[134]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

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।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
श्री वृन्दावन आदि तीर्थों के दर्शन

क्वचिद्भृंगीगीतं क्वचिदनिलभंगीशिशिरता
क्वचिद् वल्लीलास्यं क्वचिदमलमल्लीपरिमलः।
क्वचिद् धाराशाली करकफलपालीरसभरो
हृषीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम।।

मथुरा से मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन आदि वनों को देखते हुए और रास्ते में अनेक तीर्थ कुण्डों में स्नान, आचमन करते हुए प्रभु भगवान की प्रधान लीलास्थली त्रैलोक्यपावन श्रीवृन्दावन की भूमि में पहुँचे। वृन्दावन में प्रवेश करते ही प्रभु भावावेश में आकर मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। वे चारों ओर आँखें फाड़-फाड़कर पागल की भाँति इधर-उधर देखने लगे। उन्होंने देखा कहीं तो कदम्ब के वृक्षों की पंक्तियां खड़ी हुई हैं। कहीं करील के वृक्षों पर टेंटियां और लाल-लाल फूल लगे हुए हैं। कहीं गौएं चर रही हैं, तो कहीं व्रज के ग्वाल-बाल किलोलें कर रहे है। कहीं मयूर नाच रहे हैं तो कहीं सारस, हंस, चकवा, जल-मुर्ग आदि जल के पक्षी उड़-उड़कर कालिन्दी-कूल की ओर जा रहे हैं। प्रभु आँखें फाड़-फाड़कर सब की ओर प्रेम भरी दृष्टि से देखने लगते। कभी जल्दी से उठकर वृक्षों को आलिंगन करते, उन पर से बहुत- से पुष्प गिर-गिरकर प्रभु के पादपद्यों को ढक देते, मानो वृक्ष अपने प्यारे के पैरो में श्रद्धांजलिस्वरूप पुष्प चढ़ा रहे हों।

प्रभु गौओं की ओर पूर्वपरिचित की भाँति दौड़ते और उन की पीठों पर अपने कोमल करोंको फिराते। गौएं रंभाती हुई पूंछ उठा-उठाकर प्रभु की ओर दौड़तीं और उनके हाथ-पैरों को चाटने लगतीं। व्रज के पक्षी प्रभु के बिलकुल निकट आ-आकर अपनी-अपनी भाषा में कुछ कहते, प्रभु उन की प्रेमभरी वाणियों को सुनकर सिर हिलाने लगते, मानो वे उन की बातों को समझकर संकेत के द्वारा उनका उत्तर दे रहे हैं। प्रभु के आनन्द की सीमा नहीं रहीं, वे वृन्दावन में आते ही सभी बातों को भूल गये और जिस प्रकार जल से पृथक की हुई मछली फिर महासागर में डाल देने से परमानन्द का अनुभव करती है उसी प्रकार व्रज की पावन रज में लोटकर प्रभु उसी परमानन्दस्वरूप सुख का अनुभव करने लगे। यहाँ से जाकर प्रभु ने व्रजमण्डल के प्रायः सभी तीर्थों के दर्शन किये। प्रभु के समय में वृन्दावन सचमुच वन ही था। दस-बीस ब्राह्मणों के और ग्वालों के झोंपड़े थे, नहीं तो चारों ओर वन-ही-वन था। बहुत ही भावुक भक्त वहाँ दर्शन करने आते थे और दर्शन कर के मथुरा लौट जाते थे। व्रजमण्डल के बहुत- से तीर्थ और कुण्ड लुप्तप्राय हो गये थे। लोग उनका नाम तक नहीं जानते थे।

जब महाप्रभु संन्यास लेने से पूर्व नवद्वीप में ही रहकर भक्तों के साथ संकीर्तन करते थे तभी उन्होंने भूगर्भ पण्डित और लोकनाथ गोस्वामी को व्रजमण्डल के लुप्त तीर्थों को प्रकट करने और उनका जीर्णोद्धार करने के निमित्त वृन्दावन में भेजा था। इन लोगों ने जब प्रभु के संन्यासी होने की बात सुनी तो ये प्रभु-दर्शनों की लालसा से वृन्दावन को छोड़कर दक्षिण की ओर चले गये थे, इस कारण वृन्दावन आने पर प्रभु की इन से भेंट नहीं हो सकी। महाप्रभु ने स्वयं ही कुछ लुप्त तीर्थों को प्रकट किया।

