भगवदभजन ही भक्ति का महात्म्य

भाव सहित खोजइ जो प्रानी।
पाव भगति मनि सब सुख खानी।।

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा।।

अर्थ-
जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि श्री रामजी के दास श्री रामजी से भी बढ़कर हैं।

भक्ति की भावना से ही हम इस सत्य को अनुभव करते हैं, कि ईश्वर ने हमे कितना कुछ दिया है।वह हमारे प्रति कितना उदार है। इससे हमें अपनी लघुता और उसकी महानताका बोध होता है, अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण की शक्ति प्राप्त होती है ,और दूसरे जीवों के प्रति प्रेम काभाव पैदा होता है।

शास्त्रों में हमें अनेक प्रकार के भक्ति मार्गों का वर्णन मिलेगा।हमारे श्रीरूप गोस्वामी जी ने भक्ति के ६४ तरीके बताए हैं। प्रहलाद ने श्रीमद्भागवत में भगवान को प्रसन्न करने के ९ तरीके बताए हैं।

ये हैं श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन व दास्य भाव आदि। श्री चैतन्य चरितामृतमें भगवान के ही मुख से कहलाया गया है कि मैं पाँच तरह से बहुत प्रसन्न होता हूँ। ये हैं साधु-संग, नाम-कीर्तन, भगवत्-श्रवण, तीर्थ वास और श्रद्धा के साथ श्रीमूर्ति सेवा।

वे आगे कहते हैं कि इन पांचों में से यदि किसी मार्ग का अवलंबन श्रद्धा के साथ किया जाए तो वह हृदय में भगवत प्रेम उत्पन्न करेगा। इस विषय में महाप्रभु कहते हैं कि नवधा भक्ति के नौ अंगों में से किसी एक अंग का भी आचरण करने से भगवत-प्रेम की प्राप्ति हो सकती है। परन्तु इन नौ अंगों में भी श्रवण, कीर्तन व स्मरण रूप श्रेष्ठ है।

सरल भक्त-जीवन में केवल नामाश्रय ही सर्वोत्तम साधन है भगवान की प्राप्ति का। नवधा भक्ति में भी श्रीनाम के जाप और स्मरण को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

यदि निश्छलभाव से हरिनाम का कीर्तन किया जाए तो अल्प समय में ही प्रभु की कृपा प्राप्त होगी। नाम संकीर्तन करना ही भगवान् को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम तरीका है, यही सर्वोत्तम भजन है।

जिस युग में हम रह रहे हैं, इसमें तो भवसागर पार जाने का यही एक उपाय है। शास्त्र तो कहते हैं कि कलिकाल में एकमात्र हरिनाम संकीर्तन के द्वारा ही भगवान की आराधना होती है।

श्रीमद्भागवत कहता है कि कलियुग में श्रीहरिनाम- संकीर्तनयज्ञ के द्वारा ही आराधना करना शास्त्रसम्मत है। वे लोग बुद्धिमान हैं जो नाम संकीर्तन रूपी यज्ञ के द्वारा कृष्ण की आराधना करते हैं।

रामचरित मानस में भी कहा गया है कि कलियुग में भवसागर पार करने के लिए राम नाम छोड़ कर और कोई आधार नहीं है।

कलियुग समजुग आन नहीं, जो नरकर विश्वास।
गाई राम गुण गनविमल, भव तर बिनहिं प्रयास।।

पावन पर्बत बेद पुराना।
राम कथा रुचिराकर नाना।।

मर्मी सज्जन सुमति कुदारी।
ग्यान बिराग नयन उरगारी।।

अर्थ-
वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्री रामजी की नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों में सुंदर खानें हैं। संत पुरुष (उनकी इन खानों के रहस्य को जानने वाले) मर्मी हैं और सुंदर बुद्धि (खोदने वाली) कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य ये दो उनके नेत्र हैं।

जीवन में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि किसी व्यक्ति या स्थान को हमने देखा तक नहीं होता, परन्तु उनके बारे में समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में पढ़ने से हमें काफी आनंद मिलता है।

ठीक इसी प्रकार भगवद धाम, आनन्द धाम, वहाँ के वातावरण या प्रभु की लीलाओं के बारे में सुन कर हमें आनंद प्राप्त होता है, हमारा चित्त स्थिर होता है और चंचलमन भटकने से रुकता है। ये कथाएं हमारे वेद-शास्त्रों में वर्णित हैं, जिन्हें पढ़ने या सुनने से हमें भगवान के विषय में कुछ जानकारी भी प्राप्त होती है।

गोस्वामीजी कहते हैं कि आप भक्ति का कोई भी मार्ग अपनाएं, उसे श्रीनाम कीर्तन के संयोग से ही करें। इसका फल अवश्य प्राप्त होता है और शीघ्र प्राप्त होता है। सब कहते हैं कि भगवान का भजन करो…. भजनकरो! तो क्या करें हम भगवान का भजन करने के लिए?

