[88″श्रीचैतन्य–चरितावली”

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।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
पुरी-गमन के पूर्व

श्री‍कृष्‍णचरणाम्भोजं सत्यमेव विजानताम्।
जगत् सत्यमसत्यं वा नेतरेति मतिर्मम ।।

भगवान का स्वरूप निर्गुण है या सगुण? जगत मिथ्‍या है या सत्य? हृदय में ऐसी शंकाओं के उत्पन्न होने से ही पता चल जाता है कि अभी हम भगवत्कृपा प्राप्त करने के पूर्ण अधिकारी नहीं बन सके। जिनके ऊपर भगवान की पूर्ण कृपा हो चुकी है, उनके मस्तिष्‍क में ऐसे प्रश्‍न उठकर उनके चित्त में विक्षेप उत्पन्न नहीं करते। भगवान सगुण हों या निर्गुण, साकार हों या निराकार, यह जगत सत्य हो अथवा त्रिकाल में भी उत्पन्न न हूआ हो, उच्च साधकों को इन बातों से कुछ भी प्रयोजन नहीं, वे तो यथाशक्ति सभी संसारी परिग्रहों का परित्याग करके प्रभु के पादपद्मों में प्रेम करने के निमित्त पागल-से बन जाते हैं। वे जगत की सत्यता और मिथ्‍यात्व की उलझनों को सुलझाने में अपना अमूल्य समय बरबाद नहीं करते। क्या घट-घटव्यापी भगवान हमारे हृदय की बात को जानते नहीं? क्या वे सर्वशक्तिमान नहीं है? क्या उनका चित्त दयाभाव से भरा हुआ नहीं है? यदि हाँ, तो वे हमारे हृदय की सच्ची लगन को समझ दया के वशीभूत होकर जैसे भी निराकार अथवा साकार होंगे, हमारे सामने प्रकट हो जायँगे। हम द्वैत, अद्वैत, विशिष्‍टाद्वैत, द्वैताद्वैत तथा शुद्धाद्वैत के झमेले में क्यों पड़े? किन्तु ऐसी भावना सबकी नही हो सकती। जो मस्तिष्‍क-प्रधान हैं वे बिना सोचे रह ही नहीं सकते, उन्हें समझाकर ही श्रद्धा उत्पन्न करानी होगी और उस श्रद्धा के सहारे ही उन्हें सत्य तक पहुँचाना होगा, इसीलिये महर्षियों ने वेदान्तशास्त्र का उपदेश किया है। वेद के अन्तिम भाग को वेदान्त कहते हैं। उसका सम्बन्ध विचार से है। किन्तु हृदय प्रधान तो विचार की इतनी अधिक परवा नहीं करते, वे तो ‘श्रीकृष्‍ण, श्रीकृष्‍ण’ कहते-कहते ही अपने प्यारे के पादपद्मों तक पहुँचकर सदा उन्हीं के हो रहते हैं। उन्हीं के क्या, तद्रूपही से बन जाते हैं, किन्तु सबको ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकता। जिनके ऊपर उनका अनुग्रह हो वही इस पथका पथिक बन सकता है।

इस पर यह भी शंका हो सकती है कि फिर ‘श्रीकृष्‍ण, श्रीकृष्‍ण’ कहने वाला अज्ञानी ही बना रहेगा और बिना ज्ञान के संसारी-बन्धन से मुक्ति नहीं हो सकती ‘ॠते ज्ञानान्न मुक्ति:’ तब फिर वह मुर्ख भक्त प्रभु के पादपद्मों तक कैसे पहुँच सकता है? इसका सीधा उत्तर यही है कि जो सर्वस्व त्याग करके भगवान की ही शरण में अनन्य भाव से आ गया हो, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान जिनका स्वरूप ही ‘सत्य ज्ञानमनन्तम्’ है, उसे ज्ञानहीन कैसे बना रहने देंगे? उनकी शरण में आते ही हृदय की ग्रन्थियाँ आप-से-आप ही खुल जायँगी, बिना प्रयास के ही उसके सभी संशय दूर हो जायँगे, कर्म-अकर्म की जटिल समस्याओं को बिना सुलझाये ही उसके सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जायँगे। भगवत-शरणागति में यही तो सुलभता, सरलता और सरसता है। आकाश-पाताल एक भी न करना पड़े और आनन्द भी सदा बना रहे, सदा उस अद्भुत रस का पान ही करते रहें। किन्तु इस अनन्य उपासना और भगवत-प्रपन्नता के लिये सभी संसारी-‍परिग्रहों का पूर्ण त्याग करना होगा। तभी उस अद्भुत आसव की प्राप्ति हो सकती है। ख़ाली ढोंग बना लेने और भेदभाव के संकुचित क्षेत्र में ही बंधे रहने से काम न चलेगा।