जिस स्थान पर भगवान ने अरिष्टासुर का वध किया था, वहाँ ‘आरिठ’ नामका एक ग्राम है, महाप्रभु ने वहाँ आकर लोगों से पूछा कि ‘यहाँ पर राधाकुण्ड का पुराणों में उल्लेख मिलता है, वह राधाकुण्ड कहाँ है?’ प्रभु के इस प्रश्न का उत्तर ग्रामवासी नहीं दे सके। उनमें से किसी को भी राधाकुण्ड का पता नहीं था। प्रभु का साथी ब्राह्मण भी राधाकुण्ड से अनभिज्ञ था, तब प्रभु ने स्वयं ध्यानमग्न होकर राधाकुण्ड जाना और दो खेतों के बीच में भरे हुए थोड़े- से जल में स्नान करके आपने राधाकुण्ड का माहात्म्य वर्णन किया। उस दिन से वही राधाकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

राधाकुण्ड को प्रकट कर के प्रभु कुसुमसरोवर पर आये। वहाँ श्रीगोवर्धन-पर्वत के दर्शन करके आप पुलकित हो उठे। भूमि में लोटकर आपने गिरिराज को साष्टांग प्रणाम किया और उस की छोटी-छोटी शिलाओं को लेकर हृदय से चिपटाने लगे। गोवर्धन भगवान का अभिन्न विग्रह है। शास्त्रों में इसे भगवान का शरीर ही बताया गया है। गोवर्धन में प्रभु ने हरिदेव जी के दर्शन किये, फिर ब्रह्मकुण्ड में स्नान कर के वहीं भिक्षा की।

गोवर्धन-पर्वत के ऊपर गोपाल भगवान का मन्दिर था, जिन्हें श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी ने प्रकट किया था। उनके दर्शनों की प्रभु को इच्छा हुई, किन्तु प्रभु तो गिरिराज के ऊपर चढ़ना ही नहीं चाहते। वे सोचने लगे कि गोपालभगवान के दर्शन कैसे हों।

सर्वान्तर्यामी भगवान अपने भक्त की इच्छा को जान गये। वे तो भाव के भूखे हैं, भक्तों के हाथ तो वे बिना कोड़ी-दाम के ही बिक जाते हैं, फिर पर्वत से नीचे उतरना कौन-सी बात है। उन दिनों गोपालभगवान की स्थिति अस्थिर थी। मुसलमानों के उत्पातों के कारण वे इधर- से-उधर घूमते थे। कभी किसी कुंज में ही पूजा हो रही है, तो कभी किसी ग्राम में ही विराजमान हैं। वे तो व्रजवासियों के सखा हैं। ईश्वर या परमात्मा होंगे तो शिव, ब्रह्मा अथवा लक्ष्मी जी के लिये होंगे। व्रज में वे वही पुराने ‘कनुआ’ हैं। जब व्रजवासियों को यवनों से भय है, तो उन्हें भी होना चाहिये, इसलिये व्रजवासी ग्वाल-बाल जहाँ भी जाते वहीं गोपाल को साथ ले जाते। उन दिनों एक तुर्क- सेना मूर्तियों को विध्वंस करती हुई आ रही थी, व्रजवासी राजपूत इसी भय से अन्नकूट नामक ग्राम से गोपाल जी को ‘गाठौली’ नामक ग्राम में ले आये और वहीं गुप-चुप चार-पांच दिनों तक उन की सेवा-पूजा करते रहे। गाठौली ग्राम गिरिराज के नीचे है, प्रभु ने जब सुना कि गोपाल भगवान तो मानो मुझे ही दर्शन देने के निमित्त पर्वत से उतरकर गाठौली में आ विराजे हैं, तब तो प्रभु के आनन्द की सीमा नहीं रहीं।

