[162]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

IMG WA

।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
गम्‍भीरा-मन्दिर में श्री गौरांग

प्रेमानामाद्भुतार्थ श्रवणपथगत: कस्‍या नाम्‍नां महिम्‍न:
को वेत्‍ता कस्‍य वृन्‍दावनविपिनमहामाधुरीषु प्रवेश:।
को वा जानाति राधां परमरसचमत्‍कारमाधुर्यसीमा
मेकश्‍चैतन्‍यचन्‍द्र: परमकरुणया सर्वमाविश्‍चकार।।

महाप्रभु गौरांगदेव चौबीस वर्ष की अल्‍पावस्‍था में कठोर संन्‍यास-धर्म की दीक्षा लेकर पुरी पधारे। पहले छ: वर्षों में तो वे भारतवर्ष के विविध तीर्थों में भ्रमण करते रहे और सबसे अन्‍त में आपने श्री वृन्‍दावन धाम की यात्रा की। महाप्रभु की यही अन्तिम यात्रा थी। वृन्‍दावन से लौटकर अन्‍त के अठारहों वर्षों तक आप अविच्छिन्‍न भाव से सचल जगन्‍नाथ के रूप में पुरी अथवा नीलाचंल में ही अवस्थित रहे। फिर आपने पुरी की पावन पृथ्वी का परित्‍याग करके कहीं को भी पैर नहीं बढाया।

गौड़े देश से रथ यात्रा के समय प्रतिवर्ष बहुत से भक्‍त आया करते थे। और वे बरसात के चार महीनों तक प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट रहकर अपने-अपने स्थानों को चले जाया करते थे। छ: वर्षों तक तो प्रभु उनके साथ उसी प्रकार क्रीड़ा, उत्‍सव और संकीर्तन करते रहे। अन्त में आपका प्रेमोन्‍माद साधारण सीमा का उल्‍लंघन करके पराकाष्‍ठा तक पहुँच गया, उसमें फिर भला इस प्राकृतिक शरीर का होश कहाँ, ये तो प्रकृति के परे की बात है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों का वहाँ प्रवेश नहीं, यह सब तो त्रिगुणातीत विषय है। उसमें मिलना-जुलना, बातचीत करना, खाना-पीना तथा अन्‍यान्‍य कार्यों का सम्‍पादन करना हो ही नहीं सकता। शरीर स्‍वयं ही यंत्र के समान इन कार्यों को आवश्‍यकतानुसार करता रहता है। चित्त से इन कामों का कोई सम्‍बन्‍ध नहीं, चित्त तो अविच्छिन्‍न भाव से उसी प्रियतम की रूपमाधुरी का पान करता रहता है। महाप्रभु का चित्त भी बारह वर्षों तक शरीर को छोड़कर वृन्‍दावन के किसी काले रंग के ग्‍वाल-बालक के साथ चला गया था। उनका बेमन का शरीर पुरी में काशी मिश्र के विशाल घर के एक निर्जन गम्‍भीरा-मन्दिर में पड़ा रहता था। इससे पूर्व कि हम महाप्रभु की उस दिव्‍योन्‍मादकारी प्रेमावस्‍था के सम्‍बन्‍ध में कुछ कहें, यह जान लेना आवश्‍यक है कि वह गम्‍भीरा-मन्दिर वास्‍तव में क्‍या है?

श्री जगन्‍नाथ जी के मन्दिर के समीप ही उड़ीसाधिप महाराज प्रतापरुद्र जी के कुल गुरु पण्डित काशी मिश्र जी के विशाल घर में प्रभु निवास करते थे। मिश्र जी का वह भवन बहुत ही बड़ा था। अनुमान से जाना जाता है कि उसमें तीन परकोटे रहे होंगे और सैकड़ों मनुष्‍य उसमें सुखपूर्वक रह सकते होंगे। तभी तो गौड़ देश से आये हुए प्राय: सभी भक्त चार महीनों तक वहीं निवास करते थे। महाप्रभु उसी भवन में रहते थे। अन्‍यान्‍य दूसरे मकानों में परमानन्‍द पुरी, ब्रह्मानन्‍द भारती, स्‍वरूपदामोदर, रघुनाथदास, जगदानन्‍द, वक्रेश्‍वर पण्डित तथा अन्‍यान्‍य विरक्‍त भक्‍त रहते थे।

महाप्रभु सदा से ही एकान्‍तप्रिय थे, उन्‍हें भीड़-भाड़ में विशेष रहना अरुचिकर था। उसी भवन में एकान्‍त में एक गुफा की तरह छोटा-सा स्‍थान था, वह कोलाहल-शून्‍य, एकदम निभृत और नीरव मन्दिर था। महाप्रभु जब सबसे पृथक होकर एकान्‍त की इच्‍छा करते तब उस निभृत मन्दिर में जाकर विश्राम करते। उसका दरवाजा इतना छोटा था कि एक आदमी ही उसमें संकोच के साथ घुस सकता था। महाप्रभु जब थक जाते या भीड-भाड से ऊब जाते तो उसमें जाकर सो जाते।