महाप्रभु को अद्वैतवादी संन्यासियों की पद्धति से दीक्षा लेने और दण्‍ड धारण करने से अद्वैताचार्य जी को शंका हुई। उन्होंने प्रभु से पूछा- ‘प्रभो! आपने अद्वैतवादियों की भाँति यह संन्यास-धर्म क्यों ग्रहण किया? आपके सभी कार्य अलौकिक हैं, आपकी लीला जानी नहीं जा सकती।[1] इस प्रश्‍न को सुनकर कुछ मुसकराते हुए प्रभु ने कहा- ‘आचार्य देव! आप तो स्वयं विद्वान हैं। आप विचारकर स्वयं ही देंखे, क्या मैं अद्वैत के सिद्धान्त को नहीं मानता? आप ही सोचें, आप में और ईश्‍वर में चिह्नादि मात्र का ही प्रभेद दिखायी देता है। वस्तुत: तो दूसरा कोई अन्य भेद प्रतीत ही नहीं होता।’[2] इस उत्तर को सुनकर हँसते हुए अद्वैताचार्य कहने लगे- ‘धन्य हैं भगवान! आप तो वाणी के स्वामी हैं, आपके सामने तो कुछ कहते ही नहीं बनता।’[3] तब प्रभु ने बहुत ही गम्भीरता के साथ कहा-

विना सर्वत्यागं भवति भजनं नह्यसुपते-
रिति त्यागोऽस्माभि: कृत इह किमद्वैतकथया।
अयं दण्‍डो भूयान् प्रबलतरसो मानसपशो-
रितीवाहं दण्‍डग्रहणमविशेषादकरवम्।।[4]

‘आचार्यदेव! इसमें द्वैत-अद्वैत की कौन-सी बातें है। असली बात तो यह है कि बिना सर्वस्व त्याग के किये हृदयवल्लभ प्राणरमण उन श्रीकृष्‍ण भजन हो ही नहीं सकता। इसीलिये मैंने सर्वस्व त्यागकर संन्यास ग्रहण किया है। यह मन तो अत्यन्त ही चंचल पशु के समान है, यह सदा स्थिर-भाव से श्री‍कृष्‍ण–चरणों की सुखमय शीतल छाया में बैठकर विश्राम ही नहीं करता, सदा इधर-उधर भटकता ही रहता है। इसी को ताड़न करने के निमित्त मैंने यह दण्‍ड धारण किया है।’

