श्रीराधाचरितामृतम् – भाग 7

( श्रीराधारानी का प्राकट्य )

जय हो प्रेम की जय हो इस अनिर्वचनीय प्रेम की आहा जिसे पाकर सचमुच कुछ और पाने की इच्छा ही नही रह जाती।
जिस प्रेम से सदा के लिये कामनाएं नष्ट हो जाती हैंउस प्रेम की जय हो।
जिस प्रेम से ये जगत पावन हो जाता है ये पृथ्वी धन्य हो जाती है उस प्रेम का वर्णन कौन कर सकता है।
ईश्वर है प्रेम ?
नही ये कहना भी पूर्ण सत्य नही है प्रेम ईश्वर का भी ईश्वर है जय हो जय हो प्रेम की।
जिसकी दृष्टि में प्रेम उतर आता है उसे चारों ओर प्रेम की सृष्टि ही तो दिखाई देती है राग, द्वेष अहंकार इन सबको मिटानें में योगी एवम् ज्ञानीयों को कितनें परिश्रम करनें पड़ते हैं बारबार उस बदमाश मन को ही साधनें का असफल प्रयास ही करता रहता है साधक पर कुछ नही हो पाता मन वैसा ही है।
पर प्रेम के आते ही प्रेम के जीवन में उतरते हीराग, द्वेष ईर्श्या अहंकार सब ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे बाज़ पक्षी को आकाश में देखते ही सामान्य पक्षी कहाँ चले जाते हैं पता ही नही।

तो अपना सच में कल्याण चाहनें वालो क्यों नही प्रेम करते?
क्यों इधर उधर भटकते रहते हो क्यों प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा की अग्नि में झुलसते रहते होक्यों कभी ज्ञान मार्ग तो कभी योग मार्ग के चक्कर लगाते रहते हो प्रेम के मार्ग में क्यों नही आते कितनी शीतलता है यहाँ देखो इस प्रेम सरोवर को कितना शीतल जल है इसका क्यों नही इसमें गोता लगाते?
प्रेम प्रेम प्रेम निःश्वार्थ प्रेम के प्रचारक प्रेमाभक्ति के आचार्य जिन्होनें “शाण्डिल्य भक्ति सूत्र” की रचना कर जगत का कितना उपकार किया है ऐसे महर्षि शाण्डिल्य आज गदगद् हैं और गदगद् क्यों न हों वो जिस प्रेम की चर्चा युगों से कर रहे हैं उसी प्रेम का अवतरण आज होनें वाला है यानि प्रेम आकार लेगा।

वज्रनाभ आँखें बन्द करके बैठे हैं भूमि बरसाने की है प्रेम कथा “श्रीराधाचरित्र” को सुनते हुये वज्रनाभ को रोमांच हो रहा है उनके नेत्रों से अश्रु बहते जा रहे हैं ये हैं श्रोता ।
और कहने वाले वक्ता महर्षि शाण्डिल्यये तो थोडा ही बोलते हैं फिर इनकी वाणी ही अवरुद्ध हो जाती है आँखें चढ़ जाती हैं साँसें तेज गति से चलनें लगती हैंरोमांच के कारण शरीर में सात्विक भाव का प्राकट्य शुरू हो जाता है।

आल्हादिनी का प्राकट्य होनें को है अब – हे वज्रनाभ
इतना ही बोल पाये थे महर्षि फिर प्रेम समाधि में स्थित।
पर प्रेम की बातें मात्र सुनी नही जातीं उसे तो अनुभव किया जाता है इस बात को वज्रनाभ समझ गए हैं इसलिये वो भी बह जाते हैं डूब जाते हैं डूबते तो महर्षि ज्यादा हैं और कभी कभी चिल्ला भी उठते हैं “आगे “श्रीराधाचरित्र” को सुनना है तो हे वज्रनाभ मुझे बचाओ मुझे निकालो इस “अथाह प्रेमसागर” से नही तो हो सकता है मेरी हजारों वर्ष की समाधि लग जाये।
हाँ ये है ही ऐसा चरित्र प्रेम चरित्र
श्याम सुन्दर का प्रेम अब आकार लेकर प्रकट होनें को है
महर्षि शाण्डिल्य ने सावधान किया अपनें श्रोता वज्रनाभ को और फिर कथा सुनानें लगे।

