[38]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

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।। श्रीहरि:।।

[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम

वही प्रेमोन्माद

यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-

त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम्।

मुहुः श्वसन वक्ति हरे जगत्पते

नारायणेत्यात्मगतिर्गतत्रपः।।

जिसके हृदय में भगवत्प्रेम उत्पन्न हो गया, उसे फिर अन्य संसारी बातें भली ही किस प्रकार लग सकती हैं? जिसकी जिह्वा ने मिश्री का रसास्वाद कर लिया फिर वह गुड़ के मैल को आनन्द और उल्लास के साथ स्वेच्छा से कब पसन्द कर सकती है? स्थायी प्रेम प्राप्त होने पर तो मनुष्य सचमुच पागल बन जाता है, फिर उसे इस बाह्य-संसार का होश ही नहीं रहता। जिन्हें किन्हीं महापुरुष की कृपा से या किसी पुण्य-स्थान के प्रभाव के क्षणभर के लिये प्रेमावेश हो जाता है, वह तो वास्तव में प्रेम की झलक है। जैसे पर्वत के शिखर के ऊपर के बने हुए मन्दिर की किंचिन्मात्र धुँधली-सी चोटी देखकर सैकड़ों कोस दूर से ही कोई पथिक आनन्द में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे कि हम तो अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँच गये। यही दशा उस क्षणिक प्रेमी की है। वास्तव में अभी वह सच्चे प्रेम से बहुत दूर है। प्रेममार्ग में यथार्थ रीति से प्रवेश हो जाने पर तो उसकी वृत्ति संसारी विषयों में प्रवेश कर ही नहीं सकती। वह तो सदा प्रेम-मद में उन्मत्त-सा ही बना रहेगा। वह न तो क्षणभर में ऊपर ही चढ़ जायगा और न दूसरे ही क्षण में नीचे गिर जायगा। उसकी स्थिति तो सदा एक-सी बनी रहेगी। कबीरदास जी कहते हैं-

छनहिं चढ़ै छन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय।

अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय।।

वास्तव में प्रेमी की स्थिति तो सदा एक ही रस रहती है, उसे प्रतिक्षण अपने प्रियतम से मिलने की छटपटाहट होती रती है। वह सदा अतृप्त ही बना रहता है। प्यारे के सिवा उसका दूसरा कोई है ही नहीं। उसका प्रियतम उसे चाहता है या नहीं इसकी उसे परवा नहीं। इस बात का वह स्वप्न में भी ध्यान नहीं करता। वह तो अपने प्यारे को ही सर्वस्व समझकर उसकी स्मृति में सदा अधीर-सा बना रहता है। रसिक रसखाने ने प्रेम के स्वरूप का क्या ही सुन्दर वर्णन किया है-

इक अंगी बिनु कारनहिं, इकरस सदा समान।

गनै प्रियहिं सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान।।

महाप्रभु चैतन्यदेव का प्रेम ऐसा ही था। उनकी हृदय-कन्दरा से जो भक्ति-भाव का भव्य स्त्रोत उदित हो गया, वह फिर सदा उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया।

उनकी हृदय-कन्दरा से उत्पन्न हुई भक्ति-भगीरथी की धारा सावन-भादों की क्षुद्र नदी की भाँति नहीं थी जो थोड़े समय के लिये तो खूब इठलाकर चलती है ओर जेठ-मास की तेज धूप पड़ते ही सूख जाती है। उनके हृदय से उत्पन्न हुई प्रेम-सरिता की धारा सदा बहकर समुद्र में ही जाकर मिलने वाली स्थायी थी। उसमें कमी का क्या काम? वह तो उत्तरोत्तर बढ़ने वाली अलौकिक और अनुपम धारा थी, उसकी उपमा इन संसारी धाराओं से दी ही नहीं जा सकती। वह तो अनुभवगम्य ही है। महाप्रभु जब से गया से लौटकर आये हैं, तभी से उनकी विचित्र दशा है। वे भोजन करते-करते सहसा बीच में ही उठकर रुदन करने लगते हैं, रास्ता चलते-चलते पागलों की भाँति नृत्य करने लगते हैं। शय्या पर लेटे-लेटे सहसा उठकर बैठ जाते हैं और ‘हा कृष्ण! हा कृष्ण!’ कहकर जोरों से चिल्लाने लगते हैं। कभी-कभी लोगों से बातें करते-करते बीच में ही जोरों से ठहाका मारकर हँसने लगते हैं। रात भर सोने का नाम नहीं। लम्बी-लम्बी साँसें लेते रहते हैं, अधीर होकर अत्यन्त विरही की भाँति हिचकियाँ भरते रहते हैं और उनके नेत्रों से इतना जल निकलता है कि सम्पूर्ण वस्त्र गीले हो जाते हैं।

