[92]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

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।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
श्रीसाक्षिगोपाल

पद्भ्‍यां चलन् य: प्रतिमास्‍वरूपो।
ब्रह्मण्‍यदेवो हि शताहगम्‍यम्।
देशं ययौ विप्रकतेऽदभुतोऽयं
तं साक्षिगोपालमहं नतोऽस्मि।।

प्रात:काल उठकर प्रभु नित्‍यकर्म से निवृत हए और भगवान श्रीगोपीनाथ जी की मंगल-आरती के दर्शन करके उन्‍होंने भक्तों के सहित आगे के लिये प्रस्‍थान किया। रास्‍ते में उन्‍हें वैतरणी नदी मिली। उसमें स्‍नान करके प्रभु राजपुर में पहुँचे। वहाँ वराह भगवान का स्‍थान हैं। वराहभगवान के दर्शन करने के अनन्‍तर याजपुर में होते हुए और शिवलिंग, विरजादर्शन तथा ब्रह्मकुण्‍ड में स्‍नान करते हुए नाभिगया में पहुँचे। वहाँ दशाश्‍वमेध घाट पर स्‍नान करके कण्‍टक नगर में पहुँचकर भगवान साक्षिगोपाल के दर्शन किये। साक्षिगोपाल जी के मन्दिर में बहुत देर तक कृष्‍ण-कीर्तन होता रहा। नगर के बहुत-से नर-नारी प्रभु के कीर्तन और नृत्‍य को देखने के लिये एकत्रित हो गये। प्रभु को नृत्‍य करते देखकर ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष भी आनन्‍द में उन्‍मत होकर कठपुतलियों की तरह नाचने-कूदने लगे। बहुत देर तक संकीर्तन-आनन्‍द होता रहा। तब प्रभु ने अपने भक्‍तों के सहित साक्षिगोपाल के मन्दिर में विश्राम किया।

रात्रि में भक्‍तों के साथ कथोपकथन करते-करते प्रभु ने नित्‍यानन्‍द जी से पूछा- ‘श्रीपाद ! आपने जो प्राय: भारत वर्ष के सभी मुख्‍य-मुख्‍य तीर्थो में भ्रमण किया है। आपसे तो सम्‍भवतया कोई प्रसिद्ध तीर्थ न बचा हो, जहाँ जाकर आपने दर्शन-स्‍नानादि न किया हो?’

कुछ धीरे से नित्‍यानन्‍दन जी ने कहा- ‘हाँ, प्रभो ! बारह वर्ष मेरे इसी प्रकार तीर्थो के भ्रमण में व्‍यतीत हुए।’ प्रभु ने पूछा-‘यहाँ भी पहले आये थे?’ नित्‍यानन्‍दन जी ने उतर दिया- ‘पुरी से लौटते हुए मैंने साक्षिगोपाल भगवान के दर्शन किये थे।’

प्रभु ने कहा- ‘तीर्थ में जाकर उस तीर्थ का माहात्‍म्‍य अवश्‍य सुनना चाहिये। बिना महात्‍म्‍य सुने तीर्थ का फल आधा ही होता है। आप मुझे साक्षिगोपाल का माहात्‍म्‍य सुनाइये। इनका नाम साक्षिगोपाल क्‍यों पड़ा? इन्‍होंने किसकी साक्षी दी थी?’ प्रभु की ऐसी आज्ञा सुनकर धीरे-धीरे नित्‍यानन्‍द जी कहने लगे- ‘मैंने किसी पुराणों में से तो साक्षिगोपाल भगवान की कथा नहीं सुनी, क्‍योंकि यह बहुत प्राचीन तीर्थ नहीं है। अभी थोड़े ही दिनों में साक्षिगोपाल भगवान विद्यानगर से यहाँ पधारे हैं। लोगों के मुख से मैने जिस प्रकार साक्षिगोपाल की कथा सुनी है, उसे सुनाता हूँ।’

तैलंग-देश में गोदावरी नदी के तट पर ‘विद्यानगर’ नाम की कोट-देश की प्राचीन राजधानी थी। वह नगर बड़ा ही समृद्धशाली तथा समुद्र के समीप होने के कारण वाणिज्‍य-व्‍यापार का केन्‍द्र था। उसी नगर में एक समृद्धशाली कुलीन ब्राह्मण रहता था। ब्राह्मण भगवत-भक्‍त था। वह गौ, ब्राह्मण तथा देवप्रतिमाओं में भक्ति रखता था। घर में खाने-पीने की कमी नहीं थी। लड़के बड़े हो गये थे, इसलिये घर के सम्‍पूर्ण कामों को वे ही करते थे। यह वृद्ध ब्राह्मण तो माला लेकर भजन किया करता था।