महाप्रभु जैसे भक्‍तवत्‍सल और कृपालु स्‍वामी थे उसी प्रकार का सच्‍चा स्‍वामिभक्‍त उन्‍हें गोविन्‍द नामक सेवक भी प्राप्‍त हुआ था। गोविन्‍द का महाप्रभु के प्रति वात्‍सल्‍यभाव था, वह नि:स्‍वार्थभाव से बडी ही तत्‍परता के साथ प्रभु के शरीर की खूब ही देख-रेख रखता। एक दिन महाप्रभु संकीर्तन से श्रान्‍त होकर गम्‍भीरा के दरवाजे पर पड़कर सो रहे। नियमानुसार गोविन्‍द आया और उसने कहा– ‘प्रभो ! मैं शरीर की मालिश करूँगा, मुझे भीतर आने दीजिये।’ प्रभु तो भावावेश में बेहोश पड़े थे। उन्‍हें शरीर-मर्दन का क्‍या ध्‍यान? दो चार बार प्रार्थना करने पर आपने पड़े-ही पड़े कह दिया– ‘आज नहीं, जाओ सो रहो।’
गोविन्‍द ने विनीत भाव से कहा- ‘प्रभो ! मेरा नित्‍य का नियम है, मुझे आज सेवा से वंचित न कीजिये।’
प्रभु ने झुँझलाकर कहा– ‘नहीं, यह सब कुछ नहीं, शरीर में बड़ी पीड़ा हो रही है मुझसे उठा नहीं जाता, जाकर सो रहो।’
गोविन्‍द ने फिर अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से कहा– ‘प्रभो ! थोडे हट जायँ, बस मैं एक पैर देकर ही भीतर आ जाऊँगा, मुझे नींद न आवेगी।’

प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह से कहा– ‘भैया गोविन्‍द ! मुझमें हिलने की भी सामर्थ्‍य नहीं।’ सेवापरायण स्‍वामिभक्‍त सेवक क्‍या करता? सेवा करना उसका प्रधान कर्तव्‍य है। प्रभु को लाँघकर जाना पाप है, किन्‍तु उनकी सेवा न करना यह उससे भी अधिक पाप है। इसलिये वह सोचकर कि ‘चाहे मुझे नरक ही क्‍यों न भोगना पड़े, मैं सेवा में प्रमाद नहीं करूँगा।’ यह सोचकर वह प्रभु को लांघकर ही चला गया और वहाँ जाकर उसने प्रभु की चरण सेवा की तथा सम्‍पूर्ण शरीर को धीरे-धीरे दबाया। बहुत देर हो जाने पर प्रभु को चैतन्‍यता प्राप्‍त हुई। तब आपने गोविन्‍द को पास ही बैठा देखकर पूछा– ‘अरे गोविन्‍द ! तू अभी तक बैठा ही है, सोने क्‍यों नहीं गया?
उसने कहा– ‘प्रभु ! सोने कैसे जाता, आप तो दरवाजे को घेरकर शयन कर रहे हैं।’

प्रभु ने पूछा–‘तब तू आया कैसे था?’
गोविन्‍द ने कुछ लज्जित स्‍वर में कहा– ‘प्रभो ! मैं आपके श्री अंग को लांघ करके ही आया था, इसके लिये मुझे जितने दिनों तक भी नरक भोगना पड़े उतने दिनों तक सहर्ष नरक भोग सकता हूँ। आपके शरीर की सेवा के निमित्त मैं सब कुछ कर सकता हूँ, किन्‍तु अपने सोने के लिये मैं ऐसा पाप नहीं कर सकता।’ उसकी ऐसी निष्‍ठा देखकर प्रभु ने उसे छाती से लगाया और उसे श्रीकृष्‍ण-प्रेम प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

इस घटना से भी जाना जाता है कि गम्‍भीरा-मन्दिर बहुत ही छोटा होगा। पहले तो महाप्रभु यदा-कदा ही उसमें शयन करते रहे, ज्‍यों-ज्‍यों उनकी एकान्‍तनिष्‍ठा बढ़ती गयी और प्रेमोन्‍माद बढ़ता गया, त्‍यों ही त्‍यों वे गम्‍भीरा-मन्दिर में अपना अधिक समय बिताने लगे। अन्‍त के बारह वर्ष तो आपके गम्‍भीरा-मन्दिर में ही बीते। उस स्‍थान का नाम पहले से ही गम्‍भीरा था या प्रभु के गम्‍भीरा भाव से रहने के कारण उसको लोग गम्‍भीरा कहने लगे, इसका ठीक-ठीक पता नहीं। अनुमान ऐसा ही लगाया जाता है कि प्रभु के अन्‍त:पुर के समान उसमें अपने अन्‍तरंग भक्‍तों के साथ रागमय ऐकान्तिक जीवन बिताने के ही कारण इस स्‍थान को भक्‍त ‘गम्‍भीरा’ के नाम से पुकारने लगे होंगे। प्रभु ने गम्‍भीरा-मन्दिर में रहकर जो बारह वर्ष बिताये और उस अवस्‍था में जो उन्‍होंने लीलाएँ कीं उन्‍हें भक्‍त ‘गम्‍भीरालीला’ के नाम से जानते और कहते हैं। गौड़ीय वैष्‍णवग्रन्‍थों में सर्वत्र ‘गम्‍भीरालीला’ शब्‍द का व्‍यवहार मिलता है।

