[148]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

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।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
श्री रघुनाथदास जी का गृह त्‍याग

गुरुर्न स स्‍यात् स्‍वजनो न स स्‍यात्
पिता न स स्‍याज्‍जननी न सा स्‍यात्।
दैवं न तत् स्‍यान्‍न पतिश्‍च स स्‍या-
न्‍न मोचयेद्य: समुपेतमृत्‍युम्।।

सप्‍तग्राम के भूम्‍यधिकारी श्री गोवर्धनदास मजूमदार के पुत्र श्री रघुनाथदास जी को पाठक भूले न होंगे। शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के घर पर ठहरे हुए प्रभु के उन्‍होंने दर्शन किये थे और प्रभु ने उन्‍हें मर्कट वैराग्‍य त्‍याग कर घर में ही रहते हुए भगवत-भजन करने का उपदेश दिया था और उनके गृहत्‍याग के अत्‍यन्‍त आग्रह करने पर प्रभु ने कह दिया था- ‘अच्‍छा देखा जायगा। अब तो तुम घर चले आओ, हम शीघ्र ही वृन्दावन को जायँगे, यहाँ से लौटकर जब हम आ जायँ, तब जैसा उचित हो वैसा करना।’ अब जब रघुनाथ जी ने सुना की प्रभु व्रजमण्‍डल की यात्रा करके पुरी लौट आये हैं, तब तो वे चैतन्‍य चरणों के दर्शनों के लिये अत्‍यन्‍त ही लालायित हो उठे। उनका मन-मधुप प्रभु के पादप का मकरन्‍द पान करने के निमित्‍त पागल-सा हो गया, वे गौरांग का चिन्‍तन करते हुए ही समय को व्‍यतीत लगे। ऊपर से तो सभी संसारी कामों को करते रहते, किन्‍तु भीतर उनके हृदय में चैतन्‍य विरहजनित अग्नि जलती रहती। वे उसी समय सब कुछ छोड़-छाड़कर चैतन्‍य चरणों का आश्रय ग्रहण कर लेते, किन्‍तु उस समय उनके परिवार में एक विचित्र घटना हो गयी!

सप्‍तग्राम का ठेका पहले एक मुसलमान भूम्‍यधिकारी पर था। वही उस मण्‍डल का चौधरी था, उस पर से ही इन्‍हें इस इलाके का अधिकार प्राप्‍त हुआ था। वह प्रतिवर्ष आमदनी का चतुर्थांश अपने पास रखकर तीन अंश बादशाह के दरबार में जमा करता था। उस मण्‍डल की समस्‍त आमदनी बीस लाख रूपये सालना की थी। हिसाब से इन मजूमदार भाइयों को पंद्रह लाख राजदरबार में जमा करने चाहिये और पांच लाख अपने पास रखने चाहिये, किन्‍तु ये अपने कायस्‍थप ने के बुद्धि कौशल से बारह ही लाख जमा करते और आठ लाख स्‍वयं रख लेते। चिरकाल से ठेका इन्‍हीं पर रहने से इन्‍हें भूम्‍यधिकारी होने का स्‍थायी अधिकार प्राप्‍त हो जाना चाहिये था, क्‍योंकि बारह वर्ष में ठेका स्‍थायी हो जाता है, इस बात से उस पुराने चौधरी को चिढ़ हुई। उसने राजदरबार में अपना अधिकार दिखाते हुए इन दोनों भाइयों पर अभियोग चलाया और राजमन्‍त्री को अपनी ओर मिला लिया। इसीलिये इन्‍हें पकड़ने के लिये राजकर्मचारी आये। अपनी गिरफ्तारी समाचार सुनकर हिरण्‍यदास और गोवर्धनदास- दोनों भाई घर छोड़कर भाग गये। घर पर अकेले रघुनाथदास जी ही रह गये, चौधरी ने इन्‍हें ही गिरफ्तार करा लिया और कारावास में भेज दिया।

यहाँ इन्‍हें इस बात के लिये रोज डराया और धमकाया जाता था कि ये अपने ताऊ (पिता के बड़े भाई) और पिता का पता बता दें, किन्‍तु इन्‍हें उनका क्‍या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे। इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्‍हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्‍टा करता, बुद्धिमान और प्रत्‍युत्‍पन्‍नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- ‘ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी-न-किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।’

ऐसा निश्‍चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्‍हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्‍होंने स्‍वाभाविक स्‍नेह दर्शाते हुए अत्‍यन्‍त ही कोमल स्‍वर से कहा- ‘चौधरी जी! आप मुझे क्‍यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप-तीनों भाई-भाई हैं। मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ। आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्‍यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।’

गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्‍नेह और सरलता के ऐसे शब्‍द सुनकर चौधरी का कठोर हृदय भी पसीज गया। उसने अपनी मोटी-मोटी भुजाओं से रघुनाथदास जी को छाती से लगाया और आँखों में आंसू भरकर गद्गद कण्‍ठ से कहने लगा- ‘बेटा ! सचमुच धन के लोभ से मैंने बड़ा पाप किया। तुम तो मरे सगे पुत्र के समान हो, आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं अभी राजमन्‍त्री से कहकर तुम्‍हें छुड़वाये देता हूँ। तुम्‍हारे ताऊ और पिता जहाँ भी हों उन्‍हें खबर कर देना कि अब डर करने का कोई काम नहीं है। वे खुशी से अपने घर आकर रहें। ‘यह कहकर उन्होंने राजमन्‍त्री से रघुनाथदास जी को मुक्‍त करा दिया। वे अपने घर आकर रहने लगे। अब तो उन्‍हें इस संसार का यथार्थ रूप मालूम पड़ गया। अब तक वे समझते थे कि इस संसार में सम्‍भवतया थोड़ा-बहुत सुख भी हो, किन्‍तु इस घटना से उन्‍हें पता चल गया कि संसार दु:ख और कलह का घर है। कहीं तो दीनता के दु:ख से दु:खी होकर लोग मर रहे हैं, कामपीड़ित हुए कामीजन कामिनियों के पीछे कुत्तों की भाँति घूम रहे हैं। कहीं कोई भाई से लड़ रहा है, तो किसी जगह पिता-पुत्र से कलह हो रहा है। कहीं किसी को दस-बीस गांवों की ज़मींदारी मिल गयी है या कोई अच्‍छी राजनौकरी या राजपदवी प्राप्‍त हो गयी है तो वह उसी के मद में चूर हुआ लोगों को तुच्‍छ समझ रहा है।