प्रभु की ऐसी गूढ़ रहस्यपूर्ण बात सुनकर अद्वैताचार्य को मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके अनन्तर अन्य बहुत-से भक्त प्रभु के संन्यास के सम्बन्ध में भाँति-भाँति की बातें करने लगे। कोई कहता- ‘प्रभु! आपने संन्यास लेकर भक्तों के साथ बड़ा भारी अन्याय किया हैं। पहले तो आपने अपने हाथों से प्रेमतरु की स्थापना की, उसे संकीर्तन के सुन्दर सलिल से सींचा और बढा़या। जब उस पर फल लगे और उनके पकने का समय आया, तभी आपने उसे जड़ से काट दिया। लोग अपने हाथ से लगाये हुए विषवृक्ष का भी उच्छेद नहीं करते। आपके बिना भक्त कैसे जीवेंगे? कौन उनकी करूण कहानियों को सुनेगा? विपत्ति पड़ने पर भक्त किसकी शरण में जायँगे? संकीर्तन में अपने अद्भुत और अलौकिक नृत्य से अब उन्हें कौन आह्लादित करेगा? कौन अब भक्तों के सहित गंगातट पर जलविहार करावेगा? कौन हमें निरन्तर कृष्‍ण-कथा सुनाकर सुखी और प्रमुदित बनावेगा? प्रभो! भक्त आपके वियोग-दु:ख को सहन करने में समर्थ न हो सकेंगे। ‘प्रभु भक्तों को ढाँढस बंधाते हुए कहते- ‘देखो भाई! घबड़ाने से काम न चलेगा। अब जो होना था, सो तो हो ही गया। अब संन्यास छोड़कर गृहस्थी बनने की सम्मति तो तुम लोग भी मुझे न दोगे। हम, तुम सभी लोगों के स्वामी अद्वैताचार्य जी यहाँ रहेंगे ही। मैं भी जगन्ना‍थपुरी में निवास करूंगा। कभी-कभी तुम लोग मेरे पास आते-जाते ही रहोगे। मैं भी कभी-कभी गंगास्नान के निमित्त यहाँ आया करूंगा। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे से भेंट होती ही रहेगी।’

इतने में ही चन्द्रशेखर आचार्यरत्न बोल उठे- ‘हम सब लोगों को तो आप जैसे-तैसे समझा भी देंगे, किन्तु शचीमाता से क्या कहते हैं, वह तो आपके बिना जीना ही नहीं चाहतीं!’
प्रभु ने कातर-भाव से कहा- ‘माता को मैं समझा ही क्या सकता हूँ? आप लोग ही उसे समझावेंगे तो समझेगी। फिर माता जैसी आज्ञादेगी मैं वैसा ही करूँगा। यदि वह मुझसे घर रहने के लिये कहेगी तो मैं वैसा भी कर सकता हूँ।’
इतने में ही अश्रु-विमोचन करती हुई माता भी आ पहुँची। उन्होंने गद्गद कण्‍ठ से कहा- ‘निमाई! क्या सचमुच में तू हमें छोड़कर यहाँ से भी कहीं अन्यत्र जाने का विचार कर रहा है?’

प्रभु ने माता को समझाते हुए करूण स्वर में कहा- ‘माता! मैं तुम्हारी आज्ञा का उल्लघंन नहीं कर सकता। तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा। संन्यासी के लिये अपने घर के समीप तथा अपने सम्बन्धियों के यहाँ इतने दिन रहने का विधान ही नहीं है! अधिक दिनों तक एक का अन्न खाते रहना भी संन्यासी के लिये निषेध है। किंतु मैंने तुम्हारी और आचार्य की प्रसन्नता के निमित्त इतने दिनों त‍क यहाँ रहकर तुम्हारे ही हाथ की भिक्षा की। अब मुझे कहीं अन्यत्र जाकर रहना चाहिये। मेरी इच्छा तो श्रीवृन्दावन जाने की थीं, किंतु तुम सबका स्नेह मुझे बलपूर्वक यहाँ खींच लाया। अब तुम जहाँ के लिये आज्ञा करोगी, वहीं रहूंगा। तुम्हारी आज्ञा के प्रतिकुल आचरण करने की मुझमें क्षमता नहीं है। माता! मैं सदा तुम्हारा रहा हूँ और रहूँगा।’