इन बारह वर्षो में प्रभु के शरीर में जो-जो प्रेम के भाव उत्‍पन्‍न हुए, उनकी जैसी-तैसी अलौकिक दशाएँ हुईं वह किसी भी महापुरुष के शरीर में प्रत्‍यक्ष रीति से प्रकट नहीं हुईं। उन्‍होंने प्रेम की पराकाष्‍ठा करके दिखा दी, मधुर रस का आस्‍वादन किस प्रकार किया जाता है, इसका उन्‍होंने साकार स्‍वरूप दिखला दिया।
उन दिनों स्‍वरूपदामोदर और राय रामानन्‍द, ये ही प्रभु के उस भाव के प्रधान ज्ञाता थे। महाप्रभु निरन्‍तर वियोगिनी श्री राधिका जी के भाव में भावान्वित रहते। स्‍वरूपगोस्‍वामी और राय रामानन्‍द जी को वे अपनी ललिता और विशाखा सखी समझते। बस, इन्‍हीं के कारण उन्‍हें थोडी-बहुत शान्ति होती। वास्‍तव में मधुरभाव के मर्मज्ञ ये दोनों महानुभाव ललिता और विशाखा की भाँति प्रभु की विरह-वेदना को कम करने में सब भाँति से उनकी सहायता करते और सदा प्रभु की सेवा-शुश्रुषा में ही तत्‍पर रहते। स्‍वरूपगोस्‍वामी का गला बड़ा ही कोमल था। वे अपनी सुरीली तान से मधुर भाव के पद गा-गाकर प्रभु को सुनाया करते थे।

महाप्रभु को श्रीमद्भागवत के दशम स्‍कन्‍ध का गोपीगीत, श्री जयदेव का गीतगोविन्‍द और चण्‍डीदास तथा विद्यापति ठाकुर के पद बहुत ही प्रिय थे। स्‍वरूपगोस्‍वामी अपने सुन्‍दर सुरीले स्‍वर से इन्‍हीं सबको सुनाया करते थे। राय रामानन्‍द जी कृष्‍ण कथा कहा करते थे, इसी प्रकार रसास्‍वादन करते-करते रात्रि बीत जाती और सूर्य उदय होने पर पता चलता कि अब प्रात:काल हो गया है। उस समय प्रभु की जो भी दशा होती उसे स्‍वरूपदामोदर जी अपने ‘कड़चा’ में लिखते जाते थे। सचमुच उन्‍हीं महानुभाव की कृपा से तो आज संसार श्री चैतन्‍य देव के प्रेम की अलौकिक दशाओं को समझ सका है, नहीं तो वे भाव प्रत्‍यक्ष रूप से संसार में अप्रकट ही बने रहते। ये भाव मानवीय भाषा में व्‍यक्‍त किये ही नहीं जाते। इन भावों को व्‍यक्त करने की तो भाषा ही दूसरी है और उसका नाम ‘मूकभाषा’ है। कोई परम रसमर्मज्ञ लोकातीत भाव वाला पुरुष यत्किंचित उसका वर्णन कर सकता है। इसलिये स्‍वरूप दामोदर जी ने संसार के ऊपर उपकार करके उसका थोडा-बहुत वर्णन किया।

वास्‍तव में चैतन्‍य के भावों को वे ही ठीक-ठीक वर्णन कर भी सकते थे। उस समय प्रभु सदा शरीर ज्ञान शून्‍य से बने रहते। उनके अन्‍तरंग भक्त ही उनके शरीर की रेख-देख और सेवा-शुश्रुषा करते थे। उनमें गोविन्‍द जगदानन्‍द रघुनाथदास, स्‍वरूपदामोदर और राय रामानन्‍द जी ये ही मुख्‍य थे। स्‍वरूपगोस्‍वामी जी जो कुछ लिखते थे उसे रघुनाथ जी कण्‍ठस्‍थ करते जाते थे। इस प्रकार स्‍वरूपदामोदर जी का कड़चा रघुनाथदास जी के गले का सर्वोत्तम हार बन गया। महाप्रभु और स्‍वरूपदामोदर जी के तिरोभाव के अनन्‍तर रघुनाथदास जी पुरी छोड़कर श्री वृन्दावन को चले गये और वहीं एकान्‍त में वास करने लगे।