विष्णुप्रिया इनकी ऐसी दशा देखकर भयभीत हो जाती हैं और जाकर अपनी सास से सभी बातों को कहती हैं। शचीमाता पुत्र की दशा देखकर दुःख से कातर होकर रुदन करने लगती हैं और सभी देवी-देवताओं की मनौती मानती हैं। वे करुणाभाव से अधीर होकर प्रभु के पादपद्मों में प्रार्थना करती हैं- ‘हे अशरणशरण! इस दीन-हीन कंगालिनी विधवा के एकमात्र पुत्र के ऊपर कृपा करो। दयालो! मैं धन नहीं चाहती, भोग नहीं चाती, सुन्दर वस्त्राभूषण तथा सुस्वादु भोजन की मुझे इच्छा नहीं। मेरा प्यारा, मेरे जीवन का सहारा, मेरी आँखों का तारा यह निमाई स्वचछ और नीरोग बना रहे, यही मेरी प्रार्थना है।’ माता बार-बार निमाई के मुख की ओर देखतीं और उनकी ऐसी दयनीय दशा देखकर अत्यन्त ही दुःखी होतीं।

महाप्रभु अब जो भी काम करना चाहते, उसे ही नहीं कर सकते। काम करते-करते उन्हें अपने प्रियतम की याद आ जाती और उसी के विरह में बेहोश होकर गिर पड़ते। ठीक-ठीक भोजन भी नहीं कर सकते। स्नान, सन्ध्या, पूजा का उन्हें कुछ भी होश नहीं, मुख से निरन्तर श्रीकृष्ण के मधुर नामों का ही अपने-आप उच्चारण होता रहता है। किसी की बात का उत्तर भी देते हैं तो उसमें भी भगवान की अलौकिक लीलाओं का ही वर्णन होता है। किसी से बातें भी करते हैं, तो श्रीकृष्ण के ही सम्बन्ध की करते हैं। अर्थात वे श्रीकृष्ण के सिवा कुछ जानते ही नहीं हैं। श्रीकृष्ण ही उनके प्राण हैं, श्रीकृष्ण ही उने धन हैं अर्थात उनके सर्वस्व श्रीकृष्ण ही हैं, उनके लिये संसार में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।

प्रभु के सब विद्यार्थियों ने जब सुना कि गुरुजी गयाधाम की यात्रा करके लौट आये हैं, तो एक-एक करके उनके घर पर आने लगे और पाठशाला में चलकर पढ़ाने की प्रार्थना करने लगे। सबके बहुत आग्रह करने पर प्रभु पाठशाला में पढ़ाने के निमित्त गये। किन्तु वे पढ़ावें क्या, लौकिक शास्त्रों को तो वे एकदम भूल ही गये, अब वे श्रीकृष्ण-कीर्तन के अतिरिक्त किसी भी विषय को नहीं कह सकते। उसी पाठ को विद्यार्थियों के लिये पढ़ाने लगे- ‘भैया! इन संसारी शास्त्रों में क्या रखा है? श्रीकृष्ण का नाम ही एकमात्र सार है, वह मधुरातिमधुर है। उसी का पान करो, इन लौकिक शास्त्रों से क्या अभीष्ट सिद्ध होगा? प्राणिमात्र के आश्रय-स्थान श्रीकृष्ण ही हैं। संसार की सृष्टि, स्थिति ओर लय उन ही श्रीकृष्ण की इच्छामात्र से होता रहता है। वे आनन्द के धाम हैं, सुखस्वरूप हैं। उनके गुणों का आर्त होकर गान करते रहना मनुष्यों का परम पुरुषार्थ है।’ इतना कहते-कहते प्रभु उच्च स्वर से कृष्ण-कीर्तन करने लगे।