प्रातःकाल मानसी गंगा में स्नान गोवर्धन-पर्वत की परिक्रमा प्रारम्भ कर दी। गोवर्धन-पर्वत की परिक्रमा सात कोस की बताते हैं, परिक्रमा जहाँ से प्रारम्भ होती है वहीं समाप्त करते हैं, बहुत- से मनुष्य तो दण्डवत करते हुए ही सम्पूर्ण परिक्रमा को करते हैं। प्रभुने भी पूरी परिक्रमा की। महाप्रभु के साथ बलभद्र भट्टाचार्य और वह साधु ब्राह्मण ये दो सेवक और थे, सभी गोविन्दकुण्ड पर पहुँचे। और वहाँ से गाठौली में गोपाल जी का आगमन सुनकर वहाँ पहुँचे। महाप्रभु गोपाल जी की मन-मोहिनी मूर्ति के दर्शनों से मुग्ध हो गये और वे प्रेम में बेसुध होकर गोपाल जी के सामने नृत्य करने लगे। और गोपाल-स्रोत द्वारा उन की स्तुति करने लगे। तीन दिन प्रभु गाठौली में रहकर गोपाल जी के दर्शनों का सुख लेते रहे। इस के अनन्तर आप नन्दीश्वर, पावनसरोवर, शेषशायी, लक्ष्मी, खेलातीर्थ, भाण्डीरवन, भद्रवन, लोहवन, गोकुल, महावन आदि भगवान की लीला-स्थलियों के दर्शन करते हुए फिर मथुरा जी में लौट आये और उसी साधु ब्राह्मण के घर में आकर ठहरे। ब्राह्मण ने प्रभु की खूब सेवा की थी, उसी से संतुष्ट होकर प्रभु उस के घर में रहने लगे। वहाँ नगर की भीड़-भाड़ को देखकर मथुरा और वृन्दावन के बीच में अक्रूरघाट पर एकान्त समझकर वहाँ रहने लगे। वहाँ से आपने वृन्दावन में जाकर कालीहृद, प्रस्कन्दन क्षेत्र, द्वादशादित्य, केशीतीर्थ, रासस्थली आदि पुण्य तीर्थों के दर्शन किये और सायंकाल को फिर लौटकर अक्रूरतीर्थ में ही आ गये। वहाँ भी बहुत- से लोग प्रभु के दर्शनों के निमित्त आने-जाने लगे, अतः आप वृन्दावन में यमुना जी के तटपर एकान्त में रहकर भगवन्नम-संकीर्तन करते रहे। वहीं पर कृष्णदास नाम का एक राजपूत क्षत्रिय प्रभु के शरणापन्न हुआ और वह घरबार छोड़कर प्रभु के ही साथ रहने लगा।

एक दिन सम्पूर्ण वृन्दावन में हल्ला हो गया कि वृन्दावन में फिर श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए हैं, वे कालीदह में कालिय के फणपर नृत्य करते हैं और कालिय के सिर में की मणि प्रत्यक्ष चमकती है। बहुत- से लोग इस बात को सुनकर प्रभु के पास पूछने आये कि क्या यह बात सत्य है। प्रभु ने कहा- ‘आप ही जाकर देखिये, सत्य है या असत्य।’ बहुत- से लोग रात्रि में कालीदह पर जाकर पहुँचे। सचमुच वहाँ एक काला आदमी खड़ा था और दूर से एक मणि-सी चमक रही थी। लोग आनन्द और कुतूहल के साथ उसी ओर बढ़ने लगे। बलभद्र भट्टाचार्य ने भी कालीदहपर जाकर साक्षात श्रीकृष्ण भगवान के दर्शनों की इच्छा प्रकट की। प्रभु ने प्रेम पूर्वक उस के गाल पर एक हल्का-सा चपत जमाते हुए कहा- ‘लोगों की गति तो भेड़ों के समान है। एक भेड़ कुएं में गिर पड़ती है तो सब-बी-सब उस के पीछे ही कुएं में गिर पड़ती हैं। इस कलिकाल में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन होना कोई साधारण बात थोड़े ही है कि सभी को भगवान के साक्षात दर्शन हो जाये। करोड़ों में कोई ऐसे एक-दो भाग्यवान पुरुष होते हैं, जिन्हें भगवत-कृपा से प्रभु के साक्षात दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हो। यहीं बैठकर भगवन्नाम का जप करो। सबेरे लोगों से पूछ लेना कि क्या बात थी।’