‘श्रीचैतन्‍य चरितामृत’ के लेखक गोस्‍वामी कृष्‍णदास कविराज उनके परमप्रिय शिष्‍य थे, इसलिये ‘स्‍वरूपगोस्‍वामी का कड़चा’ उनसे कविराज जी को प्राप्‍त हुआ। कविराज महाशय ने उसी कड़चा के आधार पर अपने परम प्रसिद्ध ‘श्रीचैतन्‍य चरितामृत’ नामक ग्रन्‍थ के अन्तिम सात अध्‍याय लिखे हैं। इसलिये अब ‘स्‍वरूपदामोदर जी का कड़चा’ नामक कोई अलग ग्रन्‍थ तो मिलता नहीं। इन सात अध्‍यायों को ही उसका सार समझना चाहिये। उन महापुरुष ने उस अलौकिक दिव्‍य ग्रन्‍थ का जनता में क्‍यों नहीं प्रचार और प्रसार होने दिया, इसे तो वे ही जानें। हम पामर प्राणी भला इस सम्‍बन्‍ध में क्‍या समझ सकते हैं? संसार को उन्‍होंने इस इतने अधिक दिव्‍यरस का अनधिकारी समझा होगा। प्राय: देखने में भी आता है कि महापुरुष अपना सम्‍पूर्ण प्रेम किसी पर प्रकट नहीं करते। यदि दुर्बल जीव पर वे अपना अमोघ प्रेम एक साथ ही प्रकट कर दें तो उसका हृदय फट जाय, साधारण लोग महापुरुषों के प्रेम को सहन नहीं कर सकते। इसीलिये महापुरुष धीरे-धीरे पात्र जितने-जितने प्रेम अधिकारी बनता जाता है उतना ही उतना प्रेम उसके प्रति प्रदर्शित करते हैं, क्‍योंकि वे प्रेम की अमोघ शक्ति से पूर्णरीत्‍या परिचित होते हैं।

गोस्‍वामी कृष्‍णदास कविराज कवि हृदय के प्रेममर्मज्ञ और उच्‍चकोटि के रसमर्मज्ञ थे, उन्‍होंने अपने बंगला भाषा के ‘पयार’ नामक छन्‍दों में जिस खूबी के साथ महाप्रभु के इन अन्तिम भावों का वर्णन किया है उसे पढ़कर ऐसा कौन सहृदय रसिक पुरुष होगा जो बिना रोये एक भी पयार को पढ़ सके। उस अमर कवि की लेखनी से प्रेम का जैसा सजीव, सुन्‍दर और बोलता-चलता वर्णन हुआ है वैसा वर्णन अन्‍य साधारण कवियों की लेखनी से होना एकदम असम्‍भव है। प्रेम का प्रसंग एक तो वैसा ही जटिल है फिर उसे मानवीय भाषा की कविता में वर्णन करना तो सचमुच ही महान प्रतिभा और घोर साहस का काम है। कविराज महाशय स्‍वयं कहते हैं –

प्रेमार‍ विकार वर्णिते चाहे पेइ जन,
चांद धरिते चाहे पेन हय्या वामन।
वायु जैछे सिंधु-जलेर हरे एक ‘कण’,
कृष्‍णप्रेम-कण तैछे जोवेर स्‍पर्शन।।
क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरंग अनंत,
जीव छार काहां तार पाइबेक अंत।
श्रीकृष्‍णचैतन्‍य याहा करेन आस्‍वादन,
सबे एक जाने ताहा स्‍वरूपादि ‘गण’।।

अर्थात ‘जो पुरुष प्रेम के विकार को वर्णन करने का प्रयत्‍न करता है, उसका प्रयत्‍न उसी बौने (बावन)– के समान है जो सबसे छोटा होने पर भी आकाश में स्थित चन्‍द्रमा को पकड़ना चाहता है। जिस प्रकार अनन्‍त-अथाह महासागर में से वायु एक कण को उड़ा लाती है, उसी प्रकार श्रीकृष्‍ण–प्रेमार्णवपय का एक कण जीवों को स्‍पर्श कैसे पा सकता है? श्रीकृष्‍ण-चैतन्‍य महाप्रभु जिस प्रेम रस का आस्‍वादन करते हैं, उसे तो उनके परम प्रियगण श्रीस्‍वरूप दामोदर तथा रामानन्‍द राय आदि ही जान सकते हैं।’ ऐसा कहकर उन्‍होंने अपने को भी प्रेम-तत्त्व के वर्णन करने का अनधिकारी साबित कर दिया है और आप उसी का समर्थन करते हुए स्‍पष्‍ट स्‍वीकार भी करते हैं।