कीर्तिरानी मैने आज एक सपना देखाबड़ा विचित्र सपना था मेरा सपना सच होता है इसलिये मैं उस सपनें के बारे में विचार कर रहा हूँ और तुम्हे बता रहा हूँ ।
उस दिन बृषभान नें अपनी पत्नी कीर्ति को अपना सपना सुनाया।
क्या सपना था आपका ? कीर्तिरानी नें पूछा ।
मैं भास्कर हूँ मैं सूर्य हूँ और मेरे सामनें सब देव खड़े हैं वो सब मुझ से कह रहे हैं चन्द्रमा के वंश में भगवान अवतार लेकर आगये पर तुम्हारे वंश में तो।
मेरी कोई स्पर्धा नही है चन्द्रमा सेपर मेरे यहाँ तो साक्षात् आद्यशक्ति, आल्हादिनी शक्ति अवतरित होनें वाली हैं मैनें कहा ।

मेरी बात को सुनकर सब चुप हो गएपर मैने देखा मेरा पुत्र शनिदेव जिसकी मेरे से कभी बनी नही वो मेरी ये बातें सुनकर मेरे पास आया और बस इतना ही पूछा उसनें कहाँ पर प्रकट होनें वालीं हैं मेरी बहन ?
मैने स्पष्ट कहा शनिदेव से , बृज में, बृहत्सानुपुर में (बरसाना)।
बस इतना सुनते ही वो वहाँ से चला गया और यहीं बरसानें में ही आकर रहने लगा और तो और इस भूमि में उसनें मणि माणिक्य सुवर्ण ये सब पृथ्वी से प्रकट कर दिए।
मैने देखा सपनें में कीर्तिरानी लोग जहाँ से धरती खोद रहे हैं वहीं से सोना रजत मणि इत्यादि प्रकट हो रहे हैं।
हे कीर्तिरानी मैं सपनें से जाग गया था ये सब देखते हुए मेरी नींद खुल गयी थी मैं तुम्हारे पास आया तो क्या देखता हूँ मैं तुम दिव्य तेज़ से आलोकित हो रही हो तुम एक प्रकाश का पुञ्ज लग रही हो और ये देखो तुम्ही देखो तुम्हारे उदर में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भास्कर ही आगये हैं कितना तेज़ है ।

कीर्तिरानी नें अपने पति बृषभान के हाथों को प्रेम से पकड़ा आराम से उठीं क्यों की अष्ट मास पूरे हो चुके थे।
ये देखिये हे स्वामिन् ऐसे फूल आपनें कभी देखे थे?
अपने ऊपर बिखरे पुष्पों को दिखानें लगीं कीर्तिरानीबृषभान ने उन पुष्पों को लियादेखा और सूँघाये तो पृथ्वी के पुष्प नही हैं।
हाँ और पता है मैने भी सपना देखा मेरा सपना भी बड़ा विलक्षण था।
कीर्तिरानी भी अपना सपना सुनाने लगीं
हे स्वामिन् मैने देखा मुझे कोई कष्ट नही हुआ है और एक बालिका मेरे गर्भ से प्रकट हो गयी है और वो कन्या इतनी सुन्दर है जैसे तपाये हुए सुवर्ण के समान उस कन्या की सब स्तुति कर रहे थे यहाँ तक कि लक्ष्मी सरस्वती महाकाली अन्य समस्त देव गण सब हाथ जोड़े खड़े थे और हे राधे जय जय राधे यही पुकार सब लगा रहे थे पर वो कन्या मुझे ही देखे जा रही थी।