घर में पुत्र, पुत्रवधू, स्‍त्री तथा एक अविवाहित छोटी कन्‍या थी। ब्राह्मण की इच्‍छा तीर्थ यात्रा करने की हुई। उस वृद्ध ब्राह्मण के समीप ही एक गरीब ब्राह्मण का लड़का रहता था। उसके माता-पिता उसे छोटा ही छोड़कर परलोकवासी हो गये थे। जिस किसी प्रकार मेहनत-मजूरी करके वह अपना निर्वाह करता था। किन्‍तु उसके हृदय में भगवान के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। वह एकान्‍त में सदा भगवान का भजन किया करता था। इस कारण उस पर भगवान की कृपा थी। भगवान की कृपा की सबसे मोटी पहचान यही है कि जिसे ब्राह्मणों में, तीर्थों में, भगवत-चरित्रों में, देवस्‍थानों में, भगवत्‍प्रतिमाओं में, गौओं में, तुलसी-पीपल आदि पवित्र वृक्षों में श्रद्धा हो, इन सबके प्रति हार्दिक अनुराग हो, उसे ही समझना चाहिये कि वह भगवत-कृपा का पात्र बन चुका है। उस ब्राह्मण कुमार का इन सबके प्रति अनुराग था, इसीलिये वह वृद्ध ब्राह्मण इस लड़के पर स्‍नेह करता था।

एक दिन उस वृद्ध ब्राह्मण ने इस युवक से कहा-‘भाई ! यदि तुम्‍हारी इच्‍छा हो तो चलो तीर्थ यात्रा कर आवें। गृहस्‍थी के जंजाल से कुछ दिन के लिये तो छूट जायँ।’

प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए युवक ने कहा- ‘इससे बढ़कर उत्तम बात और हो ही क्‍या सकती है? तीर्थ यात्रा का सुयोग तो किसी भाग्‍यवान पुरुष को ही प्राप्‍त हो सकता है। मैं आपके साथ चलने के लिये तैयार हूँ।’

अपने मन के योग्‍य साथी पाकर वह वृद्ध ब्राह्मण बहुत ही प्रसन्‍न हआ और उस युवक को साथ लेकर तीर्थ यात्रा के लिये घर से निकल पड़ा। दोनों ही गया, काशी, प्रयाग, अयोध्‍या, नैमिषारण्‍य, ब्रह्मावर्त आदि तीर्थ स्‍थानों के दर्शन करते हुए व्रजमण्‍डल में पहुँचे। वहाँ पर इन्‍होंने भद्रवन, विल्‍ववन, लोहवन, भाण्‍डीवन, महावन, मधुवन, तालवन, बहुलावन, काम्‍यवन, खदिरवन और श्रीवृन्‍दावन आदि बारह वनों तथा उपवनों की यात्रा की।

व्रज के नंदगाँव, बरसाना, गोवर्धन आदि सभी तीर्थों के दर्शन करते हुए इन लोगों ने वृन्‍दावन में आकर कुछ दिन विश्राम किया। उस छोटे ब्राह्मणकुमार ने सम्‍पूर्ण यात्रा में उस वृद्ध ब्राह्मण की बड़े ही नि:स्‍वार्थभाव से सब प्रकार की सेवा-शुश्रूषा की। वह वृद्ध ब्राह्मण इस युवक की सेवा-शुश्रूषा से बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हुआ। उसने गोपाल जी के मन्दिर में कृतज्ञता प्रकट करते हुए उस ब्राह्मण कुमार से कहा- ‘भाई ! तुमने हमारी ऐसी अद्भुत सेवा की है कि ऐसी सेवा पुत्र अपने पिता की भी नहीं कर सकता। मैं इस कृतज्ञता के बोझ से दबा-सा जा रहा हूँ, मैं सोच रहा हूँ, इसके बदले में मैं तुम्‍हारा क्‍या उपकार करूँ?’