इन बातों को श्रवण करके कुछ विद्यार्थी तो आनन्द-सागर में मग्न हो गये। वे तो बाह्यज्ञान-शून्य होकर परमानन्द का अनुभव करने लगे। कुछ ऐसे भी थे, जो पुस्तक की विद्या को ही सर्वस्व समझते थे। भट्टाचार्य और शास्त्री बनना ही जिनके जीवन का एकमात्र चरम लक्ष्य था, वे कहने लगे- ‘गुरु जी! आप कैसी बातें कर रहे हैं? हमें इन बातों से क्या प्रयोजन? इन बातों का विचार तो वैष्णव भक्त करें। हमें तो हमारी पाठ्य पुस्तक का पाठ पढ़ाइये। हम यहाँ पाठशाला में भक्ति-तत्त्व की शिक्षा लेने के लिये नहीं आये हैं, हमें तो व्याकरण, अलंकार तथा न्याय आदि पुस्तकों के पाठों को पढ़ाइये।’

उन विद्यार्थियों की ऐसी बातें सुनकर प्रभु ने कहा- ‘भाई! आज हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। आज आप लोग अपना-अपना पाठ बंद रखिये, पुस्तकों को बाँधकर रख दीजिये। चलो, अब गंगा-स्नान करने चलें। कल पाठ की बात देखी जायगी।’ इतना सुनते ही सभी विद्यार्थियों ने अपनी-अपने पुस्तकें बाँध दीं और वे प्रभु के साथ गंगा-स्नान के निमित्त चल दिये। गंगा जी पर पहुँचकर बहुत देर तक जल-विहार होता रहा। रात्रि हो जाने पर प्रभु लौटकर घर आये और विद्यार्थी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन महाप्रभु फिर पाठशाला में पहुँचे। प्रभु के आसनासीन हो जाने पर विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में से प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया। कोई भी विद्यार्थी इनसे कैसा भी प्रश्न पूछता उसका ये श्रीकृष्णपरक ही उत्तर देते।

कोई विद्यार्थी पूछता- ‘सिद्धवर्णसमाम्नाय बताइये?’ आप उत्तर देते- ‘नारायण ही सब वर्णों में सिद्ध वर्ण हैं।’ कोई पूछता- ‘वर्णों की सिद्धि किस प्रकार से होती है?’

प्रभु कहते- ‘ठीक बात तो यही है, प्रतिक्षण श्रीकृष्ण-नाम का ही संकीर्तन करते रहना चाहिये।’

यह सुनकर सभी विद्यार्थी एक-दूसरे के मुख की ओर देखने लगते। कोई तो यकित होकर प्रभु के श्रीमुख की ओर देखने लगता। कोई-कोई धीरे से कह देता ‘दिमाग में गर्मी चढ़ गयी है।’ दूसरा उसे धीरे से धक्का देकर ऐसा कहने के लिये निषेध करता।

प्रभु की ऐसी अद्भुत व्याख्याएँ सुनकर बड़े-बड़े विद्यार्थी कहने लगे- ‘आप ये तो न जाने कहाँ की व्याख्या कर रहे हैं, शास्त्रीय व्याख्या कीजिये।’

प्रभु इसका उत्तर देते- ‘मैं शास्त्रों का सार ही बता रहा हूँ। किसी भी पण्डित से जाकर पूछ आओ, वह सर्वशास्त्रों का सार श्रीकृष्ण-पद-प्राप्ति ही बतायेगा।’

विद्यार्थी बेचारे इनकी अलौकिक बातों का उत्तर दे ही क्या सकते थे? सब अपनी-अपनी पुस्तकें बाँधकर अपने-अपने स्थान के लिये चले गये। कुछ समझदार और बड़े छात्र पण्डित गंगादास जी की सेवा में पहुँचे।