“मैया“
आहा उसके मुख से मैने ये सुना बस इतना सुनते ही मेरे वक्ष से दुग्ध की धारा बह चलीवो मेरे पास आयी मेरा दुग्ध पान करनें लगीमैं क्या बताऊँ उस दृश्य को देखते ही मैं देहातीत हो गयी थी।
“शायद अब उस कन्या के जन्म का समय आगया है“
इससे ज्यादा कहने के लिये कुछ नही था बृषभान के पास।
हे कीर्ति रानी समय बीतता जा रहा हैब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया है मैं जाता हूँ यमुना स्नान करने इतना कहकर उठे बृषभान।

अरे आप ? सामनें देखा “मुखरा मैया” खड़ी थीं, ये कीर्तिरानी की माँ हैं।
कहाँ है मेरी बेटी कीर्ति ? आनन्दित होते हुए भीतर आगयीं।
“ये रहीं आपकी पुत्री“बृषभान नें बड़ा आदर किया।
सीधे जाकर मुखरा मैया नें अपनी बेटी की आँखें देखीं नाड़ी देखी उदर देखा।
फिर आँखें बन्दकर खड़ी रहीं, कुछ बुदबुदाती भी रहीं ।

“आज ही होगी लाली“
मुखरा मैया नें स्पष्ट कह दिया हे वज्रनाभ कहते हैं इनकी वाणी कभी झूठी नही होती थी।
बृषभान ने अपने आनन्द को छूपाया और बोले इतनी सुबह आप आगयीं मैया?
अरे मैने एक सपना देखा बृषभान हँसे अब सपना अपनी बेटी को सुनाओ मुझे देरी हो रही है मैं तो जाता हूँ स्नान करने के लिए इतना कहते हुये बृषभान जी चल पड़े।
आज मन बहुत प्रसन्न है भादौं का महीना हैअष्टमी तिथि है रात भर रिमझिम बारिश हुयी है वातावरण शीतल है ठण्डी ठण्डी हवा चल रही है पर हवा में सुगन्ध है चले जा रहे हैं बृषभान।
बीच बीच में ग्वाले मिल रहे हैं वो सब भी आनन्दित हैं।
एक कहता है हे भान महाराज कल शाम को मैनें गड्डा खोदा था मुझे मिट्टी की जरूरत थी तो मैने खोदा पर मैं क्या बताऊँ मुझे तो चमकते हुए पत्थर मिले मेरी पत्नी कह रही थीये हीरे हैं ये मणि हैं।
मार्ग के लोग बृषभान को अपनी अपनी बातें बताते हुए चल रहे हैं और क्यों न बताएं पृथ्वी नें रत्नों को प्रकट करना शुरू कर दिया था।

एक ग्वाला दौड़ा आया महाराज बृषभान की जय हो।
रुक गए बृषभान जी क्या हुआ कुछ कहना है?
हाँ रात में ही बिजली गिरी था मैं खेत में था डर गया जहाँ बिजली गिरी वहाँ जब मैं गया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही।
क्यों ? क्या था वहाँ ? बृषभान ने पूछा।
एक काली मूर्ति गिरी है पता नही क्या हैउस मूर्ति में से दिव्य तेज़ निकल रहा है ग्वाला बोलता गया।
कहाँ है मुझे दिखाओ बृषभान उस ग्वाले के साथ गए।

उन्हें जो लग रहा था वही था सपना पूरा हुआ था शनिदेव ही विग्रह में आगये थे ये तो ? हँसे बृषभान।
पर किसी को कुछ बताया नही और ये मणि माणिक्य सब यही प्रकट कर रहे थे बरसानें में।( “कोकिलावन” जो बरसानें के पास है वहाँ विश्व् प्रसिद्ध शनिदेव का मन्दिर भी है)
प्रणाम करके बृषभान चल दिए अब स्नान को पर आज बिलम्ब पर बिलम्ब हुआ जा रहा है स्नान नित्य करते थे ब्रह्म मुहूर्त में पर आज तो सूर्योदय भी होनें वाला है।
पर क्या करें लोग मिल रहे हैं बातें करते हैं तो उनकी बातों का उत्तर देना , ये कर्तव्य है गाँव के मुखिया का।
जैसे तैसे पहुँचे यमुना जी में।