’ब्राह्मणकुमार ने कहा- ‘आप तो मेरे वैसे ही पूज्‍य हैं, फिर वृद्ध हैं, भगवद्भक्‍त हैं, पड़ोसी हैं, मेरे पिता के तुल्‍य हैं और आजकल तीर्थयात्री हैं। आपकी सेवा करना तो मेरा हर प्रकार से धर्म है। इसमें मैंने प्रशंसा के योग्‍य कौन-सा काम किया है। यह तो मैंने अपने मनुष्‍योचित कर्तव्‍य का ही पालन किया है। मैंने किसी इच्‍छा से आपकी सेवा नहीं की, इसलिये इसका बदला चुकाने की क्‍या जरुरत है?’

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘तुम तो बदला नहीं चाहते, किन्‍तु मेरा भी तो कुछ कर्तव्‍य है, जब तक मैं तुम्‍हारे इस महान उपकार का कुछ थोड़ा-बहुत प्रत्‍युपकार न कर सकूँगा, तब तक मुझे शान्ति न होगी। मेरी इच्‍छा है कि मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्‍हारे साथ कर दूँ?’

आश्‍चर्य प्रकट करते हुए उस युवक ने कहा- ‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं, कहाँ आप इतने भारी कुलीन, धनी-मानी, बड़े परिवार वाले गृहस्‍थ, कहाँ मैं माता-पिताहीन, अकुलीन,अनाथ ब्राह्मणकुमार ! मेरा आपका सम्‍बन्‍ध कैसा- सम्‍बन्‍ध तो सदा समान शील-गुणवाले पुरुषों में होता है।
वृद्ध ने कहा-‘पिता का कर्तव्‍य है कि वह कन्‍या के लिये योग्‍य पति की खोज करे। उसके धन, परिवार और वैभव की ओर विशेष ध्‍यान न दे। तुम्‍हारे-जैसे शील-स्‍वभाव का वर अपनी कन्‍या के लिये और कहाँ मिलेगा? इसलिये मैं तुम्‍हें ही अपनी कन्‍या दूँगा। तुम्‍हें मेरी यह प्रार्थना स्‍वीकार करनी पड़ेगी ?

उस युवक ने कहा- ‘आप तो खैर राजी हो जायँगे, किन्‍तु आपकी स्‍त्री, आपका पुत्र तथा जाति-परिवार वाले इस सम्‍बन्‍ध को कब स्‍वीकार करने लगे? वे तो इस बात के सुनते ही आग-बबूला हो जायँगे?’

वृद्ध ब्राह्मण ने दृढ़ता के साथ कहा- ‘हो जाने दो सबको आग-बबूला। किसी का इसमें क्‍या साझा है ? लड़की मेरी है, मैं जिसे चाहूँगा दूँगा। कोई इसमें कह क्‍या सकता है? तुम स्‍वीकार कर लो।’
युवक ने कहा-‘मुझे स्‍वीकार करने में तो कोई आपत्ति नहीं है, किन्‍तु आप घर जाकर यहाँ की सब बातें भूल जायँगे, स्‍त्री, पुत्र तथा परिवार वालों के आग्रह के सामने वहाँ आपकी कुछ भी न चल सकेगी।’

वृद्ध ब्राह्मण ने जोश में आकर कहा- ‘मैं गोपाल भगवान को साक्षी करके कहता हूँ कि मैं तुम्‍हारे साथ अपनी पुत्री का विवाह अवश्‍य करूँगा। बस, अब तो विश्‍वास करोगे?’ कुछ धीरे से ब्राह्मण कुमार ने कहा- ‘अच्‍छी बात है’, वहाँ चलने से सब पता चल जायगा!’ इस प्रकार गोपाल के सामने पुत्री देने की प्रतिज्ञा करके वह वृद्ध ब्राह्मण थोड़े दिनों के बाद उस युवक के साथ लौटकर विद्यानगर में आ गया।

वहाँ आवेश में आकर तो ब्राह्मण कन्‍यादान का वचन दे आया, किन्‍तु स्‍त्री, पुत्र आदि के सामने उसकी इस बात को कहने की हिम्‍मत न पड़ी। एक दिन उसने एकान्‍त में अपने पुत्र पर यह बात प्रकट की। इस बात के सुनते ही सम्‍पूर्ण घर में द्वन्‍द्व मच गया। लड़का आपे से बाहर हो गया, स्‍त्री अलग विष खाने के लिये तैयार हो गयी। परिवार वाले मिलकर जाति से अलग कर देने की धमकी देने लगे।

वृद्ध ब्राह्मण किंकर्तव्‍यविमढ़-सा बन गया। उसे कूछ सूझता ही नहीं था कि ऐसी स्थिति में क्‍या करूँ? अब वह उस युवक से आँखें मिलाने में भी डरता था।

उस युवक ने कुछ काल तक प्रतीक्षा की वह ब्राह्मण स्‍वयं ही अपने वचनों के अनुसार कार्य करे, किन्‍तु जब बहुत दिन हो गये, तो उस युवक ने सोचा- ‘सम्‍भव है बूढ़े बाबा अपने वचनों को भूल गये हों, इसलिये एक बार उन्‍हें स्‍मरण तो दिला देना चाहिये। फिर उसके अनुसार काम करना-न करना उनके अधीन है?’