वे प्रणाम करके उनके समीप बैठ गये। कुशल-प्रश्न के अनन्तर आचार्य गंगादास ने उनके आने का कारण पूछा। दुःखी होकर उन लोगों ने कहा- ‘महाराज जी! हम क्या बतावें, हमारे गुरुजी जब से गया से लौटे हैं, तभी से उनकी विचित्र दशा है। वे कभी हँसते हैं, कभी राते हैं। पाठशाला में आते तो पाठ पढ़ाने के लिये हैं, किन्तु पाठ न पढ़ाकर भक्ति-तत्त्व का ही उपदेश देने लगते हैं। हम लोग व्याकरण, न्याय, अलंकार तथा साहित्य आदि किसी भी शास्त्र का प्रश्न करते हैं, तो वे उसका कृष्णपरक ही उत्तर देते हैं। उनसे जो भी प्रश्न किया जाय उसी का उत्तर ऐसा देते हैं जो पाठ्य पुस्तक के एकदम विरुद्ध है। कभी-कभी पढ़ाते-पढ़ाते रोने लगते हैं और कभी-कभी जोर से ‘हा कृष्ण! हा प्यारे! प्राणवल्लभ! पाहि माम, राधावल्लभ! रक्ष माम्’ इन वाक्यों को कहने लगते हैं। अब आप ही बताइये, इस प्रकार हमारी पढ़ाई कैसे होगी? हम लोग घर-बार छोड़कर केवल विद्याध्ययन के ही निमित्त यहाँ पड़े हुए हैं, यहाँ पर हमारी पढ़ाई-लिखाई कुछ होती नहीं। उलटे पढ़े-लिखे को भूले जाते हैं। वे आपके शिष्य हैं, आप उन्हें बुलाकर समझा दें।’

पं. गंगादास जी वैसे तो बड़े भारी नामी विद्वान थे, किन्तु उनकी विद्या पुस्तकी ही विद्या थी। भक्ति-भाव से वे एकदम कोरे थे। ईश्वर के प्रति उनका उदासीन भाव था। ‘यदि ईश्वर होगा भी तो हुआ करे हमें उससे क्या काम, समय पर भोजन कर लिया, विद्यार्थियों को पाठ पढ़ा दिया। बस, यही हमारे जीवन का व्यापार है। इसमें ईश्वर की कुछ जरूरत ही नहीं।’ कुछ-कुछ इसी प्रकार के उनके विचार थे।

महाप्रभु के भक्त हो जाने की बात सुनकर वे ठहाका मारकर हँसने लगे और विद्यार्थियों से कहने लगे- ‘हाँ, सुना तो मैंने भी है कि निमाई अब भक्त बन आया है। पण्डित होकर उस पर यह क्या भूत सवार हो गया- यह तो अनपढ़ मूर्खों का काम है। ब्राह्मण पण्डित को तो निरन्तर शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन में ही लगे रहना चाहिये। खैर, अब तुम लोग अपने-अपने स्थानों को जाओ। कल उसे मेरे पास भेज देना, मैं उसे समझा दूँगा। मेरी बात को वह कभी नहीं टालता है।’ इतना सुनकर विद्यार्थी अपने-अपने स्थानों पर चले गये।

दूसरे दिन प्रभु से विद्यार्थियों ने कहा- ‘आचार्य जी ने आज आपको अपने यहाँ बुलाया है, आगे आपकी इच्छा है, आज जाइये या फिर किसी दिन हो आइये।’ आचार्य गंगादास जी का बुलावा सुनकर प्रभु उसी समय दो-चार विद्यार्थियों को साथ लेकर उनके स्थान पर पहुँचे। वहाँ जाकर प्रभु ने अपने विद्यागुरु के चरणों की वन्दना की, गंगादास जी ने भी उनका पुत्र की भाँति आलिंगन किया और बैठने के लिये एक आसन की ओर संकेत किया। आचार्य की आज्ञा पाकर उनके बताये हुए आसन पर प्रभु बैठ गये। प्रभु के बैठ जाने पर साथ के विद्यार्थी भी पीछे एक ओर हटकर पाठशाला की बिछी हुई चटाइयों पर बैठ गये।