आहा आज यमुना भी आनन्दित हैं कितनी स्वच्छ और निर्मल हो गयी हैं किनारों में कमल खिले हैं उन कमलों में भौरों का गुँजार हो रहा है।
स्नान करके बाहर आये बृषभान और फिर नित्य की तरह ध्यान करनें बैठ गए आज मन शान्त है आज मन अत्यन्त प्रसन्न हैं आज मन आनन्दातिरेक के कारण झूम रहा है।

ये क्या यमुना के किनारे एक दिव्य कमल खिला है बहुत बड़ा कमल है ये तो उसके आस पास कई कमल हैं उन कमल के पराग उड़ रहे हैं सुगन्ध फ़ैल रही है वातावरण में।
तभी उस मध्य कमल में बिजली सी चमकी।
और देखते ही देखते एक सुन्दर सी कन्या खिलखिलाती हुयी उसमें प्रकट हुयीं।
उस कन्या के प्रकट होते ही आकाश में देवों ने पुष्प बरसाने शुरू कर दिए।
सब देवियों ने एक स्वर में गाना शुरू कर दिया।

अरे महाराज उठिये उठिये पता है मध्यान्ह का समय हो गया है आप अभी तक ध्यान में बैठे हैं?
एक ग्वाले नें आकर बड़े संकोच पूर्वक उठा दिया बृषभान को।
उस आनन्द से बाहर आना पड़ा बृषभान को उठे चौंके सूर्य नारायण को देखकर सच में मध्यान्ह का समय हो गया था।
इधर उधर देखा उस कमल को खोजा पर ध्यान में ये सब घटा था धीरे धीरे उसी आनन्द की खुमारी में बढ़ते जा रहे थे अपनें महल की ओर बृषभान जी।

महाराज महाराज एक दासी दौड़ी।
बाबा बाबा एक महल का सेवक दौड़ा।
श्रीदामा दौड़े, ये दो वर्ष के हो गए हैं।
बाबा बाबा कहते हुए ये दौड़े ।
बृषभान समझ नही पा रहे हैं कि महल में ऐसा क्या हुआ ?
दौड़े वो भी महल की ओर

और जैसे ही कीर्तिरानी के महल में गए।
कीर्तिरानी लेटी हुयी हैंउनके बगल में एक सुन्दर अति सुन्दर कन्या खेल रही है गौर वर्णी कमल की सुगन्ध उस कन्या के देह से निकल रही थी।
नेत्रों से अश्रु बह चले बृषभान के आनन्दाश्रु ।
बाहर आये भीड़ लग चुकी है लोगों की समझ में नही आरहा कि क्या करूँ?

मुखरा मैया दीपों की कई थाल अपनें सिर में सजाकर आज नाच रही हैं।
लोगों ने गाना नाचना शुरू कर दिया है।
बधाई हो बधाई हो बधाई हो।
“देन बधाई चलो आली, भानु घर प्रकटी हैं लाली“
सुन्दर सुन्दर सखियाँ बधाई लेकर चलीं भानु के महल की ओर।
महर्षि शाण्डिल्य उस आनंदातिरेक में मौन हो गए क्या बोलें?
क्रमश:

(पूजनीय हरिशरण जी)



(Appearance of Sri Radharani)

Hail to love, Hail to this indescribable love, after attaining which one really has no desire to get anything else. Long live the love by which desires are destroyed forever. Who can describe the love by which this world becomes pure and this earth becomes blessed? God is love? No, saying this is not the complete truth, love is God’s God too, Jai Jai Jai love. In whose eyes love comes, he sees only the creation of love all around. How much hard work the yogis and knowledgeable people have to do to eradicate attachment, hatred and ego. The seeker keeps making unsuccessful attempts to defeat that rogue mind again and again. But nothing can be done, the mind remains the same. But as soon as love comes in the life of love, all the anger, hatred, jealousy and ego disappear just as normal birds go as soon as they see a hawk in the sky.