यह सोचकर वह युवक उन वृद्ध ब्राह्मण के यहाँ गया। उस युवक को देखते ही वृद्ध ब्राह्मण का चेहरा उतर गया। उसने सूखे मुख से कहा- ‘आओ भाई ! आज तो बहुत दिनों में दिखायी पड़े।’

थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें होने के अनन्‍तर उस युवक ने कहा- ‘बाबा ! आपने वृन्दावन में गोपाल जी के सामने मुझे अपनी कन्‍या देने का वचन दिया था, याद है?’ वृद्ध ब्राह्मण इस बात का जब तक उतर भी न देने पाया था, तब तक उसका पुत्र डंडा लेकर उसके उपर दौड़ा और कहने लगा- ‘क्‍यों रे नीच ! तेरा इतना बड़ा साहस? मेरा बहनोई बनना चाहता है? अभी इसी समय मेरे घर में से निकल जा, नहीं तो ऐसा लठट मारूँगा कि खोपड़ी बीच में से खुल जायगी।’

इस बात को सुनकर उस युवक को बड़ा क्षोभ हुआ। उसे विवाह न होने का दु:ख नहीं था, वह अपने अपमान के कारण जलने लगा। उसे अपनी स्थिति के उपर बड़ा दु:ख होने लगा, वह सोचने लगा-आज मेरे माता-पिता होते और चार पैसे मेरे पास होते तो इसकी क्‍या हिम्‍मत थी, जो मेरा यह इस प्रकार से अपमान कर सकता? अच्‍छा चाहे कुछ भी क्‍यों न हो इस अपमान का बदला तो अवश्‍य लूँगा। या तो मैं इसकी बहिन के साथ विवाह करूँगा या जीवित ही न रहूँगा। यह सोचकर उसने पंचों को इकट्ठा किया।

पंचों के इकट्ठे हो जाने पर उसने आदि से अन्‍त तक सभी कथा कह सुनायी और अन्‍त में कहा- ‘मैं और कुछ नहीं चाहता। ये बूढ़े बाबा ही अपने धर्म से पंचों के सामने कह दें कि उन्‍होंने गोपाल जी के मन्दिर में उन्‍हीं की साक्षी देते हुए मुझे कन्‍यादान करने का वचन नहीं दिया था?’

ब्राह्मण को तो उसके पुत्र ने पहले ही सिखा-पढ़ाकर ठीक कर रखा था। उसने पिता को समझा रखा था आप झूठ-सत्‍य कुछ भी न कहें। केवल इतना ही कह दें- ‘मुझे उस समय का कुछ पता नहीं। इसमें झूठ भी नहीं। आप ही बतावें किस दिन की बात है? दु:ख के सहित पुत्र स्‍नेह के कारण पिता ने पंचों के सामने ऐसा कहना स्‍वीकार कर लिया। पंचों के पूछने पर ब्राह्मण ने धीरे से कहा- ‘मुझे ठीक-ठीक याद नहीं हैं, यह कब की बात है।’ बस, इतने पर ही, उसके पुत्र ने बीच में ही कहा- यह अकुलीन ब्राह्मण युवक झुठा है। मेरे पिता के साथ कोई दुसरा पुरुष था ही नही, यही अकेला था, इसने मेरे पिता से धन अपहरण करने के लिये उन्‍हें धतूरा खिला दिया और सब धन ले लिया। अब ऐसी बातें बनाता है। भला, मेरे पिता ऐसे अकुलीन, घरबारहीन, कंगाल को अपनी पुत्री देने का वचन कभी दे सकते हैं?’

पंचों ने उस युवक से कहा- ‘क्यों भाई! यह क्या कह रहा है? वृद्ध ने जब तुम्हें पुत्री देने का वचन दिया, उस समय वहाँ कोई और भी पुरुष था, तुम किसी की साक्षी दे सकते हो?’