प्रभु के सुखपूर्वक बैठ जाने पर वात्सल्य-प्रेम प्रकट करते हुए आचार्य गंगादास जी ने कहा- ‘निमाई! तुम मेरे प्रिय विद्यार्थी हो, मैं तुम्हें पुत्र की भाँति प्यार करता हूँ। शास्त्रों में कहा है, अपने प्यारे की उसके मुख पर बड़ाई न करनी चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण होती है, किन्तु यथार्थ बात तो कही ही जाती है। तुमने मेरी पाठशाला के नाम को सार्थक बना दिया है, तुम-जैसे योग्य विद्यार्थियों को विद्या पढ़ाकर मेरा इतना दिनों का परिश्रम से पढ़ाना सफल हो गया। तुमने अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य द्वारा मेरे मुख को उज्ज्वल कर दिया। मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हूँ।’

आचार्य के मुख से अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर प्रभु लज्जितभाव से नीचे की ओर देखते हुए चुपचाप बैठे रहे, उन्हेांने इन बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

आचार्य गंगादास जी फिर कहने लगे- ‘योग्य बनने के अनन्तर तुम अध्यापक हुए और तुमने अध्यापन-कार्य में भी यथेष्ठ ख्याति प्राप्त की। तुम्हारे सभी विद्यार्थी सदा तुम्हारे शील-स्वभाव की तथा पढ़ाने की सरल सुन्दर प्रणाली की प्रशंसा करते रहते हैं, वे लोग तुम्हारे सिवा दूसरे किसी के पास पढ़ना पसंद ही नहीं करते। किन्तु कल उन्होंने आकर मुझसे तुम्हारी शिकायत की है। तुम उन्हें अब मनोयोग के साथ ठीक-ठीक नहीं पढ़ाते हो। और लोगों ने भी मुझसे आकर कहा है कि तुम अनपढ़ मूर्खभक्तों की भाँति रोते-गाते तथा हँसते-कूदते हो, एक इतने भारी अध्यापक को ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं! तुम विद्वान हो, समझदार हो, मेधावी हो।

शास्त्रज्ञ होकर मूर्खों के कामों की नकल क्यों करने लगे हो? ऐसे ढोंग तो वे ही लोग बनाते हैं, जो शास्त्रों की बातें तो जानते नहीं, विद्या-बुद्धि से तो ही हैं, किन्तु मूर्खों में अपने को पुजवाना चाहते हैं, वे ही ऐसे ढोंग रचा करते हैं। तुम्हें इसकी क्या जरूरत है? तुम तो स्वयं विद्वान हो, बड़े-बड़े लोग तुम्हारी विद्या-बुद्धि पर ही मुग्ध होकर मुक्तकण्ठ से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं और सर्वत्र तुम्हारी प्रतिष्ठा करते हैं, फिर तुम ऐसे अशास्त्रीय आचरणों को क्यों करते हो? ठीक-ठीक बताओ क्या बात है?’

ये सब बातें सुनकर भी प्रभु चुप ही रहे, उन्होंने किसी भी बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

गंगादास जी ने अपना व्याख्यान समाप्त नहीं किया। वे फिर कहने लगे- ‘तुम्हारे नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती एक नामी पण्डित हैं। तुम्हारे पूज्य पिता भी प्रतिष्ठित पण्डित थे, तुम्हारे मातृकुल तथा पितृकुल में सनातन से पाण्डित्य चला आया है, तुम स्वयं भारी विद्वान हो, तुम्हारी विद्या-बुद्धि से ही मुग्ध होकर सनातन मिश्र-जैसे राजपण्डित ने अपनी पुत्री का तुम्हारे साथ विवाह किया है। नवद्वीप की विद्वन्मण्डली तुम्हारा यथेष्ठ सम्मान करती है, विद्यार्थियों को तुम्हारे प्रति पूर्ण सम्मान के भाव हैं, फिर तुम मूर्खों के चक्कर में केसे आ गये? देखो बेटा! अध्यापक का पद पूर्वजन्म के बहुत बड़े भाग्यों से मिलता है।

तुम उसके काम में असावधानी करते हो, यह ठीक नहीं है। बोलो, उत्तर क्यों नहीं देते? अब अच्छी तरह से पढ़ाया करोगे?’ नम्रता के साथ महाप्रभु ने कहा- ‘आपकी आज्ञापान करने की भरसक चेष्टा करूँगा। क्या करूँ, मेरा मन मेरे वश में नहीं है। कहना चाहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाता है कुछ और ही!’ गंगादास जी ने प्रेम के साथ कहा- ‘सब ठीक हो जायगा। चित्त को ठीक रखना चाहिये। तुम तो समझदार आदमी हो। मन को वश में करो, सोच-समझकर बात का उत्तर दो। कल से खूब सावधानी रखना। विद्यार्थियों को खूब मनोयोग के साथ पढ़ाना। अच्छा!’

‘जो आज्ञा’ कहकर प्रभु ने आचार्य गंगादास को प्रणाम किया और वे विद्यार्थियों के साथ उनसे विदा हुए।

क्रमशः अगला पोस्ट [39]

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[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



, Shri Hari:.

[Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Chant] Harekrishna Hareram

the same infatuation

When the planet seems to be somewhere in the s-

He cries, he meditates, he bows to the people.

Again and again the breath speaks, O Hare, Lord of the universe

Narayana, the self-moving, shameless.

In whose heart the love of God has arisen, then how can he be interested in other worldly things? Whose tongue has tasted sugar candy, then when can she voluntarily like the dirt of jaggery with joy and glee? On attaining permanent love, a man really becomes mad, then he is not aware of this external world. One who gets infatuated for a moment by the grace of some great man or by the influence of some holy place, that is actually a glimpse of love. As if seeing the barely blurred peak of the temple built on the top of the mountain, a traveler from hundreds of kilometers away started dancing madly in joy that we have reached our destination. This is the condition of that momentary lover. In fact, he is still far away from true love. If one has entered the path of love in the right way, then his instinct cannot enter into worldly subjects at all. He will always remain like a maniac in love. He will neither climb up in a moment nor fall down in a second. His condition will always remain the same. Kabirdas ji says-

They climb and descend, so it is not love.

Aghat love cage settled, where did love sleep.

In fact, the state of the lover is always the same, he is anxious every moment to meet his beloved. He always remains unsatisfied. He has no one else except the Beloved. He doesn’t care whether his beloved wants him or not. He does not pay attention to this even in his dreams. Considering his beloved as everything, he always remains impatient in his memory. What a beautiful description of the form of love has been given by Rasik Raskhana-

One limb without cause, one always the same.

Ganai priyahin sarvasva jo, soi prem praman।।

Such was the love of Mahaprabhu Chaitanyadev. The grand source of devotion that emerged from the bowels of his heart, then it kept on increasing progressively.

The stream of Bhakti-Bhagirathi, which originated from the bowels of his heart, was not like the small river of Savan-Bhadon, which flows very proudly for a short time and dries up as soon as the hot sun of Jeth-Maas falls. The stream of love-Sarita that originated from his heart was permanent flowing forever and meeting only in the ocean. What is the use of lacking in it? It was a supernatural and unique stream that was increasing progressively, its comparison cannot be given with these worldly streams. It is experiential. Ever since Mahaprabhu has returned from Gaya, he is in a strange condition. While eating, they suddenly get up in the middle of the meal and start crying, while walking on the way they start dancing like mad. While lying on the bed, he suddenly gets up and sits down and ‘Ha Krishna! Saying Ha Krishna!’, they start shouting loudly. Sometimes while talking to people, he starts laughing out loud in between. There is no name of sleeping throughout the night. He keeps on taking long breaths, being impatient he hiccups like a very lonely person and so much water comes out of his eyes that all the clothes get wet.

Vishnupriya gets scared seeing her condition like this and goes and tells everything to her mother-in-law. Seeing the condition of the son, Sachimata starts crying out of grief and obeys the wishes of all the gods and goddesses. Being impatient with compassion, she prays at the lotus feet of the Lord – ‘O Asharan Sharan! Have mercy on the only son of this poor Kangalini widow. Daylo! I don’t want money, I don’t want enjoyment, I don’t want beautiful clothes and delicious food. My dear, the support of my life, the apple of my eyes, this Nimai should remain clean and healthy, this is my prayer.’ Mother used to look at Nimai’s face again and again and was very sad to see his pitiable condition.