भट्टाचार्य ने प्रभु के समझाने पर रात्रि में काली दह पर जाने का विचार छोड़ दिया, इधर लोगों की भीड़ वहाँ पहुँची। वहाँ उन्होंने देखा, एक काले रंग का मल्लाह डोंगी में लालटेन रखकर मछली मार रहा है। उसके हाथ में मछली मारने की बंसी थी। लोगों का भ्रम दूर हुआ। प्रातःकाल जब लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आये जब प्रभु ने उनसे पूछा- ‘क्या आप लोगों को श्रीकृष्ण भगवान के दर्शन हुए?’

एक तेजस्वी वृद्ध पण्डित ने प्रभु को सभी वृत्तान्त सुनाया और अन्त में कहा- ‘वहाँ तो हमें दर्शन हुए सो हुए ही, यहाँ भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन अवश्य हो गये।’

प्रभु ने चारों ओर देखते हुए कहा- ‘यहाँ कहाँ हैं भगवान? मुझे भी भगवान के दर्शन करा दीजिये। मैं भगवान के दर्शनों के लिये बड़ा उत्सुक हूँ।’

उस ब्राह्मण ने प्रभु की ओर संकेत करते हुए कहा- ‘संन्यासी के छद्यवेश में ये ही तो सामने श्रीहरि बैठे हैं।’ इतना सुनते ही प्रभु ने उस वृद्ध ब्राह्मण के पैर पकड़ लिये और रोते-रोते कहने लगे- ‘महानुभव! आपकी इस अद्भुत निष्ठा को धन्य है, आप को अवश्य ही भगवान का साक्षात हो गया है, तभी तो आप चराचर विश्व में भगवान-भावना रखते हैं। सच्चे भक्त को अपने भगवान के अतिरिक्त दूसरा कोई रूप भासता ही नहीं। उसे सर्वत्र अपने प्यारे के दर्शन होते हैं।’ इस प्रकार उस ब्राह्मण की भाँति-भाँति से स्तुति करके उसे विदा किया।

महाप्रभु दिन में वृन्दावन में स्नान-जप से निवृत्त होकर भिक्षा अक्रूर-तीर्थ पर ही आकर किया करते थे। ग्रामवासी ब्राह्मण तथा और द्विजाति के लोग नित्य ही प्रभु को भिक्षा कराने का आग्रह किया करते थे। कभी-कभी तो दस-बीस पांच-पांच आदमियों को साथ ही निमंत्रण आ जाता।

महाप्रभु की वहाँ विचित्र दशा थी, जब भी उन्हें इस बात का स्मरण हो उठता कि उसी स्थान में डुब की मारते हुए अक्रूर को भगवान के दर्शन हुए थे, तभी आप जल्दी से यमुना जी में कूद पड़ते और शरीर की सुधि भूलकर बेहोश होकर यमुना के तीक्ष्ण प्रवाह में बहने लगते। इसलिये भट्टाचार्य को प्रभु की बड़ी ही सावधानी से सदा देख-रेख करनी पड़ती। अतएव भट्टाचार्य ने उस ब्राह्मण से सम्मति लेकर प्रभु को लौटा ले चलने का निश्चय किया। उन्होंने प्रभु से निवेदन किया- ‘प्रभो! यहाँ अब एकान्त विशेष नहीं रहता, निमंत्रण भी बहुत आने लगे है। आप की यहाँ दशा भी विचित्र-सी हो जाती है। इसलिये मेरी प्रार्थना है कि अब यहाँ से चलना चाहिये। माघ की संक्रान्ति भी सन्निकट है, अभी से चलेंगे तो प्रयाग पहुँचकर मकर-स्नान कर सकेंगे, अब जैसी आज्ञा हो!’ प्रभु ने अत्यन्त ही प्रेम पूर्वक कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! तुम्हारी ही कृपा से मुझे भगवान की पुण्य-लीलास्थली के दर्शन हो सके हैं। तुमने ही मुझे वृन्दावन के दर्शन कराकर मेरे इस जन्म को सार्थक किया है। अतः यह शरीर तुम्हारा ही है। तुम इसे ले जाना चाहो वहाँ ले जाओ, मुझे इस में कुछ भी आपत्ति न होगी।’

