पुरण आनंद

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हम राम राम कृष्ण कृष्ण भजते है। हम स्तुति करते हुए इस मार्ग पर आ जाते हैं कि एक मिनट में भगवान के भाव मे लीन होने लगते हैं भगवान को हर पल ध्याते हुए भी मै नहीं मरता है भगवान के भाव मे दो दो तीन तीन घंटे ढुबे रहते आनंद की तंरगे उठने लगती है। हमे भगवान के चिन्तन में बहुत रस मिलने लगता है। परमात्मा सब में समाया हुआ है कण-कण में भगवान बैठे हैं। लेकिन फिर भी मैं नहीं मरती है। मै और तु दो है तब तक प्रार्थना मार्ग है फिर तु रह जाता है भगवान तु ही हैं मेरे प्राण आधार तुम ही हो एक भाव से भगवान को भजता है संसार भी है कुछ कामनाएँ भी होती है। आनन्द भी है। लेकिन भक्त को आनंद का मार्ग पुरण नहीं लगता है। क्योंकि वह जानता है कि जो आनंद कुछ समय के लिए प्राप्त है वह स्थाई आनंद नहीं है वह चैतन्य महाप्रभु का और बुद्ध का आनंद नहीं है तुझे और आगे चलना है। भगवान को ध्याता रहता है अपने आप को भुल जाता है। शरीर गौण होने लगता है कुछ समय शरीर गौण होता है फिर भी मैं जीवित रहता है।  आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार नहीं होता तब तक दिल तङफता रहता है। जब तक तङफ हैं तब तक हम शान्ति के पथ पर नहीं है भगवान राम को ध्याता है। भगवान कृष्ण को ध्याता है। परम पिता परमात्मा को ध्याता है फिर भी पुरणता दिखाई नहीं देती है। आत्म तत्व का चिन्तन करता है।आत्मा तत्व धीरे-धीरे शरीर रूप को गौण करता है। आनन्द की जो उमंग उठती थी उनको शांत करती है। मै धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। भगवान से मिलन की तङफ भी शान्त होने लगती है
महाशुन्य के लिए एक एक क्षण प्रभु प्राण नाथ का बनना होता है। हमे परमात्मा को जानने के लिए परमात्मा का बनना है। अपने मन से मै तु को एक रूप में देखने के लिए हर किरया में परमतत्व परमात्मा की खोज करनी पड़ती है।

जब हम आत्मचिंतन के मार्ग पर चलते हैं तब धीरे-धीरे सब शान्त होने लगता है। यही आत्म ज्ञान है 
मै का मर जाना ही ज्ञान है मै शरीर हूँ से ऊपर उठना ही ज्ञान है सब कुछ ब्रह्म है मै के मरने पर ही होता है अन्दर से संसार का निकलना ही ज्ञान है सबमे आत्मा और परमात्मा विराजमान हैं अपने अन्तर्मन से यह भाव प्रकट होना ही ज्ञान है। जय श्री राम अनीता गर्ग

We worship Ram Ram Krishna Krishna. We come on this path by praising that in a minute, I start getting absorbed in the spirit of God, even after meditating on God every moment, I do not die, after being immersed in the spirit of God for two to three three hours, the waves of joy start rising. . We start getting a lot of interest in the thoughts of God. God is absorbed in everything, God is sitting in every particle. But still I don’t die. I and you are two, till then there is a prayer path, then you remain God, you are the basis of my life, you are the basis of one’s soul, worships God with a feeling, there is also the world, there are also some desires. There is fun too. But the devotee does not find the path of bliss to be perfect. Because he knows that the bliss which is attained for a short time is not the permanent bliss, it is not the bliss of Caitanya Mahaprabhu and Buddha, you have to go on. One keeps meditating on God and forgets himself. The body becomes secondary, sometime the body is secondary, yet I live. Till the soul does not have a realization with the Supreme Soul, the heart continues to suffer. As long as we are there, we are not on the path of peace, worships Lord Rama. He meditates on Lord Krishna. The Supreme Father is meditating on the Supreme Soul, yet perfection is not visible. Thinks of the Atma element. The Atman element gradually subjugates the body form. The euphoria that used to rise pacifies them. I’m slowly starting to finish. The side of meeting with God also starts to calm down.
For the sake of Mahashunya, one moment has to become of Prabhu Pran Nath. To know God, we have to become of God. In order to see Me as one form with your mind, one has to search for the Supreme God in every action.

When we walk on the path of self-contemplation, then gradually everything starts to calm down. this is self knowledge
My death is the knowledge, I am the body, rising above the body is the knowledge, everything is Brahma, it happens only after I die, the world comes out of the world, knowledge is the soul and God is present in everyone, the manifestation of this feeling from our conscience is knowledge. Is. Jai Shri Ram Anita Garg

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