युवक ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘गोपाल जी के ही सामने इन्‍होंने कहा था और गोपाल जी को छोड़कर और मेरा कोई दूसरा साक्षी नहीं है।’

एक युवक ने पंच ने इस बात को सुनकर हंसी के स्‍वर में कहा- ‘तो क्‍या तुम गोपाल को यहाँ साक्षी देने के लिये ला सकते हो?

आवेश में आकर जोर से उस युवक ने कहा- ‘हाँ, ला सकता हूँ।’

इस बात को सुनते ही सभी अवाक रह गये और आश्‍चर्य प्रकट करते हुए एक स्‍वर में सब के-सब कहने लगे- हाँ,हाँ, यदि तुम साक्षी के लिये गोपाल जी को ले आओ और सब पंचों के सामने गोपाल जी तुम्‍हारी साक्षी दे दें तो हम जबरदस्‍ती लड़की का विवाह तुम्‍हारे साथ करवा सकते है।’

इस बात से प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘हाँ, यही ठीक है। यदि यह साक्षी के लिये गोपाल जी को ले आवें तो मैं अपनी कन्‍या का विवाह इसके साथ जरूर कर दूँगा।’ ‘वृद्ध को विश्‍वास था कि भक्‍तवत्‍सल भगवान मेरी प्रतीज्ञा को पूर्ण करने के निमित और इस ब्राह्मणकुमार की लाज बचाने के निमित्त अवश्‍य ही साक्षी देने के लिये आ जायँगे। किंतु उसके उस उद्दण्‍ड पुत्र को इस बात का विश्‍वास कब हो सकता था कि पाषाण की मूर्ति भी साक्षी देने के लिये कभी आ सकती है क्‍या? उसने सोचा, यह अपने-आप ही बहुत अच्‍छा उपाय निकल आया। न तो पत्‍थर की प्रतिमा साक्षी देने के लिये यहाँ आवेगी और न मुझे अपनी बहिन का विवाह इसके साथ करना होगा। यह सोचकर वह जल्‍दी से बोल उठा- ‘यह बात मुझे भी मंजूर है, यदि गोपाल जी आकर सबके सामने इस बात की साक्षी दे जायँ तो मैं अवश्‍य ही इन्‍हें अपना बहनोई बना लूँगा।’

विश्‍वासी युवक ने पंचों से इस बात पर हस्‍ताक्षर करा लिये तथा पुत्रसहित उस वृद्ध ब्राह्मण के भी हस्‍ताक्षर ले लिये कि यदि गोपाल साक्षी देने आ जायँगें, तो हम अवश्‍य इनका विवाह कर देंगे। सबसे लिखवाकर वह सीधा वृन्‍दावन पहुँचा और वहाँ जाकर उसने बड़ी ही दीनता के साथ कातरवाणी में गोपाल जी से प्रार्थना की। भक्‍त के आर्तनाद को सुनकर भगवान प्रकट हुए और उससे कहा- ‘तुम चलो, मैं वही प्रकट होकर तुम्‍हारी साक्षी दूँगा।’ युवक ने कहा- ‘भगवन् ! ऐसे काम नहीं चलेगा। पता नहीं, आप किस रुप से प्रकट हों और उन लोगों को उस पर विश्‍वास हो या न हो। इसलिये आप इसी प्रतीमा के रुप से मेरे साथ चलें।’

भगवान ने हंसकर कहा- ‘कहीं पत्‍थर की प्रतीमा भी चलती है? यह एकदम असम्‍भव बात है।’

युवक भक्‍त ने कहा- ‘प्रभो ! आपके लिये कुछ भी असम्‍भव हो !’ आपको इसी रूप से मेरे साथ चलना होगा।’

भगवान तो भक्‍तों के अधीन हैं, उन्‍होंने स्‍वीकार कर लिया और कहने लगे- ‘तुम आगे-आगे चलो, मैं तुम्‍हारे पीछे-पीछे चलूँगा। तुम पीछे फिरकर मेरी ओर न देखना। जहाँ तुम पीछे फिरकर देखोगे, मैं वहीं स्थिर हो जाऊँगा।’

भक्‍त ने कुछ जोर देकर कहा- ‘तब मुझे कैसे पता चलेगा कि आप मेरे पीछे आ ही रहे हैं? कहीं बीच में से ही लौट पड़े तब ?’