So why don’t those who truly want your welfare love you? Why do you keep wandering here and there? Why do you keep burning in the fire of competition and ambition? Why do you keep circling the path of knowledge and sometimes the path of Yoga? Why do you not come to the path of love? Look at how coolness is there in this lake of love. Why this water is so cool? No, let’s dive into it? Maharishi Shandilya, the preacher of love, love, selfless love, the teacher of devotion, who has done so much good to the world by writing “Shandilya Bhakti Sutra”, such Maharishi Shandilya is happy today and why should he not be happy, he is the incarnation of the same love which he has been talking about for ages. It is going to happen today i.e. love will take shape.

Vajranabha is sitting with his eyes closed. It is the love story of raining the land. Vajranabha is feeling thrilled while listening to the love story “Shri Radhacharitra”. Tears are flowing from his eyes. These are the listeners. And the speaker, Maharishi Shandilya, speaks only a little, then his speech gets blocked, eyes get watery, breathing starts moving at a faster pace, due to excitement, satvik feeling starts appearing in the body.

Now Alhadini is about to appear – Hey Vajranabh Maharishi could only say this much and then remained in love samadhi. But the words of love are not just heard, it has to be experienced. Vajranabh has understood this, that is why they also get carried away and drown. When they are drowning, there are more Maharishis and sometimes they even shout, “Further, we have to listen to ‘Shri Radha Charitra’.” So O Vajranabh, save me, take me out of this “Immeasurable Ocean of Love”, otherwise I may end up in samadhi for thousands of years. yes this is such a character love character Shyam Sundar’s love is now about to take shape and manifest. Maharishi Shandilya cautioned his listener Vajranabh and then started narrating the story.

Kirtirani, I saw a dream today, it was a very strange dream, my dream comes true, that is why I am thinking about that dream and telling you. That day Brishbhan narrated his dream to his wife Kirti. What was your dream? Kirtirani asked. I am Bhaskar, I am the Sun and all the gods are standing in front of me. They all are telling me that God came in incarnation in the lineage of the Moon but in your lineage. I have no competition with the Moon, but the real Aadya Shakti, Alhadini Shakti is going to incarnate here, I said.

Everyone became silent after listening to me, but I saw that my son Shanidev, who never got along with me, came to me after hearing these words of mine and just asked, where is my sister going to appear? I clearly said to Shanidev, in Brij, in Brihatsanupur (Barsana). As soon as he heard this, he left from there and started living here in the rainy season and in this land, he revealed all the gems, rubies and gold from the earth. I saw in my dreams that gold, silver, gems etc. were appearing from where Kirtirani people were digging the earth. O Kirtirani, I had woken up from my dreams after seeing all this. I woke up when I came to you, what do I see, you are shining with divine radiance, you are looking like a beam of light and look at this, look at your stomach. It seems that Bhaskar has come, he is so fast.

Kirtirani held the hands of her husband Brishabhan lovingly and woke up comfortably because the eight months had completed. Look at this, O Swami, have you ever seen such flowers? Kirtirani Brishabhan started showing the flowers scattered over her. When she looked at them and smelled them, they were not the flowers of the earth. Yes and you know I also dreamed, my dream was also very strange. Kirtirani also started narrating her dream O Lord, I saw that I have not suffered any pain and a girl has appeared from my womb and that girl is so beautiful as if heated gold. Everyone was praising that girl, even Lakshmi, Saraswati, Mahakali and all the other gods. Everyone was standing with folded hands and everyone was shouting ‘O Radhe Jai Jai Radhe’ but the girl was looking at me only.

“Maiya” Aha, I heard this from her mouth, just hearing this, a stream of milk flowed from my breast, she came near me and started drinking my milk, what can I say, I was transformed after seeing that scene. “Maybe now the time has come for the birth of that girl.” Brishbhan had nothing more to say than this. Hey Queen Kirti, time is passing, it is time for Brahmamuhurta, I am going to take bath in Yamuna. Saying this, Brishbhan got up.

