[19]हनुमान जी की आत्मकथा

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( रावण और माँ वैदेही का सम्वाद – हनुमान )

तेहि अवसर रावण तहँ आवा…
(रामचरितमानस)

पता नही आज क्यों अयोध्या के उस उद्यान में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी… सन्ध्या का समय बीत चुका था… सूर्य अस्त हो गए थे… निशिनाथ उदित होकर समस्त जगत को शीतलता प्रदान कर रहे थे… पर हनुमान जी अपनी आत्मकथा इतना डूब कर सुना रहे थे कि किसी को वहाँ समय का भान ही नही था…।

शत्रुघ्न कुमार देह भान भूल कर सुन रहे थे… महामन्त्री सुमन्त्र उस जगत में ही पहुँच गए थे । अपनी बात रखने की शैली… या किसी घटना को सुनाने की शैली – हनुमान जी की इतनी अद्भुत है कि कोई भी सुने तो उसे यही लगता कि हम उसी जगत में पहुँच गए हैं ।

भरत भैया ! तभी अशोक वाटिका में दशानन रावण आ गया ।

संग में मन्दोदरी थी… और अन्य दास-दासियाँ भी थीं ।

हनुमान जी जब किसी घटना को सुनाते हैं… तो उसकी धारा टूटने नही देते हैं और सुनाते समय स्वयं भी उतार चढ़ाव के साथ इस ढंग से उस चरित्र वर्णन करते हैं… कि सामने वाले को लगता है… हम सुन नही रहे… देख रहे हैं ।

अद्भुत वक्ता हैं हनुमान जी ।

जैसे ही रावण को अपने समीप आते हुए माँ मैथिली ने देखा तो अपनी जंघा से अपने उदर को ढँक लिया… भुजाओं से अपने वक्ष… माँ सिकुड़ गयी थीं… भरत भैया ! उस दृश्य को देखकर मेरा हृदय चीत्कार कर उठा था… मुझे मेरे स्वामी की आज्ञा होती तो मैं अभी दशानन का सिर काट कर अपने पैरों से उस सिर को प्रभु श्री राम के चरणों में पहुँचा देता पर… !

माँ ने अपने दोनों घुटनों को अपनी भुजाओं से घेरा हुआ था…

अपना सिर नीचे किये हुए रो रही थीं मेरी माँ…

भरत भैया ! रोते हुए मेरी माँ भय से काँप भी रही थीं…

वे उलझे केश अत्यंत दुबला शरीर… ऐसी दिख रही थीं जैसे- वृक्ष से अलग कोई शाखा सूखती जा रही हो ।

हनुमान जी जब ये वर्णन कर रहे थे तो उनका मुख मण्डल भी लाल हो गया था… फिर नेत्र बह चले थे… भरत जी भी अपने आँसू पोंछते हुए दिखे… शत्रुघ्न कुमार के अधर क्रोध से काँप रहे थे…।

भरत भैया ! मैं तो निकट ही था ना माँ के… क्यों कि मैं तो अशोक वृक्ष के ऊपर ही था… वहाँ से मुझे सब दिखाई दे रहा था और सबकी आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी ।

माँ के ओष्ठ धीरे-धीरे हिल रहे थे मैंने बहुत बार सोचा कि ये कह क्या रही हैं… पर रावण जब माँ के निकट आया… तब उनकी वो ध्वनि बाहर प्रकट हुयी थी… वे “राम राम राम”… निरन्तर यही जपती जा रही थीं ।


हे सुन्दरी ! मैंने तुम्हें जनकपुर के स्वयंवर में ही देखा था…

तुम्हें याद हो या न हो… पर मुझे तुम्हारा ये रूप सौन्दर्य, तुम्हें अपनी लंका की महारानी बनाने के लिए बाध्य करता रहता है… मैं क्या करूँ ?

हे विश्व सुन्दरी सीते ! मैं गया था उस धनुष यज्ञ में… जनकपुर के धनुष यज्ञ में… जो तुम्हारे पिता जनक ने आयोजन किया था…

बड़े-बड़े राजा नही तोड़ पाये थे उस धनुष को…

धनुष साधारण नही था मेरे आराध्य का धनुष था…

पर मैंने भी मूर्खता की… भला अपने इष्ट के आयुध को कोई तोड़ने का प्रयास करता है !… ये मेरी भारी भूल थी… और उसकी सजा मुझे दी मेरे इष्ट महादेव ने ।

धनुष उठाने की कोशिश करते समय… धनुष में मेरी ऊँगली दब गयी थी ।

आह ! मैं कराह उठा था…

सब राजाओं ने प्रयास किया पर किसी से धनुष नही उठा… और मेरा दर्द बढ़ता जा रहा था… मेरी ऊँगली जो दबी हुयी थी ।

तब राजा जनक ने आज्ञा देकर तुम्हें बुलाने के लिए कहा…

तुम आयीं… और तुमने आकर… ऐसे उस धनुष को उठा लिया… जैसे कोई बालक अपनी गेंद को उठा लेता है ।

उस समय मैंने तुम्हें देखा था… ओह ! कितना अद्भुत सौंदर्य !

मेरे पास भी सुन्दरता की कमी नही है सीते !… देखो ! ये मेरी महारानी है… मन्दोदरी… पर तुम्हारे आगे ये भी कुछ नही है ।

मैं उस समय लौट तो आया जनकपुर से अपने देश लंका में… पर तुम्हें भूल नही पाया था ।

बोलो ! तुम जो कहोगी ये दशानन वही करेगा…

ये मन्दोदरी जैसों को मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा… इस लंका के वैभव की तुम सम्राज्ञी बनोगी… बोलो

बोलो ! हे सीते !

भरत भैया ! मैं देख रहा था ऊपर से… माता सीता ने उस समय एक तिनके को उठा लिया था और उस तिनके को दशानन की ओर करके अपने नेत्रों को एक टक पृथ्वी की ओर ही देखे जा रही थीं ।

नही ऐसे मत करो… एक बार मेरी ओर देखो… एक बार !

रावण तड़फ़ उठा था ।


रावण ! तू मेरे लिए इस तिनके के बराबर भी नही है…

माँ मैथिली की आवाज गूँजी उस अशोक वाटिका में ।

रावण स्तब्ध हो गया था मन्दोदरी आदि सब चौंक गए थे ।

रावण ! तू अपने आपको वीर समझता है अरे ! तू अगर वीर होता तो चोर की तरह मुझे यहाँ उठाकर नही लाता तू अपने को वीर कहता है… तू इस विश्व का सबसे बड़ा कायर है…।

हनुमान जी ने कहा… भरत भैया ! मुझे बहुत आनन्द आ रहा था अब… जब मेरी माँ मैथिली रावण को जबाब दे रही थीं ।

रावण ! तुझे शर्म नही आती… मैंने देखा है तुझे पंचवटी में कैसे सन्यासी के भेष में छुप कर आया था तू… अरे ! आज इन नारियों के सामने तू डींगें हाँक रहा है… इनको बता रहा होगा ना कि तू कितना बड़ा शक्तिशाली है… एक अबला को चुराकर ले आया… और अपने आपको वीर कह रहा है तू… धिक्कार है तुझे !… छी !…

मुझे याद है रावण ! जब तू आया था मेरा अपहरण करने तब हवा भी चलती थी तो तू काँप रहा था किसी वृक्ष से पत्ते भी गिरते थे तो तू काँप जाता था… अब यहाँ अपने वीरता का ढोंग दिखा रहा है… ।

भरत भैया ! जब माँ मैथिली ये सब बोल रही थीं तब क्रोध और भय दोनों से उनका वो दुबला पतला शरीर कंपित हो रहा था ।

क्रोध के कारण उनके ओष्ठ सूख गए थे… उनका मुख मण्डल रक्तिम हो गया था… ।

और क्या कहा तूने रावण ! लंका का वैभव मुझे दिखा रहा है… मन्दोदरी को दासी बना दूँगा तुझे लंका की महारानी बनाऊँगा !

अरे ! तेरे लंका में जितना वैभव है… उतना तो मेरे पिता जनक महाराज के राज्य के एक जनपद में है… मेरे मायके में ।… मेरे श्वसुर के गृह में… इतना वैभव है पर मैं उस अयोध्या के वैभव को ठुकराकर… अपने “प्राणधन” के साथ में चल दी थी…।

रावण ! मुझे लालच देने की दृष्टता करता है तू…!

ये सीता है… सीता… अयोध्या के वैभव को ठुकराकर अपने स्वामी के साथ स्वेच्छा से वन आई थी… ।

हट्ट ! रावण !… तूने केवल भोगों में लिप्त… वैभव के लिए कुछ भी करने वाली सुन्दरी राक्षसियाँ देखी होंगी… पर आज तक किसी सती नारी से तेरा पाला नही पड़ा था… आज पड़ा है… अब देख ! तेरा चन्द्रहास तलवार शक्तिशाली है या इस सती सीता का ये तृण !

हट्ट ! चला अपना तलवार… देखती हूँ मैं… तेरा तलवार क्या कर लेगा मेरा पर… सावधान रावण !… ये मेरे हाथ का तिनका अगर तेरी लंका में मैंने फेंक दिया ना…

रावण क्रोध में भर गया अपना तलवार उठाया और मारने के लिए जैसे ही दौड़ा मन्दोदरी ने रोक लिया ।

महाराज ! अपने साथ इस राक्षस वंश को निर्मूल मत करो…

लंका का विनाश देख रही हूँ मैं… मन्दोदरी ने कहा ।

शेष चर्चा कल…

” तृण धर ओट कहती वैदेही “



(Dialogue of Ravana and Mother Vaidehi – Hanuman)

That’s the occasion Ravan came there… (Ramcharitmanas)

Don’t know why the crowd was increasing in that garden of Ayodhya today… Evening time had passed… Sun had set… Nishinath was rising and providing coolness to the whole world… But Hanuman ji listened to his autobiography with so much depth. No one was aware of the time there.

Shatrughan Kumar was listening forgetting his body consciousness… General Secretary Sumantra had reached that world itself. Hanuman ji’s style of speaking… or narrating an incident is so wonderful that if anyone listens, he would feel that he has reached the same world.

Brother Bharat! That’s why Dashanan Ravana came in Ashok Vatika.

Mandodari was in the company… and there were other maids and servants too.

When Hanuman ji narrates an incident… he does not let its stream break and while narrating, he himself describes that character with ups and downs in such a manner… that the person in front feels… we are not listening… we are watching.

Hanuman ji is a wonderful speaker.

As soon as mother Maithili saw Ravana coming near her, she covered her belly with her thigh… her chest with her arms… Mother had shrunk… Bharat Bhaiya! Seeing that scene, my heart was crying… If I had the permission of my lord, I would have cut off Dashanan’s head right now and handed that head to the feet of Lord Shri Ram, but…!

Mother wrapped her arms around both her knees…

My mother was crying with her head down.

Brother Bharat! While crying, my mother was also trembling with fear.

Those matted hair, extremely lean body… were looking as if a branch apart from the tree was drying up.

When Hanuman ji was narrating this, his face also turned red… then his eyes started flowing… Bharat ji was also seen wiping his tears… Shatrughan Kumar’s lips were trembling with anger….

Brother Bharat! I was very close to mother… because I was on the top of the Ashoka tree… I could see everything from there and everyone’s voice was also heard clearly.

Mother’s lips were moving slowly, I thought many times what she was saying… but when Ravana came near mother… then that sound of hers appeared outside… she was continuously chanting “Ram Ram Ram”… .

Hey babe ! I had seen you in the Swayamvar of Janakpur itself…

You may or may not remember… But this beauty of yours keeps forcing me to make you the queen of my Lanka… What should I do?

Hey world beauty Site! I had gone to that Dhanush Yagya… in the Dhanush Yagya of Janakpur… which was organized by your father Janak…

Big kings could not break that bow…

The bow was not ordinary, it was the bow of my beloved…

But I also did stupidity… Well someone tries to break the weapon of his favorite!… This was my big mistake… and my favorite Mahadev punished me for it.

While trying to lift the bow… my finger got stuck in the bow.

Ahh ! I moaned…

All the kings tried but no one lifted the bow… and my pain was increasing… my finger which was stuck.

Then King Janak ordered to call you…

You came… and you came… lifted that bow… like a child lifts his ball.

That time I saw you… Oh! What a wonderful beauty!

I don’t have any dearth of beauty either! See! This is my queen… Mandodari… But even this is nothing in front of you.

At that time I returned from Janakpur to my country Lanka… but I could not forget you.

Say ! This Dashanan will do whatever you say…

I will make people like this Mandodari your maid… You will become the queen of the splendor of this Lanka… Speak up

Say ! Hey Sita!

Brother Bharat! I was watching from above… Mother Sita had picked up a straw at that time and by turning that straw towards Dashanan, her eyes were looking towards the earth.

No don’t do like this… look at me once… once!

Ravan was in agony.

Ravana ! You are not even equal to this straw for me.

Mother Maithili’s voice echoed in that Ashok Vatika.

Ravana was stunned, Mandodari etc. were all shocked.

Ravana ! You consider yourself a hero! If you were a hero, you would not have picked me up like a thief and brought me here. You call yourself a hero… You are the biggest coward of this world….

Hanuman ji said… Brother Bharat! I was feeling very happy now… when my mother Maithili was replying to Ravana.

Ravana ! You don’t feel ashamed… I have seen how you came hiding in Panchavati disguised as a monk… Hey! Today you are bragging in front of these women… you must be telling them that you are very powerful… you have stolen a weak person… and you are calling yourself a hero… Shame on you!… Shit!…

I remember Ravana! When you came to abduct me, even when the wind was blowing, you were shivering, even when leaves fell from a tree, you used to shiver… Now here you are showing the pretense of your bravery….

Brother Bharat! When Mother Maithili was speaking all this, her lean body was trembling with both anger and fear.

His lips had dried up due to anger… His face had become bloody….

What else did you say Ravana! The splendor of Lanka is showing me… I will make Mandodari a maidservant, I will make you the queen of Lanka!

Hey ! As much splendor is there in your Lanka… that much is in one district of the kingdom of my father Janak Maharaj… in my mother’s house… in my father-in-law’s house… there is so much glory, but by rejecting the glory of that Ayodhya… with my “Pranadhan” I had walked….

Ravana ! You try to lure me…!

This is Sita… Sita… voluntarily came to the forest with her lord, rejecting the glory of Ayodhya….

Hatt! Ravan!… You only indulged in pleasures… You must have seen beautiful demons who would do anything for glory… But till date you were not brought up by any Sati woman… Today you are… Now see! Is your moon sword powerful or this grass of this Sati Sita!

Hatt! Use your sword… I will see… What will your sword do to me… Be careful Ravana!… If I have thrown this straw in my hand in your Lanka…

Ravana was filled with anger, raised his sword and as soon as he ran to kill, Mandodari stopped him.

King ! Do not eradicate this monster dynasty with you…

I am seeing the destruction of Lanka… Mandodari said.

Rest of the discussion tomorrow…

Vaidehi says “Trin Dhar Oat”

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