किसी की कविता की कलाकोविदों ने प्रशंसा कर दी है, तो वह अपने को ही उशना और वेदव्यास समझता है। कोई विद्या के मद में, कोई धन के मद में, कोई सम्‍पत्ति, अधिकार और प्रतिष्‍ठा के मद में चूर है। किसी का पुत्र मूर्ख है तो वह उसी की चिन्‍ता में सदा दु:खी बना रहता है। इसके विपरीत किसी का सर्वगुण सम्‍पन्‍न पुत्र है, तो उसे थोड़ा भी रोग होने से पिता का हृदय धड़कने लग जाता है, यदि कहीं वह मर गया तो फिर प्राणान्‍त के ही समान दु:ख होता है। ऐसे संसार में सुख कहाँ, शान्ति कहाँ, आनन्‍द तथा उल्‍लास कहाँ? यहाँ तो चारों ओर घोर विषण्‍णता, भयंकर दु:ख और भाँति-भाँति की चिन्‍ताओं का साम्राज्‍य है। सच्‍चा सुख तो शरीरधारी श्री गुरु के चरणों में ही है। उन्‍हीं के चरणों में जाकर परमशान्ति प्राप्‍त हो सकती है। जो प्रतिष्‍ठा नहीं चाहते, नेतृत्‍व नहीं चाहते, मान, सम्‍मान, बड़ाई और गुरुपने की जिनकी कामना नहीं है, जो इस संसार में नामी पुरुष बनने की वासना को एकदम छोड़ चुके हैं, उनके लिये गुरु चरणों के अतिरिक्‍त कोई दूसरा सुखकर, शान्तिकर, आनन्‍दकर तथा शीतलता प्रदान करने वाला स्‍थान नहीं है। इसलिये अब मैं संसारी भोगों से पूर्ण इस घर में नहीं रहूँगा। अब मैं श्रीचैतन्‍य चरणों का ही आश्रय ग्रहण करूँगा, उन्‍हीं की शान्तिदायिनी सुखमयी क्रोड में बालक की भाँति क्रीड़ा करूंगा। उनके अरुण रंगवाले सुन्‍दर तलुओं को अपनी जिह्वा से चाटूँगा और उसी अमृतोपम माधुरी से मेरी तृप्ति हो सकेगी।

चैतन्‍यचरणाम्‍बुजों की पावन पराग के सिवा सुख का कोई भी दूसरा साधन नहीं। यह सोचकर वे कई बार पुरी की ओर भगे भी, किन्‍तु धनी पिता ने अपने सुचतुर कर्मचारियों द्वारा इन्‍हें फिर से पकड़वा मंगवाया और सदा इनकी देख-रेख रखने के निमित्त दस-पांच पहरेदार इनके ऊपर बिठा दिये। अब ये बन्‍दी की तरह पहरों के भीतर रहने लगे। लोगों की आँख बचाकर ये क्षण भर को भी कहीं अकेले नहीं जा सकते। इससे इनकी विरह-व्‍यथा और भी अधिक बढ़ गयी। ये ‘हा गौर! हा प्राणवल्‍लभ! ‘कह-कहकर जोरों से रुदन करने लगते। कभी-कभी जोरों से रुदन करते हुए कहने लगते- ‘हे हृदयरमण! इस वेदनापूर्ण सागर से कब उबारोगे? कब अपने चरणों की शरण दोगे? कब इस अधम को अपनाओगे? कब इसे अपने पास बुलाओगे ? किस समय अपनी मधुमयी अमृतवाणी से भक्ति-तत्त्व के सुधासिक्त वचनों इस हृदय की दहकती हुई ज्‍वाला को बुझाओगे।

हे मेरे जीवनसर्वस्‍व! हे मेरी बिना डाँड़की नौका के पतवार! मेरी जीर्ण-शीर्ण तरीके कैवर्तक प्रभो! मुझे इस अन्‍धकूप से बाँह पकड़कर बाहर निकालो।’ इनके ऐसे बे-सिर-पैर के प्रलाप को सुनकर प्रेममयी माता को इनके लिये अपार दु:ख होने लगा। उन्‍होंने अपने पति, इनके पिता गोवर्धनदास मजूमदार से कहा- ‘हमारे कुल का एकमात्र सहारा एक रघु पागल हो गया है। इसे बांधकर रखिये, ऐसा न हो यह कहीं भाग जाय।’

पिता ने मार्मिक स्‍वर में आह भरते हुए कहा- ‘रघु को दूसरे प्रकार का पागलपन है। वह संसारी बन्‍धन को छिन्‍न-भिन्‍न करना चाहता है। रस्‍सी से बाँधने से यह नहीं रुकने का। जिसे कुबेर के समान अतुल सम्‍पत्ति, राजा के समान अपार सुख, अप्‍सरा के समान सुन्‍दर स्‍त्री और भाग्‍यहीनों को कभी प्राप्‍त न होने वाला अतुलनीय ऐश्‍वर्य ही जब घर में बांध ने को समर्थ नहीं है, उसे बेचारी रस्‍सी कितने दिनों बांधकर रख सकती है?’ माता अपने पति के उत्तर से और पुत्र के पागलपन से अत्‍यन्‍त ही दु:खी हुई। पिता भलीभाँति रघुनाथ पर दृष्टि रखने लगे।

उन्‍हीं दिनों श्रीपाद नित्‍यानन्‍द जी ग्रामों में घूम-घूमकर संकीर्तन की धूम मचा रहे थे। वे चैतन्‍य प्रेम में पागल बने अपने सैकड़ों भक्‍तों को साथ लिये इधर-उधर घूम रहे थे। उनके उद्दण्‍ड नृत्‍य को देखकर लोग आश्‍चर्यचकित हो जाते, चारों ओर उनके यश और कीर्ति की धूम मच गयी। हजारों, लाखों मनुष्‍य नित्‍यानन्‍द प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। उन दिनों गौड़ देश में ‘निताई’ के नाम की धूम थी। अच्‍छे-अच्‍छे सेठ-साहूकार और भूम्‍यधिपति इनके चरणों में आकर लोटते और ये उनके मस्‍तकों पर निर्भय होकर अपना चरण रखते, वे कृतकृत्‍य होकर लौट जाते। लाखों रूपये भेंट में आने लगे। नित्‍यानन्‍द जी खूब उदारतापूर्वक उन्‍हें भक्‍तों में बांटने लगे और सत्‍कर्मों में द्रव्‍य को व्‍यय करने लगे। पानीहाटी संकीर्तन का प्रधान केन्‍द्र बना हुआ था। वहाँ के राघव पण्डित महाप्रभु तथा नित्‍यानन्‍द जी के अनन्‍य भक्‍त थे। नित्‍यानन्‍द जी उन्‍हीं के यहाँ अधिक ठहरते थे। रघुनाथ जी जब नित्‍यानन्‍द जी का समाचार सुना तो वे पिता की अनुमति लेकर बीसों सेवकों के साथ पानीहाटी में उनके दर्शनों के लिये चल पड़े। उन्‍होंने दूर से ही गंगा जी के किनारे बहुत-से भक्‍तों से घिरे हुए देवराज इन्‍द्र के समान देदीप्‍यमान उच्‍चासन पर बैठे हुए नित्‍यानन्‍द जी को देखा। उन्‍हें देखते ही इन्‍होंने भूमि पर लोटकर साष्‍टांग प्रणाम किया। किसी भक्‍त ने कहा- श्रीपाद! हिरण्‍य मजूमदार के कुँवर शाह रघुनाथदास जी आये हैं, वे प्रणाम कर रहे हैं।’