अपने संन्यासी पुत्र के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर माता का हृदय भी पलट गया। इन प्रेमवाक्यों ने मानो अधीर हुई माता के हृदय में साहस का संचार किया। माता ने दृढ़ता के स्वर में कहा- ‘बेटा! मेरे भाग्य में जैसा बदा होगा, उसे मैं भोगूँगी। मुझे अपना इतना खयाल नहीं था, जितना कि विष्‍णुप्रिया का। वह अभी निरी अबोध बालिका है, संसारी बातों से वह एकदम अपरिचित है! किंतु भावी प्रबल होती है, अब हो ही क्या सकता है? संन्यास त्यागकर फिर गृहस्थ में प्रवेश करने की पापवार्ता को अपने मुख से निकालकर मैं पापकी भागिनी नहीं बनूंगी। संन्यासी-अवस्था में घर पर रहने से सभी लोग तेरी अवश्‍य ही निन्दा करेंगे। तेरे वियोग-दु:ख को तो जिस किसी प्रकार मैं सहन भी कर सकती हूँ, किंतु लोगों के मुख से तेरी निन्दा मैं सहन न कर सकूँगी; इसलिये मैं तुझसे घर पर रहने का भी आग्रह नहीं करती। वृन्दावन बहुत दूर है, तेरे वहाँ रहने से भक्तों को भी क्लेश होगा और मुझे भी तेरे समाचार जल्दी-जल्दी प्राप्त न हो सकेंगे। यदि तेरी इच्छा हो और अनुकूल पड़े तो तू जगन्नाथपुरी में निवास कर।

पुरी की यात्रा के लिये यहाँ से प्रतिवर्ष हजारों यात्री जाते हैं, भक्त भी रथ यात्रा के समय जाकर तुझसे भेंट कर आया करेंगे और मुझ भी तेरी राजी-खुशी का समाचार मिलता रहेगा। इस प्रकार नीलाचल में रहने से हम सभी को तेरा वियोग-दु:ख इतना अधिक न अखरेगा। आगे जहाँ तुझे अनुकूल पड़े।’ प्रभु ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘जननी! तुम धन्य हो! विश्‍वरूपी की माता को ऐसे ही वचन शोभा देते हैं। तुमने संन्यासी की माता की माता के अनुरूप ही वाक्य कहे हैं। मुझे तुम्हारी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं अब पुरी में ही जाकर रहूँगा और वहीं से कभी-कभी गंगास्नान के निमित्त‍ यहाँ भी आता-जाता रहूंगा।’

इस प्रकार माता ने भी प्रभु को नीलाचल में ही रहने की अनुमति दे दी और भक्तों ने भी रोते-रोते विषण्‍णवदन होकर यह बात स्वीकार कर ली। प्रभु का नीलाचल जाने का निश्‍चय हो गया। बहुत-से भक्त प्रभु के साथ चलने के लिये उद्यत हो गये,किंतु प्रभु ने सबको रोक दिया और सबसे अपने-अपने घरों को लौट जाने का आग्रह करने लगे। भक्त प्रभु को छोड़ना नहीं चाहते थे, वे प्रभु के प्रेमपाश में ऐसे बंधे हुए थे कि घर जाने का नाम सुनते ही घबड़ाते थे। प्रभु के बहुत आग्रह करने पर भी जब भक्त प्रभु से पहले अपने-अपने घरों को जाने के लिये राजी नहीं हुए तब प्रभु ने पहले स्वयं ही नीलाचल के लिये प्रस्थान करने का विचार किया। इतने दिनों त‍क अद्वैताचार्य के आग्रह से टिके हुए थे, अब रोते-रोते अद्वैताचार्य ने भी सम्मति दे दी। प्रभु के साथ नित्यानन्दजी, जगदानन्द पण्डित, दामोदर पण्डित और मुकुन्ददत्त- ये चार भक्त जाने के लिये तैयार हुए। आचार्य देव के आग्रह से प्रभु ने भी इन्हें साथ चलने की अनूमति प्रदान कर दी।

क्रमशः अगला पोस्ट [89]
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[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



, Shri Hari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Chant] Harekrishna Hareram before departure

Let them know the lotus feet of Sri Krishna as truth. I think the world is true or false and nothing else.

Is God’s form Nirguna or Saguna? Is the world false or true? It is known only by the emergence of such doubts in the heart that we have not yet become fully entitled to receive the grace of God. Those who have been fully blessed by God, such questions do not arise in their mind and create distraction in their mind. Whether God is Saguna or Nirguna, corporeal or formless, whether this world is real or did not arise even in trikal, these things are of no use to the high seekers, they leave all the worldly possessions as far as possible and love the lotus feet of the Lord. They become madly for the sake of. He does not waste his precious time in solving the tangles of truth and falsehood of the world. Doesn’t the omnipresent God know what is in our heart? Is He not omnipotent? Is his heart not full of kindness? If yes, then understanding the true passion of our heart and being subjugated by mercy, however formless or corporeal they may appear in front of us. Why do we get into the dilemma of Dvaita, Advaita, Vishishtadvaita, Dvaitadvaita and Shuddhadvaita? But not everyone can have such feelings. Those who are head-oriented cannot live without thinking, faith has to be created by explaining them and with the help of that faith they have to reach the truth, that is why the great sages have preached Vedanta Shastra. The last part of Veda is called Vedanta. It is related to thought. But the head of the heart doesn’t care so much about the thoughts, they reach the lotus feet of their beloved by saying ‘Shri Krishna, Shri Krishna’ and always belong to them. What about them, they become like that, but not everyone can get such a fortune. The one who has his grace, only he can become a traveler of this path.

There can also be a doubt on this that then the one who says ‘Shri Krishna, Shri Krishna’ will remain ignorant and without knowledge there cannot be freedom from worldly bondage ‘Rite Gyananna Mukti:’ then how did that foolish devotee reach the lotus feet of the Lord? can? The straight answer to this is that the one who has renounced everything and has come to the refuge of God with a unique spirit, how will God allow him to remain without knowledge, whose very form is ‘Satya Gyanmanantam’? As soon as he comes under his shelter, the glands of the heart will automatically open, without any effort all his doubts will be dispelled, without solving the complex problems of action and inaction, all his actions will be diminished. This is the accessibility, simplicity and sweetness in Bhagwat-Sharanagati. You don’t have to cross the sky and the underworld, and the joy should always be there, always keep drinking that wonderful juice. But for this exclusive worship and devotion to God, all worldly attachments have to be completely renounced. Only then that wonderful infusion can be attained. Making empty pretense and being tied to the narrow field of discrimination will not work.

Advaitacharya ji was suspicious of Mahaprabhu taking initiation from the method of monastic monks and wearing punishment. He asked the Lord – ‘ Lord! Why did you accept this sannyas-religion like the monists? All your works are supernatural, your pastimes cannot be known. [1] Hearing this question, the Lord smiled and said- ‘Acharya Dev! You yourself are a scholar. You think and see for yourself, do I not believe in the principle of Advaita? Think for yourself, the only difference between you and God is visible in the symbols. In fact, there doesn’t seem to be any other difference at all.’ You are the master of speech, I can’t say anything in front of you.'[3] Then the Lord said very seriously-

Without all sacrifice there is no worship, O Lord- Riti sacrifice we have made here what is the story of duality. This punishment is even stronger than the mental animal- Riti I did not take the punishment without distinction.

‘ Acharyadev! What are the aspects of dualism and non-dualism in this? The real thing is that without sacrificing everything, Hridyavallabh Prana Raman, those Shri Krishna hymns cannot happen. That’s why I have renounced everything and taken sannyas. This mind is like a very fickle animal, it does not always take rest by sitting under the pleasant cool shade of Shri Krishna’s feet, it always wanders hither and thither. To chastise him, I have taken this punishment.’