लिख्‍यते श्रीलगौरेन्‍दोरत्‍यद्भुतमलौकिकम्।
यैर्दृष्‍टं तन्‍मुखच्‍छ्रुत्‍वा दिव्‍योन्‍मादविचेष्टितम्।।[1]

अर्थात ‘श्रीगौरांग महाप्रभु की अत्‍यद्भुत अलौकिक दिव्‍योन्‍मादकारक चेष्‍टाओं को– जिन्‍होंने (श्रीरघुनाथदास जी ने) अपनी आँखों से उन चेष्‍टाओं को प्रत्‍यक्ष देखा है, उन्‍हीं के मुख से सुनकर मैं लिखता हूँ।’ इस बात से तो अब सन्‍देह के लिये कोई स्‍थान ही नहीं रह जाता।

यदि कोई साधारण मनुष्‍य उनसे इस बात को कहता तो वे उसका विश्‍वास भी न करते, किन्‍तु जब साक्षात रघुनाथ जी ही उनसे कह रहे हैं जो कि निरन्‍तर बाहर वर्षों तक प्रभु के समीप ही रहे थे तब तो उन्‍हें भी विश्‍वास करना ही पडा, इस बात को वे स्‍वयं कहते हैं–

शास्‍त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय,
इतर लोकेर ताते ना हय निश्‍चय।
रघुनाथदासेर सदा प्रभु के संगे स्थिति,
तार मुखे सुनि लिखि करिया प्रतीति।।

अर्थात ‘महाप्रभु के इन दिव्‍योन्‍मादकारी भावों को यदि कोई इतर पुरुष कहता तो सम्‍भवतया निश्‍चय भी न होता, किन्‍तु सदा प्रभु के संग रहने वाले रघुनाथ जी ने अपने मुख से इन भावों को मुझे बताया तब मैंने इन्‍हें अपने ग्रन्‍थों में लिख दिया। इसमें अब शंका के लिये स्‍थान ही नहीं।’ इस प्रकार स्‍थान-स्‍थान पर उन्‍होंने इन भावों को अवर्णनीय बताया है और सात अध्‍यायों में बडी सुन्‍दरता से वर्णन करके अन्‍त में कह दिया है–

प्रभुर गंभीरा लीला ना पारि बूझिते।
बुद्धि प्रवेश नाहि ताते ना पारि वर्णिते।।

अर्थात ‘महाप्रभु की गम्‍भीरा लीला कुछ जानी नहीं जा सकती, बुद्धि का तो वहाँ प्रवेश ही नही, फिर वर्णन कैसे हो सकता है?’ जिस प्रेमोन्‍मादकारी लीला को वर्णन करने में प्रेम के एकमात्र उपासक, गौर कृपा के पूर्ण पात्र तथा आयुभर वृन्‍दावन में ही वास करके प्रेम की साधना करने वाले कविराज गोस्‍वामी अपनी वृद्धावस्‍था से काँपती हुई लेखनी को ही असमर्थ बताते हैं तो हम कल-परसों के छोकरे जिनका कि प्रेम मार्ग में प्रवेश तो क्‍या झुकाव भी नहीं हुआ है, ऐसे साधारण कोटि के जीव उसका वर्णन ही क्‍या कर सकते हैं? हमारे लिये तो सबसे सरल उपाय यही है कि इस प्रसंग को छोड ही दें। किन्‍तु इस प्रसंग को छोडना उसी प्रकार होगा जिस प्रकार दूध को दुहकर, औटाकर, जमाकर और उसका दही बनाकर दिनभर मथते रहे और जब मक्खन निकलने का समय आया तभी उसे छोड बैठे। महाप्रभु के जीवन का यही तो सार है, यहीं पर तो प्रेम की पराकाष्‍ठा होती है, यही तो उनका जीवों के लिये अन्तिम उपदेश है, इसी को तो ध्रुव लक्ष्‍य बनाकर साधक आगे बढ़ सकते हैं। इसलिये इसे छोड़ देना मानो इतने सब किये-कराये को बिना सार समझे छोड़ देना है। इसलिये हम इसका अपनी क्षुद्र बुद्धि के अनुसार उन्‍हीं कविराज गोस्‍वामी के चरण-चिह्नों का अनुसरण करते हुए वर्णन करते हैं। अन्‍य स्‍थानों में तो हमने अपने स्‍वाभाविक स्‍वतंत्रता से काम लिया है, किन्‍तु इस विषय में हम जहाँ तक हो सकेगा, इन्‍हीं पूर्व पुरुषों की प्रणाली का ही अनुकरण करेंगे।

अक्षरों का अनुवाद कर देना तो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल है, इसके लिये तो हम मजबूर हैं किन्तु कैसे भी क्‍यों न करें इन्‍हीं महानुभावों के आश्रय से इस दुर्गम पथ को पार कर सकेंगे। इसलिये श्री चैतन्‍य देव के दिव्‍योन्‍माद के वर्णन करने के पूर्व अति संक्षेप में हम पाठकों को यह बता देना आवश्‍यक समझते हैं कि ये प्रेम के भाव, महाभाव तथा विरह की दशा कितनी होती है और इनका वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या है, इस विषय पर मधुर रति के उपासक वैष्‍णवों ने अनेक ग्रन्‍थ लिखे है और विस्‍तार के साथ इन सभी विषयों का विशदरूप से वर्णन किया गया है, उन सबको यहाँ बताने के लिये न तो इतना स्‍थान ही है और न हममें इतनी योग्‍यता ही है। हम तो विषय को समझने के लिये बहुत ही संक्षेप में इन बातों का दिग्‍दर्शन करा देना चाहते हैं जिससे पाठकों को महाप्रभु की प्रेमोन्‍दमादकारी दशा को समझाने में सुगमता हो। वैसे इन दशाओं को समझकर कोई प्रेमी थोड़े ही बन सकता है, जिसके हृदय में प्रेम उत्‍पन्‍न होता है उसकी दशा अपने आप ही ऐसी हो जाती है। पिंगल पढ़कर कोई कवि नहीं बन सकता। स्‍वाभाविक कवि की कविता अपने आप ही पिंगल के अनुसार बन जाती है। इसलिये इन बातों का वर्णन प्रेम प्राप्‍त करने के निमित्त नही, किंतु प्रेम की दशा समझने के लिये करते हैं।

क्रमशः अगला पोस्ट [163]
••••••••••••••••••••••••••••••••••
[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



।। Srihari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Jap] Hare Krishna Hare Ram Shri Gaurang in the Gambhira-temple

The wonderful meaning of loves is in the path of hearing: the glory of whose names: Who knows whose entry into the great sweetness of the forest of Vrindavan Who knows the limit of Radha’s supreme taste, wonder and sweetness? The one moon of consciousness, with supreme compassion, pervaded everything.

Mahaprabhu Gaurangdev came to Puri at the tender age of twenty-four after taking the initiation of strict sannyas-religion. In the first six years, he used to visit various places of pilgrimage in India and at last he visited Shri Vrindavan Dham. This was the last journey of Mahaprabhu. After returning from Vrindavan, for the last eighteen years, you remained in Puri or Neelachal in the form of Sachal Jagannath with an uninterrupted spirit. Then you did not step anywhere leaving the holy land of Puri.

Many devotees used to come every year during Rath Yatra from Gaude country. And they used to go to their respective places by staying close to the lotus feet of the Lord during the four rainy months. For six years, the Lord continued to play, celebrate and sing with them in the same way. In the end, your ecstasy crossed the normal limits and reached its peak, where is the consciousness of this natural body in that, it is a matter beyond nature. Sattva, Raj and Tama these three gunas do not enter there, all this is a trigunateet subject. There cannot be meeting, talking, eating and drinking and performing other tasks in it. The body itself, like a machine, keeps on doing these functions as per the need. These works have nothing to do with the mind, the mind continues to drink the nectar of the beloved with an uninterrupted spirit. Mahaprabhu’s mind had also left the body for twelve years and had gone with a dark skinned cowherd boy of Vrindavan. His beman’s body used to lie in a deserted Gambhira-temple of Kashi Mishra’s huge house in Puri. Before we say anything about that ecstatic love state of Mahaprabhu, it is necessary to know that what exactly is that Gambhira-temple?

Near the temple of Shri Jagannath ji, the Lord used to reside in the huge house of Pandit Kashi Mishra ji, the total guru of Odishadip Maharaj Prataparudra ji. That building of Mishra ji was very big. It is estimated that there would have been three ramparts in it and hundreds of humans could have lived happily in it. That’s why almost all the devotees who came from Gaur country used to stay there for four months. Mahaprabhu lived in the same building. In other houses Parmanand Puri, Brahmanand Bharti, Swarupadamodar, Raghunathdas, Jagadanand, Vakreshwar Pandit and other disinterested devotees lived.

Mahaprabhu was always a recluse, it was unpleasant for him to be special in the crowd. In the same building there was a small place like a cave in solitude, it was noise-less, very quiet and silent temple. When Mahaprabhu separated from everyone and wanted solitude, then he used to go to that Nibhrit temple and take rest. Its door was so small that only a man could enter it with hesitation. When Mahaprabhu was tired or bored with the crowd, he would go and sleep in it.

Like Mahaprabhu, who was a devotee and a benevolent lord, he also got a servant named Govind, a true devotee of his lord. Govind had affection towards Mahaprabhu, he used to selflessly take care of the Lord’s body with great readiness. One day Mahaprabhu was sleeping on Gambheera’s doorstep after getting tired of chanting. According to the rules, Govind came and he said – ‘ Lord! I will massage the body, let me come inside.’ Prabhu was lying unconscious in emotion. Why do they care about physical abuse? After praying a couple of times, you said on the spot – ‘Not today, go and sleep.’ Govind said humbly – ‘ Lord! It is my daily rule, do not deprive me of service today. Prabhu said angrily- ‘No, this is not all, there is a lot of pain in the body, I cannot get up, go and sleep.’ Govind again said in a very humble manner – ‘Lord! Move away a little, I will come inside just by giving one foot, I will not be able to sleep.’

The Lord said very affectionately – ‘Brother Govind! I don’t even have the ability to move.’ What would a devoted servant do? To serve is his main duty. It is a sin to cross the Lord, but not to serve him is a greater sin. That’s why he thought that ‘even if I have to suffer in hell, I will not be lazy in service.’ Thinking this, he went beyond the Lord and went there and served the Lord’s feet and slowly pressed the whole body. It was too late that the Lord attained consciousness. Then you saw Govind sitting nearby and asked – ‘ Hey Govind! You are still sitting, why haven’t you gone to sleep? He said – ‘Lord! How do you go to sleep, you are sleeping by surrounding the door.

The Lord asked – ‘How did you come then?’ Govind said in a somewhat ashamed voice – ‘Lord! I came after crossing your Sri Anga, for this I can happily suffer hell for as many days as I have to suffer. I can do everything for the service of your body, but I cannot commit such a sin for my gold. Seeing his devotion, the Lord embraced him and blessed him with the love of Krishna.

It is also known from this incident that Gambhira-temple will be very small. At first, Mahaprabhu used to sleep in it occasionally, but as his solitude increased and his ecstasy increased, he started spending more time in Gambhira-temple. The last twelve years were spent in your Gambhira-temple only. The name of that place was already Gambhira or people started calling it Gambhira because of Lord’s serious attitude, it is not known exactly. It is inferred that the devotees must have started calling this place by the name of ‘Gambheera’ because of spending a melodious secluded life with their intimate devotees in it, like the Lord’s antarpur. The twelve years that the Lord spent in Gambhira-temple and the pastimes that He performed in that state are known and called by the devotees as ‘Gambhiralila’. In Gaudiya Vaishnava texts, the use of the word ‘Gambhiralila’ is found everywhere.

In these twelve years, the feelings of love that arose in the body of the Lord, the supernatural conditions that happened, did not appear directly in the body of any great man. He showed the culmination of love, how to taste the sweet juice, he showed the real form of it. In those days Swarupadamodar and Rai Ramanand, they were the main connoisseurs of that feeling of the Lord. Mahaprabhu used to be emotional in the spirit of constant separation Shri Radhika ji. He considered Swaroopgoswami and Rai Ramanandji as his Lalita and Visakha friend. Just because of these, he would have had some peace. In fact, like Lalita and Vishakha, both of these great personalities, who are the soul of sweetness, help the Lord in every way to reduce the pain of separation and always remain ready in the service and care of the Lord. Swaroopgoswami’s throat was very soft. With his melodious tone, he used to recite melodious verses to the Lord.

Mahaprabhu was very fond of the Gopigeet of the tenth canto of Shrimad Bhagwat, Geetagovinda of Shri Jayadeva and the verses of Chandidas and Vidyapati Thakur. Swaroopgoswami used to narrate them all in his beautiful melodious voice. Rai Ramanand ji used to tell Krishna Katha, in the same way the night would pass while relishing the Rasa and when the sun would rise, it would be known that it is morning now. Whatever was the condition of the Lord at that time, Swarupdamodar used to write it in his ‘Kadcha’. Truly, by the grace of that great personality, today the world has been able to understand the supernatural conditions of love of Sri Chaitanya Dev, otherwise those feelings would have remained unmanifested in the world. These feelings cannot be expressed in human language. There is another language to express these feelings and its name is ‘silent language’. A man of supreme ecstasy, transcendental spirit, can describe it at least a little. That’s why Swarup Damodar ji did a favor to the world and described it a little bit.

In fact, he could even accurately describe the feelings of consciousness. At that time the Lord would always remain without body knowledge. His intimate devotees cared for and served his body. The most prominent of them were Govind Jagdanand Raghunathdas, Swarup Damodar and Rai Ramanand. Whatever Swarup Goswami wrote, Raghunath would memorize. Thus Swarupdamodar Ji’s necklace became the best necklace around Raghunathdas Ji’s neck. After the disappearance of Mahaprabhu and Swarupdamodar Ji, Raghunathdas Ji left Puri and went to Shri Vrindavan and began to live there in solitude.