Whatever work Mahaprabhu wants to do now, he cannot do it at all. While working, he used to remember his beloved and fell unconscious in his separation. Can’t even eat properly. He has no consciousness of bath, evening, worship, the sweet names of Shri Krishna are automatically pronounced from his mouth. Even if we answer someone’s words, then in that also only the supernatural pastimes of God are described. Even if we talk to anyone, we talk about the relationship of Shri Krishna only. That means they don’t know anything except Shri Krishna. Shri Krishna is his life, Shri Krishna is his wealth, that means his everything is Shri Krishna, for him there is nothing else in the world except Shri Krishna.

When all the students of Prabhu heard that Guruji had returned after traveling to Gayadham, they started coming to his house one by one and started praying to teach him in the school. On everyone’s request, Prabhu went to the school to teach. But what should they teach, they have completely forgotten the worldly scriptures, now they cannot talk about any subject other than Shri Krishna-Kirtan. Started teaching the same lesson to the students – ‘Brother! What is kept in these worldly scriptures? The name of Shri Krishna is the only essence, it is Madhuratimadhur. Drink only that, what will be accomplished by these cosmic scriptures? Shri Krishna is the shelter of every living being. The creation, condition and rhythm of the world keeps on happening only by the wish of that Shri Krishna. He is the abode of joy, the embodiment of happiness. It is the ultimate effort of humans to keep singing his virtues.’ Saying this, the Lord started chanting Krishna-Kirtan in a loud voice.

Some students got engrossed in the ocean of joy after hearing these things. They started experiencing bliss by being void of external knowledge. There were some who considered the knowledge of books as everything. Bhattacharya and Shastri whose only ultimate goal in life was to become, they started saying- ‘Guru ji! how are you talking What is the use of these things to us? Vaishnav devotees should think about these things. Teach us the lesson of our text book. We have not come here to the school to learn about devotion, teach us the lessons of books like Vyakarana, Alankar and Nyaya etc.’

Hearing such words of those students, the Lord said – ‘Brother! Today our nature is not healthy. Today you people keep your lessons closed, tie the books and keep them. Come on, now let’s go to bathe in the Ganges. Tomorrow we will see about the lesson.’ On hearing this, all the students tied their books and went with the Lord for a bath in the Ganges. After reaching Ganga ji, there was water-vihar for a long time. At nightfall, Prabhu returned home and the students went to their respective places. Mahaprabhu again reached the school the next day. After the Lord sat down, the students started asking questions from their respective books. Whatever question any student would ask him, he would answer it in the manner of Shri Krishna.

A student asks- ‘Tell me Siddhavarnasamamnaya?’ You answer- ‘Narayan is the Siddha Varna among all Varnas.’ Someone asks- ‘How does Varna achieve success?’

Prabhu used to say- ‘It is the right thing, every moment one should keep chanting the name of Shri Krishna.’

Hearing this, all the students started looking at each other’s face. Some used to start looking towards the Lord’s Shrimukh with fear. Some would softly say, ‘He has fever in his mind.’ The other would gently push him and forbid him to say so.

Hearing such wonderful explanations of the Lord, the big students started saying – ‘You don’t know where you are explaining this, explain the scriptures.’

The Lord would have answered this – ‘ I am only telling the essence of the scriptures. Go and ask any pundit, he will only tell you the essence of all the scriptures, Shri Krishna’s position and attainment.’

How could the poor students answer their supernatural talks? Everyone packed their books and went to their respective places. Some sensible and big students reached the service of Pandit Gangadas ji.

He bowed down and sat near him. After probing questions, Acharya Gangadas asked the reason for his arrival. Being sad, those people said – ‘ Maharaj ji! What can we tell, our Guruji has been in a strange condition ever since he returned from Gaya. Sometimes they laugh, sometimes they cry. They come to the school to teach lessons, but instead of teaching lessons, they start preaching the principle of devotion. When we ask questions of any scripture like grammar, justice, ornamentation and literature etc., they answer it only in the form of Krishna. Whatever question is asked to them, they answer in such a way that it is totally against the text book. Sometimes they start crying while teaching and sometimes loudly ‘Ha Krishna! Oh dear! Pranvallabh! Pahi mam, Radhavallabh! Raksha mam’ starts saying these sentences. Now you tell me, how will we study like this? We have left our homes and are lying here only for the sake of our studies, here we do not have any studies. On the contrary, they forget the educated. He is your disciple, you call him and explain.