सच्चे भक्तों के संग हरिनाम संकीर्तन करना ही सर्वोत्तम भगवद भजन है। सच्चे भक्तों के साथ मिलकर, उनके आश्रय में रहकर नाम-संकीर्तन करने से एक अद्भुत प्रसन्नता होती है, उसमें सामूहिकता होती है, व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता और उतनी प्रसन्नता अन्य किसी भी साधन से नहीं होती, इसीलिए इसे सर्वोत्तम हरिभजन माना गया है।।। जय श्रीराम जय बजरंगबली हनुमान ।।



The creature who searches with feelings. Paav Bhagti Mani, eating all the happiness.

I have more faith in God. Do more work for Ram than Ram.

Meaning- The soul who searches for Him with love finds this gem of devotion, the mine of all happiness. Oh, Lord! I believe in my mind that the servants of Shri Ramji are greater than Shri Ramji.

It is only through the feeling of devotion that we experience the truth of how much God has given us. How generous He is towards us. Through this we realize our smallness and greatness, get the power to control our desires and senses, and develop a feeling of love for other living beings.

In the scriptures we will find description of many types of paths of devotion. Our Shrirup Goswami ji has described 64 ways of devotion. Prahlad has given 9 ways to please God in Srimad Bhagwat.

These are listening, kirtan, remembrance, foot service, worship and devotion etc. In Sri Chaitanya Charitamrita it has been said from the mouth of God that I am very happy in five ways. These are company of saints, chanting of name, hearing of God, pilgrimage and service to Shrimurti with devotion.

He further says that if any of these five paths is followed with devotion, it will generate love for God in the heart. In this regard, Mahaprabhu says that by practicing any one of the nine parts of Navadha Bhakti one can attain love for God. But even among these nine organs, listening, chanting and remembering are the best.

In the life of a simple devotee, only Naamashraya is the best means to attain God. Even in Navdha Bhakti, chanting and remembering Shri Naam has been said to be the best.

If Hari Naam is chanted with sincerity then you will receive the blessings of God within a short time. Chanting the name is the best way to please God, this is the best bhajan.

In the era in which we are living, this is the only way to cross the ocean of existence. The scriptures say that in Kalikaal, God is worshiped only through Harinam Sankirtan.

Srimad Bhagwat says that in Kaliyuga, it is according to the scriptures to worship only through Sri Hari Naam-Sankirtanayagya. Those people are intelligent who worship Krishna through the yajna in the form of Naam Sankirtan.

It is also said in Ramcharit Manas that in Kaliyuga, there is no other basis except the name of Ram to cross the ocean of existence.

Kaliyug is not the same age, which is hellish belief. Gave the virtues of Ram as great, may he live without any effort.

The holy mountain Bed Purana. Ram Katha Ruchirakar Nana.

Dear gentleman Sumati Kudari. Gyan Birag Nayan Urgari.

Meaning- Vedas and Puranas are sacred mountains. There are many beautiful stories of Shri Ramji in those mountains. The saintly man (who knows the secrets of these mines) is Marmi and the beautiful mind (who digs) is the hoe. Oh, Mr. Garuda! Knowledge and renunciation are his two eyes.

It is often seen in life that we have not even seen a person or place, but reading about them in newspapers and magazines gives us a lot of pleasure.

Similarly, by hearing about Bhagavad Dham, Anand Dham, the environment there or the pastimes of the Lord, we get pleasure, our mind becomes stable and our restless mind stops from wandering. These stories are described in our Vedas and scriptures, by reading or listening to which we also get some information about God.

Goswamiji says that whatever path of devotion you adopt, do it only in conjunction with Shrinam Kirtan. Its result is definitely achieved and it is achieved quickly. Everyone says to worship God…. Sing! So what should we do to worship God?

Chanting Harinam Sankirtan with true devotees is the best Bhajan of God. Chanting Naam-Sankirtan in association with true devotees, under their shelter, gives a wonderful happiness, there is collectiveness in it, there is no personal ego and such happiness cannot be achieved through any other means, that is why it is considered to be the best Haribhajan. . Jai Shri Ram Jai Bajrangbali Hanuman.

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *