आहार शुद्धि जीवन सिद्धि का मूल है

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।। श्री: कृपा ।।
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – आहार का सम्बन्ध न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य से है अपितु असंतुलित और दूषित आहार हमारी मनोवृत्तियों को भी प्रभावित करता है, इसलिए आहार, विहार विचार के प्रति सजग रहें और शुद्ध संतुलित आहार लें। आहार शुद्धि जीवन सिद्धि का मूल है .! बहता हुआ झरना बहुत आकर्षक होता है, लेकिन उससे बिजली उत्पन्न करने के लिए उसके बहाव को बाँधना ही पड़ता है। कुछ ऐसा ही हमारे जीवन के साथ भी है। अल्हड़ जीवन की सौंदर्यता बेशक अनुपम, बेजोड़ होती है, लेकिन उसे सार्थक दिशा देने के लिए अनुशासन आवश्यक होता है। अनुशासन की प्रक्रिया ने मनुष्य जीवन को चार सिद्धान्त दिए हैं – आहार, विहार, विचार और आचार। आहार का सम्बन्ध मनुष्य के खान-पान से है, विहार का उसके रहन-सहन से। इसी तरह, विचार का सम्बन्ध सोचने-समझने की शक्ति और उसके तरीके से है, जबकि आचार का सम्बन्ध जीवन के उस पहलू से है, जिसके द्वारा हम एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं। धन-सम्पति का विकास सच्चा विकास नहीं है। जिसके जीवन में सदाचार नहीं, आहार-विहार पवित्र नहीं, वह कितना भी धनवान और शक्तिमान क्यों न हो, आत्मिक दृष्टि से दरिद्र ही है। ‘आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि, सत्व शुद्धो ध्रुवा स्मृति:। स्मृतिर्लब्धे सर्वग्रन्थीनां प्रियमोक्ष:।।’ अर्थात्, आहार के शुद्ध होने से अन्त:करण की शुद्धि होती है, अन्त:करण के शुद्ध होने से बुद्धि निश्छल होती है और बुद्धि के निर्मल होने से सब संशय और भ्रम नष्ट हो जाते हैं, तब मुक्ति का मिलना सुलभ हो जाता है। आहार व्यतिक्रम अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियों का मूल है। अत: आहार शुद्ध-सात्विक और संतुलित हो। यह बात हमेशा ध्यान रहे कि देह-देवालय एवं जीवन-सिद्धि का स्वाभाविक स्रोत है। आहार का स्थूल प्रभाव अंग-अवयवों पर पड़ता है, पर उसकी सूक्ष्म शक्ति मनुष्य के अन्तराल तक जा पहुँचती है और अपना समुचित प्रभाव छोड़ती है। इसलिए साधना के दिनों में उपवास का नियम है। फलाहार दूध, छाछ पर रहकर साधक अपना साधना क्रम पूरा करते हैं …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – जीवन के अनेक दु;खों और समस्याओं का कारण मन का अज्ञान ही है। आत्म-जागरण अथवा ज्ञान प्राप्ति के बाद मन का द्वैत विलीन हो जाता है व आनन्द, शान्ति तथा समाधान जैसी दिव्यताएँ प्रकट होने लगती है ! अतः ज्ञानार्जन का प्रयास हो ! आत्म-जागरण की दिशा में अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ, बाह्यंतर शुचिता और संकल्प की शुभता ही श्रेष्ठ साधन हैं। वस्तुतः मनुष्य मन में प्रस्फुटित विचार ही कालान्तर में व्यवहार और संस्कारों के रूप में परिणित होते हैं। अतः मनोगत विचारों के प्रति सचेत रहें। विचार आध्यात्मिक-भगवदीय भाव युक्त हों। श्रेष्ठ विचार ही जीवन उन्नयन-उत्कर्ष के आरम्भिक आधार हैं। वैचारिक शुचिता-पावित्र्य सहेज कर रखना ही साधना का सार है। मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है। सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, तुच्छता-महानता, सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति आदि सभी पहलू मनुष्य के विचारों पर निर्भर करते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार जानकर उसके जीवन का स्वरूप सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को कायर-वीर, स्वस्थ-अस्वस्थ, प्रसन्न-अप्रसन्न कुछ भी बनाने में उसके विचारों का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। तात्पर्य यह है कि अपने विचारों के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता है। जहाँ अच्छे विचार उसे उन्नत बनायेंगे, वहीं हीन विचार मनुष्य को गिराएँगे। स्वामी रामतीर्थ ने कहा है – “मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है”। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – “स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है”। भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था – “भिक्षुओं ! वर्तमान में हम जो कुछ भी हैं अपने विचारों के ही कारण हैं और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण”।