‘खिलखिलाते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- ‘अहा! रघु आया है? आज यह चोर जेल में से कैसे निकल भागा? इसे यहाँ आने की आज्ञा कैसे मिल गयी? फिर रघुनाथदास जी की ओर देखकर कहने लगे- ‘रघु! आ, यहाँ आकर मेरे पास बैठ।’

हाथ जोड़े हुए अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से डरते-से सिकुड़े हुए रघुनाथदास जी सभी भक्‍तों के पीछे जूतियों में बैठ गये। नित्‍यानन्‍द जी ने अब रघुनाथदास जी पर अपनी कृपा की। महापुरुष धनिकों को यदि किसी काम के करने की आज्ञा दें, तो उसे उनकी परम कृपा ही समझनी चाहि‍ये। क्‍योंकि धन अनित्‍य पदार्थ है और फिर यह एक के पास सदा स्‍थायी भी नहीं रहता। महापुरुष ऐसी अस्थिर वस्‍तु को अपनी अमोघ आज्ञा प्रदान कर स्थिर और सार्थक बना देते हैं। धन का सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग ही यह है कि उसका व्‍यय महापुरुषों की इच्‍छा से हो, किन्‍तु सुयोग सभी के भाग्‍य में नहीं होता। किसी भाग्‍यशाली को ऐसा अमूल्‍य और दुर्लभ अवसर प्राप्‍त हो सकता है।

नित्‍यानन्‍द जी के कहने से रघुनाथदास जी ने दो-चार हजार रूपये ही खर्च किये होंगे, किन्‍तु इतने ही खर्च से उनका वह काम अमर हो गया और आज भी प्रतिवर्ष पानीहाटी में ‘चूराउत्‍सव उनके इस काम की स्‍मृति दिला रहा है। लाखों मनुष्‍य उन दिनों रघुनाथदास जी के चिउरों का स्‍मरण करके उनकी उदारता और त्‍यागवृत्ति को स्‍मरण करके गद्गद कण्‍ठ से अश्रु बहाते हुए प्रेम में विभोर होकर नृत्‍य करते हैं। महामहिम रघुनाथदास जी सौभाग्‍यशाली थे, तभी तो नित्‍यानन्‍द जी ने कहा- ‘रघु! आज तो तुम बुरे फंसे, अब यहाँ से सहज में ही नहीं निकल सकते। मेरे सभी साथी भक्‍तों को आज दही-चिउरा खिलाना होगा। ‘बंगाल तथा बिहार में चिउरा को सर्वश्रेष्‍ठ भोजन समझते हैं! पता नहीं, वहाँ के लोगों को उनमें क्‍या स्‍वाद आता है? चिउरा कच्‍चे धानों को कूटकर बनाये जाते हैं और उन्‍हें दही में भिगोकर खाते हैं। बहुत-से लोग दूध में भी चिउरा खाते हैं। दही-चिउरा ही सर्वश्रेष्‍ठ भोजन है। इसके दो भेद हैं- दही-चिउरा और ‘चिउरा-दही’। जिसमें चिउरा के साथ यथेष्‍ट दही-चीनी दी जाय उसे तो ‘दही-चिउरा’ कहते हैं और जहाँ दही-चीनी का संकोच हो और चिउरा अधिक होने के कारण पानी में भिगोकर दही-चीनी में मिलाये जायँ वहाँ उन्‍हें ‘चिउरा-दही’ कहते हैं। बहुत-से लोग तो पहले चिउरों को दूध में भिगो लेते हैं, फिर उन्‍हें दही-चीनी से खाते हैं। अजीब स्‍वाद है। भिन्‍न-भिन्‍न प्रान्‍तों के भिन्‍न-भिन्‍न पदार्थों के साथ स्‍वाद भी भिन्‍न-भिन्‍न हैं। एक बात और। चिउरों में छूत-छात नहीं। जो ब्राह्मण किसी के हाथ की बनी पूड़ी तो क्‍या फलाहारी मिठाई तक नहीं खाते वे भी ‘दही-चिउरा, अथवा’ चिउरा-दही’ को मजे में खा लेते हैं।

नित्यानन्द जी की आज्ञा पाते ही रघुनाथदास जी ने फौरन आदमियों को इधर-उधर भेजा। बोरियों में भरकर मनों बढि़या चिउरा आने लगे। इधर-उधर से दूध-दही के सैकड़ों घड़ों को सिर पर रखे हुए सेवक आ पहुँचे। जो भी सुनता वही चिउरा-उत्‍सव देखने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार थोड़ी ही देर में वहाँ एक बड़ा भारी मेला-सा लग गया। चारों ओर मनुष्‍यों के सिर-ही-सिर दीखते थे। सामने सैकड़ों घड़ों में दूध-दही भरा हुआ रखा था। हजारों बड़े-बड़े मिट्टी के कुल्‍हड़ दही-चिउरा खाने के लिये रखे थे। दूध और दही के अलग-अलग चिउरा भिगोये गये। दही में कपूर, केसर आदि सुगन्धित द्रव्‍य मिलाये गये; केला, सन्‍देश, नारिकेल आदि भी बहुत-से मंगाये गये। जो भी वहाँ आया सभी को दो-दो कुल्‍हड़ दिये गये। नित्यानंद ने महाप्रभु का आह्वान किया किया। नित्यानंद जी ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्रीचैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिए आये हैं। उन्होंने उनके के लिए अलग पात्रों में चिउरा परोसे और ‘हरि-हरि’ ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वह वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त हो कर प्रसाद पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानंद जी का उच्छिष्ट प्रसाद मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानंद जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे।

दूसरे दिन उन्होंने नित्यानंदजी के चरणों मे प्रणाम करके उनसे आज्ञा माँगी। नित्यानन्द जी ने ‘चैतन्यचरणप्राप्ति’ का आशीर्वाद दिया। इस आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित ने उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी। तब रघुनाथ जी ने नित्यानंद जी के भण्डारी को बुलाकर सौ रुपये और सात तौला सोना नित्यानन्द जी के लिए दे दिया और उसे कहे दिया कि हम चले जायँ, तब प्रभु यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पाँच, बीस या पचास रुपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवंदना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रुपये और दो तौला सोना दे गये। इस प्रकार यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये।

वे शरीर से तो लौट आये, किंतु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सुझता ही नही था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किंतु वे सबके साथ प्रकटरूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। समय आने पर प्रारब्ध सभी सुरोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनंदन जी उनके पास आये।

प्रभु ने हंसकर कहा-‘कहीं अपने दुष्‍कर्म का फल भोग रहा होगा।’ तब उन्‍होंने उस वैष्‍णव के मुख से जो बात सुनी थी, वह कह सुनायी। इसके पूर्व ही भक्‍तों को हरिदास जी की आवाज एकान्‍त में प्रभु के समीप सुनायी दी थी, मानो वे सूक्ष्‍म-श्‍रीर से प्रभु को गायन सुना रहे हों। तब बहुतों ने यही अनुमान किया था कि हरिदास ने विष खाकर या और किसी भाँति आत्‍मघात कर लिया है और उसी के परिणामस्‍वरूप उसे प्रेतयोनि प्राप्‍त हुई है या ब्रह्मराक्षस हुआ है, उसी शरीर से वह प्रभु को गायन सुनाता है। किन्‍तु कई भक्‍तों ने कहा- ‘जो इतने दिन प्रभु की सेवा में रहा हो और नित्‍य श्री कृष्‍ण कीर्तन करता रहा हो, उसकी ऐसी दुर्गति होना सम्‍भव नहीं। अवश्‍य ही वह गन्‍धर्व बनकर अलक्षित भाव से प्रभु को गायन सुना रहा है। ‘आज श्रीवास पण्डित से निश्चित रूप से हरिदास जी की मृत्‍यु का समाचार सुनकर सभी को परम आश्‍चर्य हुआ और सभी उनके गुणों का बखान करने लगे। प्रभु ने दृढ़ता युक्‍त प्रसन्‍नता के स्‍वर में कहा-‘साधु होकर स्त्रियों से संसर्ग रखने वालों को ऐसा ही प्रायश्चित ठीक भी हो सकता है। हरिदास ने अपने पाप के उपयुक्‍त ही प्रायश्चित किया।’

नित्यानन्द ने महाप्रभु का आह्मन किया! नित्‍यानन्‍द जी को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्‍यक्ष श्री चैतन्‍य चिउरा-उत्‍सव देखने के लिये आये हैं। उन्‍होंने उनके लिये अलग पात्रों में चिउरा परोसे और ‘हरि-हरि’ ध्‍वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वही वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्‍य स्‍वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्‍त होकर प्रसार पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्‍यानन्‍द जी का उच्छिष्‍ट प्रसार मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्‍यानन्‍द जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्‍तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे।

दूसरे दिन उन्‍होंने नित्‍यानन्‍द जी के चरणों में प्रणाम करके उनसे आज्ञा मांगी। नित्‍यानन्‍द जी ने ‘चैतन्‍यचरणप्राप्ति’ का आशीर्वाद दिया। इन आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्‍नता हुई। उन्‍होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्‍तों को कुछ भेंट करने की इच्‍छा प्रकट की। राघव पण्डित उन्‍हें सहर्ष सम्‍मति दे दी। तब रघुनाथदास जी ने नित्‍यानन्‍द के भण्‍डारी को बुलाकर सौ रूपये और सात तोला सोना नित्‍यानन्‍द जी के लिये दिया और उससे कह दिया कि हम चले जाये, तब प्रभु पर यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्‍तों को बुलाकर यथायोग्‍य उन्‍हें दस, पांच, बीस या पचास रूपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवन्‍दना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रूपये और दो तोला सोना दे गये। इस प्रकार सभी की यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये।

वे शरीर से तो लौटा आये, किन्‍तु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्‍हें नीलाचल के सिवा कुछ सूझता नहीं था। जब उन्‍होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्‍त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्‍य से श्रीचैतन्‍य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्‍सुकता परिधि को पार कर गयी, किन्‍तु वे सबके साथ प्रकट रूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्‍त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे।

समय आने पर प्रारब्‍ध सभी सुयोगों को स्‍वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनन्‍दन जी उनके पास आये। उन्‍हें देखते ही रघुनाथदास जी ने उन्‍हें भक्ति भाव से प्रणाम किया। आचार्य ने स्‍नेह के साथ इनके कन्‍धे पर हाथ रखकर कहा- ‘भैया रघु! तुम उस पुजारी को क्‍यों नही समझाते? वह चार-पांच दिन से हमारे यहाँ पूजा करने आया ही नहीं। यदि वह नहीं कर सकता तो किसी दूसरे ही आदमी को नियुक्‍त कर दो’

धीरे-धीरे रघुनाथदास जी ने कहा- ‘नहीं, मैं उसे समझा दूंगा।’ यह कहकर वे धीरे-धीरे आचार्य के साथ चलने लगे। उनके साथ-ही-साथ वे बड़े फाटक से बाहर आ गये। प्रात:काल समझकर रात्रि जगे हुए पहरेदार सो गये थे। रघुनाथदास जी को बाहर जाते हुए किसी ने नहीं देखा। जब वे बातें करते-करते यदुनन्‍दनाचार्य जी के घर के समीप पहुँच गये तब उन्‍होंने धीरे से कहा- ‘अच्‍छा, तो मैं अब जाऊं?’

कुछ सम्‍भ्रम के साथ आचार्य ने कहा- ‘हाँ, हाँ, तुम जाओ। लो, मुझे पता भी नहीं, तुम बातों-ही-बातों में यहाँ तक चले आये! तुम अब जाकर जो करने योग्‍य कार्य हों, उन्‍हें करो। ‘बस, इसे ही वे गुरु-आज्ञा समझकर और अपने आचार्य महाराज की चरणवन्‍दना करके रास्‍ते को बचाते हुए एक जंगल की ओर हो लिये।

जो शरीर पर पहने थे, वही एक वस्‍त्र था। पास में न पानी पीने को पात्र था और न मार्गव्‍यय के लिये एक पैसा। बस, चैतन्‍यचरणों का आश्रय ही उनका पावन पाथेय था। उसे ही कल्‍पतरु समझकर वे निश्चिन्‍त भाव से पगडण्‍डी के रास्‍ते से चल पड़े। धूप-छांह की कुल भी परवा न करते हुए वे बिना खाये-पीये ‘गौर-गौर’ कहकर रुदन करते हुए जा रहे थे। जो घर के पास के बगीचे में भी पालकी से ही जाते थे, जिन्‍होंने कभी कोस भर भी मार्ग पैदल तय नहीं किया था, वे ही गोवर्धनदास मजूमदार के इकलौते लाड़िले लड़ैते लड़के कुवँर रघुनाथदास आज पंद्रह कोस- 30 मील शाम तक चले और शाम को एक ग्‍वाले के घर में पड़ रहे। भूख-प्‍यास का इन्‍हें ध्‍यान नहीं था। ग्‍वाले ने थोड़ा-सा दूध लाकर इन्‍हें दे दिया, उसे ही पीकर ये सो गये और प्रात:काल बहुत ही सवेरे फिर चल पड़े। वे सोचते थे, यदि पुरी जाने वाले वैष्‍णवों ने भी हमें देख लिया तो फिर हम पकड़े जायँगे। इसीलिये वे गांवों में न होकर पगडण्‍डी के रास्‍ते से जा रहे थे।

इधर प्रात:काल होते ही रघुनाथदास जी खोज होने लगी। रघुनाथ यहाँ, रघुनाथ वहाँ, यही आवाज चारों ओर सुनायी देने लगी। किन्‍तु रघुनाथ यहाँ वहाँ कहाँ? वह तो जहाँ का था वहाँ ही पहुँच गया। अब झींखते रहो। माता छटपटाने लगी, स्‍त्री सिर पीटने लगी, पिता आँखें मलने लगे, ताऊ बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े। उसी समय गोवर्धनदास मजूमदार ने पांच घुड़सवारों को बुलाकर उनके हाथों शिवानन्‍द सेन के पास एक पत्री पठायी कि ‘रघु घर से भागकर तुम्‍हारे साथ पुरी जा रहा है। उसे फौरन इन लोगों के साथ लौटा दो।’ घुड़सवार पत्री लेकर पुरी जाने वाले वैष्‍णवों के पास रास्‍ते में पहुँचे। पत्र पढ़कर सेन महाशय ने उत्तर लिख दिया- रघुनाथदास जी हमारे साथ नहीं आये हैं, न हमसे उनका साक्षात्‍कार ही हुआ। यदि वे हमें पुरी मिलेंगे तो हम आपको सूचित करेंगे।’ उत्तर लेकर नौकर लौट आये। पत्र को पढ़कर रघुनाथदास जी के सभी परिवार के प्राणी शोकसागर में निमग्‍न हो गये।

इधर रघुनाथदास जी मार्ग की कठिनाईयों की कुछ परवा न करते हुए भूख-प्‍यास और सर्दी-गर्मी से उदासीन होते हुए पचीस-तीन दिन के मार्ग को केवल बारह दिनों में ही तय करके प्रभुसेवित श्री नीलाचंलपुरी में जा पहुँचे। उस समय महाप्रभु श्री स्‍वरूपादि भक्‍तों के सहित बैठे हुए कृष्‍ण कथा कर रहे थे। उसी समय दूर से ही भूमि पर लेटकर रघुनाथदास जी ने प्रभु के चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया। सभी भक्‍त सम्‍भ्रम के सहित उनकी ओर देखने लगे। किसी ने उन्‍हें पहचाना ही नहीं। रास्‍ते की थकान और सर्दी-गर्मी के कारण उनका चेहरा एकदम बदल गया था। मुकुन्‍द ने पहचाकर जल्‍दी से कहा- प्रभो! रघुनाथदास जी हैं।’

प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही उल्‍लास के साथ कहा-‘हां, रघु आ गया? बड़े आनन्‍द की बात है।’ यह कहरक प्रभु ने उठकर रघुनाथदास जी का आलिंगन किया। प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही रघुनाथदास जी की सभी रास्‍ते की थकान एकदम मिट गयी। वे प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे, प्रभु अपने कोमल करों से उनके अश्रु पोंछते हुए धीरे-धीरे उनके सिर पर हाथ फेरने लगे। प्रभु के सुखद स्‍पर्श से सन्‍तुष्‍ट होकर रघुनाथदास जी ने उपस्थित सभी भक्‍तों के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और सभी ने उनका आलिंगन किया। रघुनाथदास जी के उतरे हुए चेहरे को देखकर प्रभु ने स्‍वरूप दामोदर जी से कहा-‘स्‍वरूप! देखते हो न, रघुनाथ कितने कष्‍ट से यहाँ आया है। इसे पैदल चलने का अभ्‍यास नहीं है। बेचारे को क्‍या काम पड़ा होगा? इनके पिता और ताऊ को तो तुम जानते ही हो। चक्रवर्ती जी (प्रभु के पूर्वाश्रम के नाना श्री नीलाम्‍बर चक्रवर्ती)-के साथ उन दोनों का भ्रातृभाव का व्‍यवहार था, इसी सम्‍बन्‍ध से ये दोनों भी हमें अपना देवता करके ही मानते हैं। घोर संसारी हैं। वैसे साधु-वैष्‍णवों की श्रद्धा के साथ सेवा भी करते हैं, किन्‍तु उनके लिये धन-सम्‍पत्ति ही सर्वश्रेष्‍ठ वस्‍तु है। वे परमार्थ से बहुत दूर हैं। रघुनाथ के ऊपर भगवान ने परम कृपा की, जो इसे उस अन्‍धकूप से निकालकर यहाँ ले आये।

रघुनाथदास जी ने धीरे-धीरे कहा-‘मैं तो इसे श्रीचरणों की ही कृपा समझता हूँ, मेरे लिये तो ये ही युगलचरण सर्वस्‍व हैं।’ महाप्रभु ने स्‍नेह के स्‍वर में स्‍वरूप गोस्‍वामी से कहा-‘रघुनाथ को आज से मैं तुम्‍हें ही सौंपता हूँ। तुम्‍हीं आज से इनके पिता, माता, भाई, गुरु और सखा सब कुछ हो। आज से मैं इस ‘स्‍वरूप का रघु’ कहा करूंगा।’ यह कहकर प्रभु ने रघुनाथदास जी का हाथ पकड़कर स्‍वरूप के हाथ में दे दिया। रघुनाथदास जी ने फिर से स्‍वरूप दामोदर जी के चरणों में प्रणाम किया और स्‍वरूप गोस्‍वामी ने भी उन्‍हें आलिंगन किया।

उसी समय गोविन्‍द ने धीरे से रघुनाथ को बुलाकर कहा-‘रास्‍ते में न जाने कहाँ पर कब खाने को मिला होगा, थोड़ा प्रसाद पा लो।’ रघुनाथ जी ने कहा,’समुद्रस्‍नान और श्री जगन्‍नाथ जी के दर्शनों के अनन्‍तर प्रसाद पाऊंगा।’ यह कहकर वे समुद्रस्‍नान करने चले गये और वहीं से श्री जगन्‍नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के वासस्‍थान पर लौटा आये।
महाप्रभु के भिक्षा कर लेने पर गोविन्‍द प्रभु का उच्छिष्‍ट महाप्रसाद रघुनाथदास जी को दिया। प्रभु का प्रसादी महाप्रसाद पाकर रघुनाथ जी वहीं निवास करने लगे। गोविन्‍द उन्‍हें नित्‍य महाप्रसाद दे देता था और ये उसे भक्ति-भाव से पा लेते थे। इस प्रकार ये घर छोड़कर विरक्‍त-जीवन बिताने लगे।

क्रमशः अगला पोस्ट [149]
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[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



, Shri Hari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Chant] Harekrishna Hareram Renunciation of Shri Raghunathdas ji

He will not be a teacher, nor will he be a relative He would not be the father, nor would she be the mother. Destiny will not be that and her husband will not be- He who does not release the approaching death.

Readers must not have forgotten Mr. Raghunathdas, son of Mr. Govardhandas Majumdar, the landlord of Saptagram. He had darshan of the Lord while staying at Advaitacharya ji’s house in Shantipur and the Lord had advised him to give up mercantile asceticism and do Bhagwat-Bhajan while staying at home and on his urgent request to leave the house, the Lord had said- ‘Well we will see. Now you go home, we will soon go to Vrindavan, when we return from here, then do as it is appropriate.’ Now when Raghunath ji heard that the Lord has returned to Puri after traveling to Vrajmandal, then he became very eager to see the feet of Chaitanya. His mind became mad to drink the nectar of the Lord’s plant, he passed the time thinking of Gauranga. Outwardly, he used to do all the worldly works, but inside his heart, the fire of Chaitanya Virahajani kept burning. He would have taken shelter at the feet of Chaitanya leaving everything at the same time, but at that time a strange incident happened in his family!

The contract of Saptagram was earlier on a Muslim landowner. He was the Chaudhary of that circle, from him only they got the right of this area. He kept one-fourth of the income with himself every year and deposited three parts in the court of the emperor. The entire income of that circle was twenty lakh rupees annually. According to calculations, these Majumdar brothers should have deposited fifteen lakhs in the Rajdarbar and kept five lakhs with themselves, but they could have deposited only twelve lakhs and kept eight lakhs themselves with the wisdom of their Kayasthap. The old Chowdhary was irritated by the fact that by keeping the contract with him for a long time, he should have got the permanent right to be the owner of the land, because the contract becomes permanent after twelve years. Showing his authority in the royal court, he prosecuted these two brothers and got the Rajmantri on his side. That’s why the government officials came to catch them. Hearing the news of his arrest, both the brothers Hiranyadas and Govardhandas fled away from home. Raghunathdas ji was left alone at home, Chaudhary got him arrested and sent him to jail.

Here he was threatened and intimidated everyday to reveal the address of his tau (elder brother of father) and father, but what did he know about them, so he could not tell anything. Enraged by this, Chaudhary used to try to torture him in various ways, intelligent and self-born Raghunathdas ji thought – ‘It will not work like this. One way or the other this Chaudhary should be brought under control.’

With this determination, they started thinking of ways in their mind. One day when Chaudhary wanted to trouble him a lot, then showing natural affection, he said in a very soft voice – ‘Chaudhary ji! why do you bother me? My uncle, father and you all three are brothers. Till now I consider all three of you as brothers. Whether you three brothers fight with each other or live in love, why bother me in the middle? You are fighting today, tomorrow again all the brothers will unite. I am their boy as is your boy. I also consider you as my elder uncle. You are not illiterate at all, you know everything. It doesn’t suit you to treat me like this.’

Hearing such words of affection and simplicity from a mouth blooming like a rose, Chaudhary’s hard heart also shuddered. He hugged Raghunathdas ji with his thick arms and with tears in his eyes started saying in a gleeful voice – ‘ Son! Really I committed a big sin due to the greed of money. You are like a dead son, from today you are my son. I will get you released by asking the Rajmantri right now. Wherever your uncle and father are, inform them that now there is nothing to be afraid of. May they come back to their homes happily. ‘ By saying this, he freed Raghunathdas ji from the Rajmantri. They came to their home and started living. Now they have come to know the real form of this world. Till now they thought that there might be some happiness in this world, but from this incident they came to know that the world is a house of sorrow and discord. Somewhere people are dying due to the sorrow of poverty, the workers who are tortured are roaming like dogs after the bastards. Somewhere someone is fighting with his brother, and somewhere there is a tussle between father and son. Somewhere someone has got the zamindari of ten-twenty villages or has got a good royal job or royal title, then he is considering the people who are crushed in his head as insignificant.

If someone’s poetry has been praised by the art scholars, then he considers himself to be Ushna and Ved Vyas. Some are obsessed with learning, some with money, some with wealth, authority and prestige. If someone’s son is a fool, then he always remains sad in his concern. On the contrary, if someone has a son who is full of all virtues, then the father’s heart starts beating if he has a little disease, if he dies, then there is sorrow like death. Where is the happiness, where is the peace, where is the joy and happiness in such a world? Here, everywhere there is a kingdom of extreme sadness, terrible sorrow and various kinds of worries. True happiness lies only at the feet of the embodied Sri Guru. One can attain supreme peace by going to his feet only. Those who do not want prestige, do not want leadership, those who do not desire respect, honor, glory and guruship, who have completely given up the desire to become a famous man in this world, for them other than the feet of the Guru, there is no one other than the feet of the Guru who can bring happiness, peace and bliss. And there is no place to provide coolness. That’s why now I will not stay in this house full of worldly pleasures. Now I will take refuge in the feet of Shri Chaitanya, I will play like a child in his soothing core. I will lick their arun colored beautiful soles with my tongue and I will be satisfied with the same Amritopam Madhuri.

There is no other means of happiness except the sacred pollen of the living feet. Thinking of this, he ran away to Puri several times, but the rich father got him caught again by his well-mannered servants and put ten-five guards on top of him to keep an eye on him always. Now they started living inside the guards like prisoners. They cannot go anywhere alone even for a moment, saving the eyes of the people. This increased their separation even more. Yeh ‘ha gaur! Ha Pranvallabh! Saying this, he started crying loudly. Sometimes crying out loud, they used to say- ‘O Hridayaraman! When will you get out of this painful ocean? When will you surrender at your feet? When will you adopt this abomination? When will you call it to you? At what time will you extinguish the burning flame of this heart with your honeyed nectar words of devotion-tattva.

Oh my life all! O rudder of my rudderless boat! Lord of my dilapidated ways! Take me out of this dark well by holding my arm.’ Hearing such senseless delirium of his head and feet, the loving mother started feeling immense sorrow for him. She told her husband, her father Govardhandas Majumdar- ‘The only support of our family, one Raghu has gone mad. Keep it tied, lest it run away.’

Sighing in a poignant voice, the father said- ‘Raghu has another type of madness. He wants to break the worldly bondage. It is not going to stop by tying it with a rope. For how many days can the poor rope tie the one who is not able to tie in the house, who has immense wealth like Kuber, immense happiness like a king, beautiful woman like Apsara and incomparable wealth which is never attained by the unfortunate?’ The mother was deeply saddened by her husband’s answer and by the madness of her son. Father started keeping an eye on Raghunath very well.

In those days, Shripad Nityanand ji was roaming around the villages and making a splash of Sankirtan. He was roaming here and there with hundreds of his devotees who were madly in love with Chaitanya. People were amazed to see his defiant dance, his fame and fame spread all around. Thousands, lakhs of people started coming to have darshan of Nityananda Prabhu. In those days, the name of ‘Nitai’ was famous in Gaur country. Good Seth-moneylenders and landowners used to come and return at their feet and they kept their feet fearlessly on their heads, they would return grateful. Lakhs of rupees started coming as gifts. Nityanand ji very generously started distributing them among the devotees and started spending the money in good deeds. Panihati became the main center of Sankirtan. There Raghav Pandit was a great devotee of Mahaprabhu and Nityanand ji. Nityanand ji used to stay more at his place. When Raghunath ji heard the news of Nityanand ji, he took his father’s permission and went to Panihati with twenty servants to visit him. From afar, he saw Nityananda sitting on a high seat, resplendent like Lord Indra, surrounded by many devotees on the banks of the Ganges. On seeing him, he prostrated on the ground. Some devotee said – Shripad! Kunwar Shah Raghunathdas ji of Hiranya Mazumdar has come, he is saluting.

Laughing, Nityanand ji said – ‘Aha! Raghu has come? How did this thief escape from the jail today? How did it get permission to come here? Then looking at Raghunathdas ji, he said – ‘Raghu! Come here and sit with me.’

Raghunathdas ji, shrunken in fear with folded hands, very humbly, sat in his shoes behind all the devotees. Nityanand ji has now showered his blessings on Raghunathdas ji. If the great man orders the rich to do some work, then it should be understood as his ultimate grace. Because money is a temporary thing and then it does not remain with one forever. Great men make such an unstable thing stable and meaningful by giving their unfailing orders. The best use of money is that it should be spent according to the will of great men, but luck is not in everyone’s fortune. A lucky one may get such a priceless and rare opportunity.

According to Nityanand ji, Raghunathdas ji must have spent two to four thousand rupees only, but with this much expenditure, his work became immortal and even today, every year in Panihati, the ‘Chur Utsav’ is reminding him of this work. Lakhs of human beings in those days remembering Raghunathdas ji’s chiuron, remembering his generosity and sacrifice, shed tears from the gadgad throat and dance in love. His Excellency Raghunathdas ji was fortunate, that’s why Nityanand ji said – ‘Raghu! Today you are badly trapped, now you cannot get out of here easily. All my fellow devotees will have to be fed dahi-chiura today. ‘Chiura is considered the best food in Bengal and Bihar! Don’t know, what taste do the people there have in them? Chiura is made by pounding raw paddy and eating it after soaking it in curd. Many people also eat Chiura in milk. Curd-Chiura is the best food. It has two differences – Dahi-Chiura and ‘Chiura-Dahi’. In which curd-sugar is given along with Chiura, it is called ‘Dahi-Chiura’ and where there is hesitation of curd-sugar and due to excessive Chiura, soaked in water and mixed with curd-sugar, they are called ‘Chiura-Dahi’. Huh. Many people first soak chiuras in milk and then eat them with curd and sugar. Strange taste. The taste also varies with different ingredients from different regions. One more thing. There is no untouchability in chirus. Those Brahmins who do not even eat Puri made by someone’s hand, do not even eat fruit sweets, they also eat ‘Dahi-Chiura’, or ‘Chiura-Dahi’ with pleasure.

Raghunathdas ji immediately sent men here and there as soon as he got permission from Nityanand ji. Filled in sacks, good chiura started coming. Servants arrived from here and there carrying hundreds of pitchers of milk and curd on their heads. Whoever heard of it would have run to see the Chiura-festival. In this way, in a short time, a big huge fair was organized there. Human heads were visible all around. Hundreds of pitchers filled with milk and curd were kept in front. Thousands of big earthen pots were kept for eating curd and chiura. Different chips of milk and curd were soaked. Aromatic substances like camphor, saffron etc. were added to the curd; Many bananas, sandesh, coconut etc. were also brought in. Whoever came there was given two axes each. Nityananda invoked Mahaprabhu. Nityananda ji appeared as if Sri Chaitanya had come to see the Chiura-festival. He served Chiura for them in separate vessels and with the sound of ‘Hari-Hari’ ordered everyone to have the Prasad. Fifty men were serving. Whoever got a place, sat there and started getting prasad, everyone experienced a kind of divine taste in the chiur of that day, everyone got very satisfied and got prasad. Whoever kept coming till evening, kept giving prasad to him. Raghunathdas ji got the best prasad of Nityanand ji. Nityanand ji’s food was cooked at Raghav Pandit’s place that day. All the devotees together found him in the evening. Raghunathdas stayed there at Raghav Pandit’s house that day.

The next day he bowed down at the feet of Nityanandji and asked him for permission. Nityanand ji blessed ‘Chaitanya Charan Prapti’. Raghunathdas ji was very happy after getting this blessing. He called Raghav Pandit and expressed his desire to offer something to the devotees. Raghav Pandit happily gave him consent. Then Raghunath ji called Nityanand ji’s steward and gave him hundred rupees and seven tolas of gold for Nityanand ji and told him to go away, then God should reveal this thing. Then called all the devotees and offered them ten, five, twenty or fifty rupees as per their merit and worshiped them all. While leaving, he also gave one hundred rupees and two tolas of gold to Raghav Pandit. In this way Raghunathdas ji returned to his home after worshiping properly.

He returned from the body, but his mind reached the Lord in Neelachal. Now he could not think of anything except Neelachal. When he heard that hundreds of devotees of Gaudesh were going to Nilachal on the occasion of Rath Yatra as always to stay at Sri Chaitanya’s feet for four months, then his curiosity crossed the periphery, but he apparently went to Nilachal with everyone. How could he? That’s why they started doing the industry of running away from home hiding in solitude someday. When the time comes, Prarabdha himself brings all the clues and makes them present. One day at the time of sunrise, Raghunath ji’s Guru and Acharya Yadunandan ji came to him.

Prabhu laughed and said – ‘Somewhere he must be suffering the fruits of his misdeeds.’ Then he narrated what he had heard from the mouth of that Vaishnava. Even before this, the voice of Haridas ji was heard by the devotees near the Lord in solitude, as if he was listening to the Lord’s singing from the subtle-body. Then many had speculated that Haridas had committed suicide by consuming poison or in some other way and as a result of that he had attained Pretyoni or became a Brahmarakshasa, from the same body he sings to the Lord. But many devotees said – ‘ It is not possible for one who has been in the service of the Lord for so many days and has been chanting Shri Krishna’s kirtan daily. He must be singing the praises of the Lord by being a Gandharva. ‘Today everyone was extremely surprised to hear the news of Haridas ji’s death from Shreevas Pandit and everyone started talking about his qualities. The Lord said in a voice of firm happiness – ‘Such atonement can also be right for those who have intercourse with women after being a saint. Haridas made proper atonement for his sin.’

Nityananda invoked Mahaprabhu! It appeared to Nityanand ji, as if Pratyaksh Sri Chaitanya had come to see the Chiura-festival. He served Chiura to them in separate vessels and with the sound of ‘Hari-Hari’ ordered everyone to receive the prasad. Fifty men were serving. Whoever got a place, sat there and started getting prasad, everyone experienced a kind of divine taste in the chiur of that day, everyone was very satisfied and spread. Whoever kept coming till evening, kept giving prasad to him. Raghunathdas ji got the best spread of Nityanand ji. On that day, Nityananda’s food was cooked at Raghav Pandit’s place. All the devotees together found him in the evening. Raghunathdas stayed there at Raghav Pandit’s house that day.

On the second day, he prostrated at the feet of Nityanand ji and sought his permission. Nityanand ji blessed ‘Chaitanya Charan Prapti’. Raghunathdas ji was very happy after getting these blessings. He called Raghav Pandit and expressed his desire to offer something to the devotees. Raghav Pandit happily gave him consent. Then Raghunathdas ji called Nityanand’s storekeeper and gave him hundred rupees and seven tolas of gold for Nityanand ji and told him to leave, then this thing should be revealed to the Lord. Then called all the devotees and offered ten, five, twenty or fifty rupees to them as per their merit and worshiped them all. While leaving, he also gave one hundred rupees and two tolas of gold to Raghav Pandit. In this way, Raghunathdas ji returned to his home after worshiping everyone properly.

He returned from his body, but his mind reached to the Lord in Nilachal. Now he could not understand anything except Neelachal. When he heard that hundreds of devotees of Gaudesh were going to Nilachal to stay at the feet of Sri Chaitanya for four months on the occasion of Rath Yatra as always, then his eagerness crossed the perimeter, but he apparently went to Nilachal with all of them. How could you have gone? That’s why they started doing the industry of running away from home hiding in solitude someday.

When the time comes, the destiny brings all the opportunities by itself. One day at the time of sunrise, Raghunath ji’s Guru and Acharya Yadunandan ji came to him. On seeing him, Raghunathdas ji bowed down to him with devotion. Acharya lovingly put his hand on his shoulder and said – ‘Brother Raghu! Why don’t you explain to that priest? He did not come to worship at our place for four-five days. If he can’t do it, appoint someone else’

Slowly Raghunathdas ji said- ‘No, I will make him understand.’ Saying this, he slowly started walking with Acharya. Together with them they came out of the big gate. Thinking it was morning, the night watchmen had gone to sleep. No one saw Raghunathdas ji going out. When he reached near the house of Yadunandanacharya ji while talking, he said softly – ‘Okay, so shall I go now?’

With some confusion the Acharya said – ‘Yes, yes, you go. Look, I don’t even know, you have come here just by talking! You go and do whatever work is worth doing now. ‘ That’s all, considering this as Guru’s order and saluting the feet of his Acharya Maharaj, he went towards a forest while saving the way.

What was worn on the body was a garment. There was neither a pot of water nearby nor a penny for travel expenses. Simply, the shelter of Chaitanya’s feet was his holy path. Thinking him to be Kalpataru, they walked on the footpath with a carefree spirit. Without caring for the sun and shade, they were going crying saying ‘Gaur-Gaur’ without eating or drinking. The one who used to go to the garden near the house in a palanquin, who had never covered even a kos on foot, the only beloved fighting boy of Govardhandas Majumdar, Kuvar Raghunathdas walked fifteen kos – 30 miles till evening and in the evening one Staying in Gwale’s house. He was not aware of hunger and thirst. The cowherd brought some milk and gave it to them, after drinking it they fell asleep and started again very early in the morning. They used to think, if the Vaishnavas going to Puri also saw us, then we would be caught. That’s why they were going through the footpath instead of going through the villages.

Here, as soon as the morning broke, the search for Raghunathdas ji started. Raghunath here, Raghunath there, this sound was heard all around. But where is Raghunath here and there? He has reached where he belonged. Now keep blinking. Mother started sobbing, woman started banging her head, father started rubbing his eyes, uncle fainted and fell on the ground. At the same time, Govardhandas Majumdar called five horsemen and sent a letter to Shivanand Sen that ‘ Raghu is going to Puri with you after running away from home. Return him immediately with these people.’ The horsemen reached the Vaishnavas on their way to Puri carrying the letter. After reading the letter, Sen Mahasaya wrote a reply – Raghunathdas ji has not come with us, nor did we meet him. We will inform you if we get Puri. The servants returned with the answer. After reading the letter, all the family members of Raghunathdas ji got immersed in grief.

Here, Raghunathdas ji, not caring about the difficulties of the way, being indifferent to hunger-thirst and cold-heat, covered the twenty-five-three-day route in only twelve days and reached Prabhusevit Shri Neelachanlpuri. At that time Mahaprabhu Shri Swaroopadi was sitting with the devotees and was reciting Krishna Katha. At the same time Raghunathdas ji prostrated at the feet of the Lord by lying on the ground from a distance. All the devotees started looking at him with confusion. No one recognized him at all. His face had completely changed due to the fatigue of the journey and the cold and heat. Recognizing Mukund quickly said – Lord! Raghunathdas ji is there.

Prabhu said with great enthusiasm – ‘Yes, Raghu has come? It is a matter of great joy. This Kaharak Prabhu got up and hugged Raghunathdas ji. Raghunathdas ji’s tiredness of all the way was completely removed as soon as he received the love of the Lord. They started crying in love, the Lord started wiping their tears with his soft hands and slowly started turning their hands on their heads. Satisfied by the pleasant touch of the Lord, Raghunathdas ji prostrated at the feet of all the devotees present and all embraced him. Seeing the fallen face of Raghunathdas ji, the Lord said to Swaroop Damodar ji – ‘Swaroop! Do you see, Raghunath has come here with so much trouble. He is not used to walking. What work would the poor fellow have had to do? You already know their father and uncle. Chakraborty ji (Mr. Nilambar Chakraborty, maternal grandfather of Prabhu’s Purvashram) – both of them had a brotherly relationship, due to this relation both of them also consider us as their deity. Very worldly. By the way, sages also serve Vaishnavas with devotion, but for them wealth and property is the best thing. They are far away from God. God blessed Raghunath, who took him out of that dark well and brought him here.

Raghunathdas ji slowly said – ‘I consider it as the grace of the feet of the feet, for me these feet are everything.’ Mahaprabhu said to Swaroop Goswami in a tone of affection – ‘From today I hand over Raghunath to you only. From today you are his father, mother, brother, teacher and friend. From today I will call this ‘Swaroop ka Raghu’. By saying this, the Lord took hold of Raghunathdas ji’s hand and gave it to Swaroop. Raghunathdas ji again prostrated at the feet of Swaroop Damodar ji and Swaroop Goswami also embraced him.

At the same time, Govind gently called Raghunath and said – ‘Don’t know where and when you will get food on the way, get some prasad.’ Raghunath ji said, ‘I will get prasad after taking sea bath and having darshan of Shri Jagannath ji.’ Saying this, he went to take a sea bath and from there, having darshan of Shri Jagannath ji, returned to the abode of the Lord. After Mahaprabhu took alms, Govind Prabhu’s leftover Mahaprasad was given to Raghunathdas ji. Raghunath ji started living there after getting Prasadi Mahaprasad of the Lord. Govind used to give him Mahaprasad daily and he used to get it with devotion. In this way, he left home and started living a lonely life.

respectively next post [149] , [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

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