Pt. Gangadas ji was a well-known scholar, but his knowledge was only of books. He was completely empty of devotion. He had an indifferent attitude towards God. ‘Even if God is there, then what use should we have with him, we have taken food on time, we have taught the students a lesson. Simply, this is the business of our life. There is no need of God in this.’ His thoughts were somewhat similar.

On hearing that Mahaprabhu had become a devotee, he started laughing out loud and said to the students – ‘Yes, I have also heard that Nimai has now become a devotee. After being a scholar, what a ghost has come upon him – this is the work of illiterate fools. A Brahmin scholar should be constantly engaged in the study and teaching of the scriptures. Well, now you guys go to your respective places. Send him to me tomorrow, I will explain to him. He never avoids my words.’ Hearing this, the students went to their respective places.

On the second day, the students said to the Lord- ‘Acharya ji has called you to his place today, it is your wish, go today or come any other day.’ After hearing the call of Acharya Gangadas ji, the Lord took two to four students with him at the same time. reached their place. Going there, Prabhu worshiped the feet of his Vidyaguru, Gangadas ji also embraced him like a son and pointed to a seat to sit. After getting the permission of Acharya, the Lord sat on the seat told by him. When Prabhu sat down, the accompanying students also moved aside and sat on the mats spread in the school.

Expressing affection and love when the Lord sat down happily, Acharya Gangadas ji said – ‘Nimai! You are my dear student, I love you like a son. It has been said in the scriptures that one should not praise one’s beloved on his face, because by doing so his life is shortened, but the truth is said. You have made the name of my school meaningful, by teaching education to deserving students like you, my hard work of so many days has been successful. You have brightened my face with your immense erudition. I am very pleased with you.’

Hearing such praise from the Acharya’s mouth, the Lord sat silently looking down in shame, he did not answer anything to these things.

Acharya Gangadas ji again started saying- ‘After becoming eligible, you became a teacher and you also gained a lot of fame in teaching work. All your students always praise your polite nature and simple beautiful method of teaching, they do not like to study with anyone other than you. But yesterday he came and complained about you to me. You don’t teach them properly with attention anymore. Other people have also come to me and said that you cry-sing and laugh-jump like illiterate fool devotees, such things do not suit such a heavy teacher! You are a scholar, you are intelligent, you are brilliant.

Why have you started copying the works of fools after being a scientist? Such pretense is created only by those people, who do not know the things of the scriptures, they are certainly intelligent, but want to be worshiped by fools, they only create such pretense. what do you need it for? You are a scholar yourself, big people being fascinated by your knowledge and wisdom, praise you with open voice and praise you everywhere, then why do you do such unscientific practices? Tell me exactly what is the matter?

Prabhu remained silent even after hearing all these things, he did not answer anything.

Gangadas ji did not finish his lecture. He again started saying- ‘Your maternal grandfather Nilambar Chakraborty is a famous scholar. Your respected father was also a respected scholar, scholarship has come from Sanatan in your maternal and paternal family, you yourself are a great scholar, fascinated by your knowledge and intelligence, a Rajpundit like Sanatan Mishra has married his daughter to you. Navadweep’s Vidwanmandali respects you enough, students have full respect for you, then how did you come in the circle of fools? look son! The post of a teacher is obtained by the great fortunes of the previous birth.

You are careless in his work, it is not right. Tell me, why don’t you answer? Will you teach me well now?’ With humility Mahaprabhu said- ‘I will try my best to obey you. What to do, my mind is not in my control. I want to say something else, something else comes out of my mouth!’ Gangadas ji said with love – ‘Everything will be fine. The mind should be kept right. You are a sensible man. Control your mind, answer things thoughtfully. Be very careful from tomorrow. Teaching students with a lot of interest. Good!’

Saying ‘Jo Agnya’, the Lord bowed down to Acharya Gangadas and left with the students.

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[From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

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