Goswami Krishnadas Kaviraj, the author of ‘Sri Chaitanya Charitamrit’, was his most beloved disciple, that’s why Kaviraj ji received ‘Swaroopgoswami ka Kadcha’ from him. Kaviraj Mahasaya has written the last seven chapters of his most famous book ‘Shri Chaitanya Charitamrit’ on the basis of the same Kadcha. That’s why now there is no separate book called ‘Swaroopdamodar ji’s Kadcha’. Its essence should be understood from these seven chapters only. Why that great man did not allow that supernatural divine book to be propagated and spread in the public, only he himself knows. What can we palmer beings understand in this regard? He must have considered the world undeserving of this much wealth. It is also often seen that great men do not reveal their complete love to anyone. If they reveal their unfailing love to a weak creature at the same time, then his heart bursts, ordinary people cannot tolerate the love of great men. That’s why great men gradually show more and more love to the character, because they are fully aware of the unfailing power of love.

Poet Goswami Krishnadas Kaviraj was a lover of heart and a lover of high quality, he has described these last expressions of Mahaprabhu with the quality in his verses called ‘love’ in Bengali language. Can read love It is absolutely impossible to describe love as alive, beautiful and speaking as it has been described by the writings of that immortal poet. The context of love is as complicated as it is, then describing it in the poem of human language is really a work of great talent and great courage. Kaviraj sir himself says –

Love disorders should be described whether people drink, Chand Dharitee Chahe Pen Hayya Vaman. A ‘particle’ green like the Indus-Jaler, Krishna love-Kan Taiche Jover Sparshan. Moment by moment the wave of love rises infinite, Jeev chhar kahan tar pybek end. Shri Krishna Chaitanya Yaha Karen Aswadan, Everyone knows one thing, Swarupadi ‘Gan’.

That is, ‘The man who tries to describe the disorder of love, his effort is like that of a dwarf (Bawan)- who wants to catch the moon in the sky even though he is the smallest. Just as the wind blows a particle out of the infinite ocean, in the same way how can a particle of Krishna-Premarnavapaya touch the living beings? The nectar of love that Sri Krishna-Chaitanya Mahaprabhu relishes, can only be known by his most beloved Sriswaroop Damodar and Ramanand Rai, etc. By saying this, he has proved himself to be unqualified to describe the essence of love and you are the same. While supporting, also clearly accept.

It is written by Sri Lagorendora that it is wonderful and supernatural. Those who saw it and heard it from his mouth acted in divine madness.

That is, ‘I write after hearing from the mouth of the one who (Shri Raghunathdas ji) has seen those efforts with his own eyes.’ From this point there is no room for doubt anymore go.

If an ordinary person had told them this, they would not have believed him, but when Raghunath ji himself was saying this to them, who had been living outside for many years, then they too had to believe it. what they themselves call

Shastralokateet yei yei bhav hai, I don’t have any confidence in other people. Raghunathdaser is always with the Lord, Listen to the strings and write your feelings.

That is, ‘If any other person had said these ecstatic expressions of Mahaprabhu, then probably it would not have been confirmed, but Raghunath ji, who is always with the Lord, told me these expressions from his own mouth, then I wrote them in my books. There is no longer any room for doubt in this.’ In this way, at various places, he has described these feelings as indescribable, and after describing them beautifully in seven chapters, he has said in the end-

Prabhur Gambhira Leela Na Pari Bujhite. Wisdom doesn’t enter, doesn’t tell, doesn’t describe others.

That is, ‘Mahaprabhu’s serious pastimes cannot be known, the intellect does not even enter there, then how can it be described?’ Kaviraj Goswami, who lives and meditates on love, says that his pen that is trembling due to old age is incapable, then we, the boys of yesterday and the day before yesterday, who have not even entered the path of love, let alone inclined, how can we describe such ordinary creatures. can do? The easiest solution for us is to leave this context alone. But to leave this context would be the same as churning the milk, churning it, curdling it and making curd from it, and leaving it only when the time came to extract the butter. This is the essence of Mahaprabhu’s life, this is the culmination of love, this is his last sermon for the living beings, making this the ultimate goal, the worshipers can move forward. That’s why to leave it is like leaving all that has been done without understanding its essence. That’s why we describe it according to our petty intelligence following the footsteps of the same Kaviraj Goswami. In other places we have exercised our natural liberty, but in this we shall, as far as possible, follow the method of these former men.

It is against our nature to translate letters, we are compelled to do so, but no matter what we do, we will be able to cross this difficult path with the help of these great personalities. Therefore, before describing Sri Chaitanya Dev’s divine ecstasy, we consider it necessary to tell the readers in very brief, how much are these feelings of love, great feelings and the condition of separation and what is their real nature, on this subject Madhur Rati’s Devotees of Vaishnavites have written many texts and all these subjects have been elaborately described in detail, there is neither enough space nor we have enough ability to tell them all here. In order to understand the subject, we want to point out these things in a very brief manner, so that the readers can easily understand the ecstasy of Mahaprabhu. Well, by understanding these conditions, one can hardly become a lover, in whose heart love arises, his condition automatically becomes like this. No one can become a poet by reading Pingle. The poem of the natural poet automatically becomes according to Pingal. That’s why these things are described not for the sake of getting love, but to understand the condition of love.

respectively next post [163] , [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *