगनाओ के सिर मे गुँथी हुई मौलशिरी के पुष्पों की माला उससे झड़ते हुए सुगंध से परम मनोहर शोभा के धाम रात्रि में दिन में आनंद प्रदान करने वाला जो सदाशिव के शरीर का की कांति समूह है वह हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा वृद्धि प्रदान करें जो साधक गण रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र का पाठ स्वयं करते हैं वे आन्तरिक त्रिविध पाप से मुक्त होकर अग्नि तब स्वर्ण के समान शुद्ध बन जाते हैं जो भक्त साईं काल प्रदोष काल में शिवपूजन समाप्त होने पर रावण कृत स्तोत्र का पाठ श्रद्धान्वित होकर करते हैं भगवान शिव उन्हें अंकुर संपत्ति प्रदान करते हैं इसमें कोई संशय नहीं है