Hey you ? Saw “Mukhra Maiya” standing in front, she is Kirtirani’s mother. Where is my daughter Kirti? She came inside happily. “Here is your daughter.” Brishbhan showed great respect. Mukhara mother went straight and looked at her daughter’s eyes, looked at her pulse and looked at her stomach. Then she stood with her eyes closed and muttered something.

“There will be redness today itself.” Mukhra Maiya has clearly said that Vajranabh says that her words were never false. Brishabhan hid his joy and said, “Mother, why did you come so early in the morning?” Hey, I saw a dream. Brishbhan laughed. Now tell the dream to your daughter. I am getting late, I am going to take a bath. Saying this, Brishbhan ji left. Today I am very happy, it is the month of Bhadaun, it is Ashtami Tithi, it has rained heavily throughout the night, the atmosphere is cool, a cool breeze is blowing but there is a fragrance in the air, Brishabhan is leaving. The cowherds are meeting in between, they all are also happy. One says, O Lord Maharaj, I dug a pit yesterday evening. I needed soil, so I dug, but what can I say, I found shining stones. My wife was saying that these are diamonds, these are gems. People on the road were telling their stories to Brishabhan and why not, the earth had started revealing gems.

A cowherd came running and hailed Maharaj Brishabhan. Brishbhan ji stopped, what happened, do you want to say something? Yes, lightning had struck in the night itself. I was in the field and got scared. When I went to the place where lightning struck, I was surprised. Why ? What was there? Brishabhan asked. A black statue has fallen, I don’t know what it is, divine light is coming out from that statue, the cowherd kept speaking. Show me where it is. Brishbhan went with that cowherd.

What they were feeling was that the dream had been fulfilled, it was Shanidev himself who had come in the form of idol. Laughed Brishbhan. But he did not tell anything to anyone and all these gems and rubies were being revealed in Barsane. (“Kokilavan” which is near Barsane, there is also the world famous Shanidev temple) After paying obeisance, Brishabhan now left for the bath but today it is getting delayed more and more. We used to take bath daily during Brahma Muhurta but today the sunrise is also going to happen. But what to do, if people are meeting and talking, then it is the duty of the village head to answer their words. Somehow we reached Yamuna.

Aha, today Yamuna is also happy, it has become so clean and pure, lotuses are blooming on the banks, bees are humming in those lotuses. Brishbhan came out after taking bath and then sat down to meditate as usual. Today the mind is calm, today the mind is very happy, today the mind is dancing due to excessive joy.

Is this a divine lotus blooming on the banks of Yamuna? It is a very big lotus. There are many lotuses around it. The pollen of those lotuses is flying and the fragrance is spreading in the atmosphere. Just then there was a flash of lightning in that middle lotus. And within no time a beautiful girl appeared in it, smiling. As soon as that girl appeared, the gods started showering flowers in the sky. All the ladies started singing in unison.

Hey Maharaj, get up, do you know it is already mid-day, are you still sitting in meditation? A cowherd came and lifted Brishabhan very hesitantly. Brishbhan had to come out of that joy and got startled after seeing Surya Narayan. It was actually mid-day time. Looked here and there, searching for that lotus, but all this happened in my mind. Slowly, in the intoxication of the same joy, Brishbhan ji was moving towards his palace.

Maharaj Maharaj, a maid ran. Baba Baba, a palace servant ran. Shridama ran, he is two years old. They ran saying Baba Baba. Brishbhan is unable to understand what happened in the palace? They also ran towards the palace

And as soon as they went to Kirtirani’s palace. Kirtirani is lying down, a very beautiful girl is playing next to her, the fragrance of a light colored lotus was emanating from the body of that girl. Tears of joy flowed from Brishabhan’s eyes. A crowd has gathered outside and people are not able to understand what to do.

Mukhra Maaya is dancing today with many plates of lamps decorated on her head. People have started singing and dancing. Congratulations, congratulations, congratulations. “Come on, congratulations, Bhanu, Lali has appeared at home.” Beautiful friends went towards Bhanu’s palace with congratulations. Maharishi Shandilya became silent in that ecstasy, what should I say? respectively

(Respected Harisharan ji)

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