प्रभु की सम्मति पाकर सभी को अत्यन्त ही प्रसन्नता हुई और वह प्रभु का कृपापात्र राजपूत ठाकुर तथा मथुरा का साधु ब्राह्मण ये दोनों ही प्रभु के साथ-ही-साथ चलने को प्रस्तुत हुए। भट्टाचार्य के सहित चारों ही मथुरा में आये और वहाँ से यमुना-पार करके प्रयाग की ओर चलने लगे। व्रज की पवित्र भूमि को परित्याग करते समय प्रभु को अपार दुःख हुआ। वे शोक में विहृल होकर भूमि पर गिर पड़े और बहुत देर तक अचेतनावस्था में पड़े रहे। जिस किसी भाँति तीनों ने मिलकर प्रभु को सावधान किया और उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ने लगे।

क्रमशः अगला पोस्ट [135]
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[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



, Shri Hari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Chant] Harekrishna Hareram Visiting Shri Vrindavan etc. pilgrimages

Sometimes the song of bees and sometimes the chill of the wind Sometimes he had a face like a creeper and sometimes he was pure like a garland sometimes full of streaming fruit and vegetables This Vrindavan delights the hosts of Hrishikas

From Mathura, looking at the forests of Madhuvan, Talavan, Kumudavan, Bahulavan etc. and taking bath and aachaman in many pilgrimage ponds on the way, the Lord reached the land of Trailokyapavan Sri Vrindavan, the main place of Lord’s pastimes. As soon as the Lord entered Vrindavan, he fainted and fell on the ground in ecstasy. Tearing his eyes all around, he started looking here and there like a madman. He saw that somewhere there were rows of Kadamba trees. Somewhere there are tents and red-red flowers on the Karil trees. Somewhere the cows are grazing, and somewhere the cowherd boys of Vraj are killing. Somewhere peacocks are dancing and somewhere cranes, swans, chakwa, water-fowl etc. water birds are flying towards Kalindi-cool. Lord started looking at everyone with tears in his eyes. Sometimes getting up quickly and hugging the trees, many flowers would fall from them and cover the feet of the Lord, as if the trees were offering flowers at the feet of their beloved as a tribute.

Prabhu used to run towards the cows as before and used to move his soft hands on their backs. Cows mooing and raising their tails ran towards the Lord and started licking His hands and feet. The birds of Vraj came very close to the Lord and said something in their own language, the Lord started nodding his head after listening to their loving words, as if he understood their words and was answering them through signs. There was no limit to the joy of the Lord, he forgot all the things as soon as he came to Vrindavan, and just as a fish separated from the water, after being thrown into the ocean, experiences ecstasy, in the same way, the Lord, returning to the holy kingdom of Vraj, experiences the same blissful happiness. Started experiencing Going from here, the Lord visited almost all the pilgrimages of Vrajmandal. Vrindavan was really a forest during the time of the Lord. There were huts of ten-twenty Brahmins and cowherds, otherwise there was only one forest all around. Very emotional devotees used to come there to have darshan and return to Mathura after having darshan. Many pilgrimage centers and ponds of Vrajmandal had become extinct. People didn’t even know his name.

When Mahaprabhu used to perform Sankirtan with the devotees while staying in Navadvipa before retiring, he had sent Bhugarbha Pandit and Lokanatha Goswami to Vrindavan for the purpose of revealing and renovating the lost Tirthas of Vrajmandal. When these people heard about the Lord being an ascetic, they left Vrindavan and went south due to the longing to see the Lord, that’s why the Lord could not meet them when they came to Vrindavan. Mahaprabhu himself revealed some missing pilgrimages.

At the place where Lord Arishtasura was killed, there is a village named ‘Arith’, Mahaprabhu came there and asked the people that ‘Radhakund is mentioned here in the Puranas, where is that Radhakund?’ The villagers could not answer this question of the Lord. None of them knew about Radhakund. Prabhu’s companion Brahmin was also unaware of Radhakund, then Prabhu himself went to Radhakund after meditating and after bathing in a little water filled between two fields, you described the greatness of Radhakund. From that day itself it became famous by the name of Radhakund.

After revealing Radhakund, the Lord came to Kusumsarover. You were elated after seeing Shri Govardhan-Mountain there. Returning to the ground, you prostrated to Giriraj and started hugging his heart with small rocks. Govardhan is an integral part of the Lord. In the scriptures, it has been described as the body of God. The Lord had darshan of Haridev ji in Govardhan, then took a bath in Brahmakund and offered alms there.

On the top of Govardhan-Mountain was the temple of Gopal Bhagwan, who was manifested by Srimanmadhavendrapuri. The Lord desired to have his darshan, but the Lord does not want to climb Giriraj at all. They started thinking how to have darshan of Lord Gopal.

The omniscient God came to know the desire of his devotee. They are hungry for feelings, they are sold to devotees without a penny, then what is the point of coming down from the mountain. In those days Gopal Bhagwan’s position was unstable. Due to the mischief of the Muslims, he used to roam from here to there. Sometimes worship is being done in a grove, and sometimes it is sitting in a village. They are friends of the residents of Vraj. If there is God or God then it will be for Shiva, Brahma or Lakshmi. He is the same old ‘Kanua’ in Vraj. When the residents of Vraj are afraid of the Yavanas, then they should also be, that’s why the cowherd boys of Vraj used to take Gopal with them wherever they went. In those days, a Turkish army was coming to destroy the idols, due to this fear, the Vrajvasi Rajputs brought Gopal ji from the village named Annakoot to the village named ‘Gatholi’ and secretly served him there for four-five days. Keep doing Gatholi village is below Giriraj, when the Lord heard that Gopal Bhagwan had come down from the mountain to give me darshan and is sitting in Gatholi, then there was no limit to the joy of the Lord.

In the morning Mansi bathed in Ganga and started circumambulation of Govardhan Parvat. The circumambulation of Govardhan-Mountain is said to be of seven kos, the circumambulation ends where it starts, many people do the entire circumambulation while doing obeisances. The Lord also did the complete parikrama. Along with Mahaprabhu, Balabhadra Bhattacharya and that Sadhu Brahmin, these two other servants, all reached Govindkund. And from there reached there after hearing about the arrival of Gopal ji in Gatholi. Mahaprabhu was mesmerized by the darshan of Gopal ji’s Man-Mohini idol and he started dancing in front of Gopal ji out of love. And started praising him through Gopal-source. Prabhu stayed in Gatholi for three days and enjoyed the darshan of Gopal ji. After this, after visiting the places of God’s pastimes like Nandishwar, Pavanasarovar, Sheshshayi, Lakshmi, Khelatirth, Bhandirvan, Bhadravan, Lohavan, Gokul, Mahavan etc., you returned to Mathura and stayed in the same hermit Brahmin’s house. Satisfied with the Brahmin who had served the Lord a lot, the Lord started living in his house. Seeing the overcrowding of the city there, thinking of solitude at Akrurghat between Mathura and Vrindavan, he started living there. From there you went to Vrindavan and visited holy places like Kalihrid, Praskandan Kshetra, Dwadshaditya, Keshitirth, Rassthali etc. and returned in the evening to Akrurtirth. There also many people started coming and going for the darshan of the Lord, so you remained in solitude on the banks of Yamuna ji in Vrindavan and did Bhagavannam-Sankirtan. There, a Rajput Kshatriya named Krishnadas took refuge in the Lord and left his home and started living with the Lord.

One day there was an uproar in the whole of Vrindavan that Shri Krishna has been born again in Vrindavan, he dances on Kaliya’s hood in Kalidah and the gem in Kaliya’s head shines clearly. Many people heard this and came to the Lord to ask if this was true. The Lord said- ‘You yourself go and see whether it is true or false.’ Many people reached Kalidah in the night. There really was a black man standing there and a gem was shining in the distance. People started moving in that direction with joy and curiosity. Balbhadra Bhattacharya also went to Kalidah and expressed his desire to see Lord Krishna in person. Prabhu lovingly slapped him on the cheek and said – ‘ The speed of people is like that of sheep. If a sheep falls into the well, everyone falls into the well after it. It is not a simple thing to have a direct darshan of God in this Kalikal that everyone can see God in person. Out of crores, there are one or two such fortunate men, who by the grace of God get the fortune of seeing the Lord in person. Sit here and chant the name of the Lord. Ask the people in the morning what was the matter.

Bhattacharya gave up the idea of ​​going to Kali Dah in the night on the persuasion of the Lord, here the crowd of people reached there. There he saw, a black colored sailor fishing with a lantern in a canoe. He had a fishing rod in his hand. People’s confusion was removed. In the morning when people came to see the Lord, when the Lord asked them – ‘Have you seen Lord Krishna?’

A bright old scholar told all the stories to the Lord and in the end said- ‘There we got darshan while sleeping, here we got direct darshan of God.’

The Lord looked around and said- ‘Where is God here? Give me the darshan of God too. I am very eager to see God.’

Pointing to the Lord, that Brahmin said- ‘Shri Hari is sitting in front of him in the guise of a monk.’ On hearing this, the Lord took hold of the feet of that old Brahmin and started crying and saying – ‘ Great! Blessed is your wonderful loyalty, you must have seen God, that’s why you have God-feeling in the world. A true devotee does not feel any other form other than his God. He sees his beloved everywhere. In this way, after praising that Brahmin in many ways, he sent him away.

Mahaprabhu retired from bathing and chanting in Vrindavan during the day and used to come and do alms at Akrur-tirtha. Villagers Brahmins and other second caste people used to urge the Lord to get alms everyday. Sometimes ten-twenty-five men would get the invitation together.

Mahaprabhu had a strange condition there, whenever he would remember that Akrura had seen God while taking a dip in the same place, then he would quickly jump into the Yamuna ji and forget the body’s consciousness and fall into the Yamuna’s unconscious. Started flowing in a sharp current. That’s why Bhattacharya always had to look after the Lord very carefully. So Bhattacharya decided to take the Lord back after taking advice from that Brahmin. He requested the Lord – ‘Lord! Solitude is no longer special here, invitations have also started pouring in. Your condition here also becomes strange. That’s why I request you to leave from here. The solstice of Magh is also near, if we start from now, we will be able to reach Prayag and take Makar-Snan, as per the order now!’ The Lord said very lovingly – ‘ Mr. Bhattacharya! It is only by your grace that I have been able to see the auspicious place of God. You have made this birth of mine meaningful by giving me darshan of Vrindavan. So this body is yours only. If you want to take it, take it there, I will have no objection to it.’

Everyone was very happy after getting the consent of the Lord and that Rajput Thakur, who was blessed by the Lord, and the sage Brahmin of Mathura, both of them presented themselves to walk along with the Lord. All four including Bhattacharya came to Mathura and from there crossing the Yamuna started walking towards Prayag. The Lord felt immense sorrow while leaving the holy land of Vraj. Overwhelmed with grief, he fell on the ground and remained unconscious for a long time. Somehow all the three together warned the Lord and started moving forward taking him along.

respectively next post [135] , [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

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