Advaitacharya was very happy in his heart after hearing such a deep and mysterious talk of the Lord. After this, many other devotees started talking about the retirement of the Lord. Someone says – ‘Lord! You have done great injustice to the devotees by taking retirement. First of all, you established Premtaru with your own hands, watered it and made it grow with the beautiful Salil of Sankirtan. When it bore fruits and the time came for them to ripen, then only you cut it from the root. People don’t even uproot the poison tree planted by their own hands. How will the devotees live without you? Who will listen to their sad stories? In whose shelter will the devotees go in case of calamity? Who will delight him now with his wonderful and transcendental dance in sankirtana? Now who along with the devotees will get Jal Vihar done on the banks of the Ganges? Who will make us happy and cheerful by continuously telling Krishna-Katha? Lord! Devotees will not be able to tolerate your separation. ‘ While comforting the devotees, the Lord said – ‘Look brother! Panic will not work. Now what had to happen has already happened. Now even you people will not give me permission to leave sannyas and become a householder. We, Swami Advaitacharya ji of all of you will remain here. I will also reside in Jagannathpuri. Sometimes you people will keep coming and going to me. I will also come here sometimes for the purpose of bathing in the Ganges. In this way, we will keep meeting each other.

Chandrashekhar Acharyaratna said in the meantime – ‘We will make everyone understand anyway, but what do you say to Sachimata, she does not want to live without you!’ The Lord said anxiously – ‘ What can I make the mother understand? If only you people explain to her, she will understand. Then I will do as the mother orders. If she asks me to stay home, I can do that too.’ Meanwhile, the mother also reached there shedding tears. He said to Gadgad Kanth – ‘Nimai! Are you really thinking of leaving us and going somewhere else from here?’

Explaining to the mother, the Lord said in a compassionate voice – ‘Mother! I cannot disobey your orders. I will do as you say. There is no law for a sannyasin to stay near his home and with his relatives for so long! Eating one’s food for a long time is also prohibited for a monk. But for the sake of your and Acharya’s happiness, I stayed here for so many days and begged for your hand. Now I should go and live somewhere else. I wanted to go to Sri Vrindavan, but your love forcefully pulled me here. Now wherever you command, I will stay there. I do not have the capacity to act contrary to your orders. Mother! I have always been yours and will be.

Hearing such loving words of her monk son, even the mother’s heart turned. These words of love infused courage in the heart of an impatient mother. Mother said in a firm voice – ‘ Son! I will suffer whatever is in my destiny. I didn’t care about myself as much as Vishnupriya. She is still an innocent girl, she is completely unfamiliar with worldly things! But the future prevails, what can happen now? I will not become a partaker of sin by taking out of my mouth the sinful words of relinquishing renunciation and then entering a householder. Everyone will definitely criticize you by staying at home in the state of a monk. I can tolerate your separation and sorrow in any way, but I will not be able to tolerate your condemnation from the mouth of people; That’s why I don’t even request you to stay at home. Vrindavan is far away, devotees will also be in trouble if you stay there and I too will not be able to get your news soon. If you wish and it suits you, then you reside in Jagannathpuri.

Every year thousands of pilgrims go from here to visit Puri, devotees will also come to meet you at the time of Rath Yatra and I will also keep getting the news of your happiness. By living in Neelachal in this way, the sorrow of your separation will not be so much for all of us. Further wherever it suits you.’ The Lord expressed his happiness and said – ‘Mother! You are blessed! Such words suit the mother of the universal form. You have said the same sentences as the mother of the monk’s mother. I obey your orders. From now on I will stay in Puri and from there I will come and go here occasionally for the purpose of bathing in the Ganges.’

In this way, the mother also allowed the Lord to stay in Neelachal and the devotees also accepted this by crying and crying. The Lord has decided to go to Neelachal. Many devotees were eager to walk with the Lord, but the Lord stopped everyone and urged everyone to return to their respective homes. The devotees did not want to leave the Lord, they were bound in the love of the Lord in such a way that they used to get scared on hearing the name of going home. When the devotees did not agree to go to their respective homes before Prabhu even after many requests from Prabhu, then Prabhu himself first thought of leaving for Neelachal. Advaitacharya had persisted for so many days, now while crying Advaitacharya also gave his consent. Nityanandji, Jagadanand Pandit, Damodar Pandit and Mukundadatta – these four devotees got ready to go with the Lord. On the request of Acharya Dev, the Lord also gave him permission to walk with him.

respectively next post [89] , [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

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