मृत्यु यात्रा है आत्मा चोले का नव निर्माण करती है। मृत्यु वैराग्य और अध्यात्मिकता को प्रकट करती है जीवन आनंद है तब मृत्यु सत्य का पथ है। जीवित रहते हुए मृत्यु के सत्य को स्वीकार करना चाहिए। मृत्यु होने पर राम नाम सत्य कहते हैं। राम नाम सत्य को जिवित ही खोज करे।मृत्यु क्या है मृत्यु किसकी है शरीर क्षण भंगुर है। आत्मा चेतन है आत्मा को मार नहीं सकता है आत्मा अजर अमर है। मैं फिर सोचती हूं की दिनों तक आत्म मंथन चलता रहता है। मृत्यु को कैसे जान पाऊं। शरीर मृत्यु के बाद भी पडा है। दाह संस्कार किरया से क्या हुआ। पांचो तत्व तत्व में समा गये। शरीर से प्राण शक्ति ऊर्जा चेतना चली गई परम तत्व निकल गया। हमने उसे मृत्यु कहां। परब्रम्ह परमात्मा के नाम में जो ढुब जाता है। जिन्होंने आनंद को जान लिया है परमात्मा का चिन्तन मनन ही जिसका जीवन है वहीं राम नाम सत्य को समझ पाते हैं।मौन हमें बनाता है हम मौन को कुछ समय अपनाये। आज मैं एक घंटा दो घंटे मौन रहुगा। मौन नव निर्माण करता है अध्यात्मिक चेतना की जागृति मौन में है।परमात्मा की प्रार्थना, नाम जप परमात्मा को निहारते हुए मै मर जाता है भक्त देखता है भगवान नाथ ही सब कुछ है तु नहीं है। भीतर आत्मिक शक्ति से सब कुछ होता है तेरी कोई किरया नहीं है। तु भगवान की भक्ति भी नहीं करता है भगवान के द्वारा ही सब किरयाए होती है।
भीतर प्रवेश करें। इसके पहले कि मैं कहें, ठीक से जान तो लें, यह मैं किसको कह रहे हैं। जितने भीतर जाते हैं, उतना ही मैं खोता जाता है–जितने भीतर। जितने ऊपर आते हैं, उतना मैं होता है। जितने भीतर जाते हैं, उतना मैं खोता जाता है। एक घड़ी आती है कि आप तो होते हैं और मैं बिलकुल नहीं होता। एक ऐसा बिंदु आ जाता है भीतर, जो बिलकुल ईगोलेस, बिलकुल मैं शून्य है; जहां मैं की कोई आवाज ही नहीं उठती।
उसको जान लें, तो कर्ता खो जाता है। क्योंकि उसको जान लेने के बाद मैं का भाव नहीं उठता; और मैं का भाव न उठे, तो कर्ता निर्मित नहीं होता। कर्ता के निर्माण के लिए मैं का भाव अनिवार्य है। मैं की ईंट के बिना कर्ता का भाव निर्मित नहीं होता।
ये तीनों एक अर्थ में एक ही बात हैं। चाहे जान लें कि मैं कुछ भी नहीं हूं, तो भी कर्ता गिर जाता है। जान लें कि परमात्मा सब कुछ है, तो भी कर्ता गिर जाता है। जान लें कि मैं ऐसी जगह हूं, जहां मैं है ही नहीं, तो भी कर्ता गिर जाता है। तीनों स्थितियों से कर्ता शून्य हो जाता है। भीतर कर्ता शून्य होता है, बाहर कर्म गिर जाते हैं। वह उसका ही दूसरा हिस्सा है।
दोनों तरफ से चल सकते हैं। बाहर कर्म में परमात्मा का प्रवेश हो जाता है। तब कर्ता गिर जाता है। भक्त स्वयं नहीं है तब कर्ता कैसे प्रकट हो छोड़ दें पूरी तरह अगर, तो भीतर कर्ता को न बचा सकेंगे। वह गिर जाएगा। भीतर कर्ता को विदा कर दें, तो बाहर कर्म को न बचा सकेंगे; वह खो जाएगा। कर्म-संन्यास की जो बहिर्व्याख्या है, वह कर्म-त्याग है। कर्म-संन्यास की जो अंतर्व्याख्या है, वह कर्ता-त्याग है।