, Shri: Please. Respected “Sadgurudev” ji said – Diet is not only related to our physical health, but unbalanced and contaminated diet also affects our attitudes, so be aware of diet, vihar thought and take pure balanced diet. Diet purification is the root of life achievement.! A flowing waterfall is very attractive, but in order to generate electricity from it, its flow has to be tied. Something similar is with our life as well. Undoubtedly, the beauty of carefree life is unique, unmatched, but discipline is necessary to give it a meaningful direction. The process of discipline has given four principles to human life – diet, movement, thought and conduct. Food is related to the food and drink of a man, Vihar is related to his living. Similarly, thought is related to the power and way of thinking, while conduct is related to that aspect of life by which we behave with each other. Development of wealth is not true development. One who does not have good conduct in his life, his diet is not pure, no matter how rich and powerful he is, he is still poor from the spiritual point of view. ‘Diet Shuddha Satva Shuddhi, Satva Shudho Dhruva Smriti. Smritirlabdhe sarvagranthinam priyamaksha: That is, when the diet is pure, the inner self is purified, when the inner self is pure, the intellect is pure, and when the intellect is pure, all doubts and illusions are destroyed, then there is liberation. It becomes easy to meet. Eating disorder is the root of many physical and mental ailments. Therefore, the diet should be pure and balanced. Always keep this thing in mind that the body is the temple and the natural source of success in life. Diet has a gross effect on the organs, but its subtle power reaches the innermost part of the human being and leaves its proper effect. That’s why there is a rule of fasting during the days of Sadhana. Sadhaks complete their spiritual practice by staying on fruits, milk and buttermilk….

Respected “Acharyashree” ji said – Ignorance of the mind is the reason for many sorrows and problems in life. After self-awakening or attainment of knowledge, the duality of mind dissolves and divinities like joy, peace and solution begin to appear! That’s why there should be an effort to acquire knowledge! In the direction of self-awakening, unbroken effort, external purity and auspiciousness of resolution are the best means. In fact, the thoughts that emerge in the human mind eventually result in the form of behavior and rituals. So be aware of occult thoughts. Thoughts should be spiritual-spiritual. Elevated thoughts are the initial basis of upliftment and progress in life. Preserving ideological purity and purity is the essence of spiritual practice. Man’s life is the reflection of his thoughts. Success-failure, progress-degradation, insignificance-greatness, happiness-sorrow, peace-unrest etc. all aspects depend on the thoughts of man. By knowing the thoughts of any person, the form of his life can be easily obtained. His thoughts have an important hand in making a man coward-hero, healthy-unhealthy, happy-unhappy. The meaning is that a man’s life becomes and deteriorates according to his thoughts. Where good thoughts will make him elevated, inferior thoughts will make a man fall. Swami Ramteerth has said – “As are the thoughts of a man, so his life becomes”. Swami Vivekananda had said – “Heaven and hell are not anywhere else, they reside in our thoughts only”. Lord Buddha while preaching to his disciples said – “Monks! Whatever we are at present is due to our thoughts and whatever we will become in future is also due to our thoughts”.

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