भगवान ने हंसकर कहा-‘तुम्‍हें पीछे से बजती हुई मेरे पैरों की पैंजनी की आवाज सुनायी देती रहेगी, उसी से तुम समझ लेना कि मैं तुम्‍हारे साथ आ रहा हूँ।’

भक्त ने इस बात को स्‍वीकार किया और वह आगे-आगे चलने लगा, पीछे से उसे भगवान के पैरों से बजते हुए नुपूरों की ध्‍वनि सुनायी देती थी, इसी से उसे पता रहता था कि भगवान मेरे पीछे-पीछे आ रहे हैं। रास्‍ते में विविध प्रकार के भोजन बनाकर भगवान का भोग लगाता हुआ वह विद्यानगर के समीप आ गया। नगर के समीप आने पर उस से रहा न गया। उसने सोचा- ‘एक बार देख तो लूँ भगवान मेरे पीछे हैं या नहीं। यह सोचकर उसने पीछे को दृष्टि फिरायी। वहीं हंसकर भगवान खड़े हो गये और प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए बोले- ‘अब मैं यही रहूँगा। यहीं से तुम्‍हारी साक्षी दूँगा। तुम उन लोगों को यहीं बुला लाओ।’

भगवान की आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण कुमार गांव में आया और लोगों से उसने श्री गोपाल भगवान के आने का वृतान्‍त कह सुनाया सुनते ही गांव के सभी नर-नारी, बालक-वृद्ध तथा युवा पुरुष भगवान के दर्शन के लिये दौड़े आये। सभी भुमि में लोटकर भगवान के सामने साष्‍टांग प्रणाम करने लगे। कोई मेवा लाकर भगवान पर चढ़ाता, कोई फल-फूलों से ही श्रीगोपाल भगवान की पूजा करता। इस प्रकार भगवान के सामने विविध प्रकार की भेंटें चढ़ने लगीं और हर समय उनकी पूजा होने लगी। फिर भगवान की साक्षी लेने की किसी की हिम्‍मत ही नहीं पड़ी। ब्राह्मण के लड़के ने बड़ी ही प्रसन्‍नता के साथ अपनी बहिन का विवाह उस युवक के साथ कर दिया और वह वृद्ध ब्राह्मण तथा युवक दोनों मिलकर सदा भगवान की सेवा-पूजा में ही रहने लगे। दूर-दूर तक भगवान के आने का समाचार फैल गया। नित्‍यप्रति हजारों आदमी गोपालभगवान के दर्शन के लिये आने लगे। जब यह समाचार उस देश के राजा को विदित हुआ तो उसने एक बड़ा मन्दिर गोपालभगवान के लिये बनवा दिया और तभी से वे साक्षिगोपाल के नाम से प्रसि‍द्ध हुए।

नित्‍यानन्‍द जी भक्‍तों सहित बैठे हुए महाप्रभु ने इस कथा को कह सुन रहे थे। प्रभु एकटक होकर इस परम पावन उपाख्‍यान को सुन रहे थे।

नित्‍यानन्‍द जी के चुप हो जाने पर प्रभु ने पूछा- ‘फिर विद्यानगर से साक्षिगोपाल यहाँ क्‍यों पधारे ? इस बात को हमें और सुनाओ।’

नित्‍यानन्‍दजी क्षणभर चुप रहने के अनन्‍तर कहने लगे- ‘उस समय उड़ीसा-देश में परम भागवत महाराज पुरुषोतम देव राज्‍य करते थे। उन्‍होंने विद्यानगर के राजा की राजकुमारी के साथ विवाह करने की इच्‍छा प्रकट की। इस पर विद्यानगर के राजा ने अपनी कनया महाराज पुरुषोतमदेव को नहीं दी और अस्‍वीकार करते हुए कहा- ‘मैं अपनी कन्‍या को मन्दिर के झाडूदार के लिये नहीं दूंगा।’

इस पर क्रुद्ध होकर महाराज पुरुषोतमदेव ने विद्या नगर चढ़ाई की और भगवान जगन्‍नाथ जी की कृपा से विद्यानगर को जीतकर उसे अपने राज्‍य में मिला लिया और राज कन्‍या का विवाह अपने साथ कर लिया। तभी महाराज ने साक्षिगोपाल से पुरी पधारने के लिये प्रार्थना की। महाराज के भक्तिभाव से प्रसन्‍न होकर साक्षिगोपाल-भगवान पुरी पधारे और कुछ कालतक जगन्‍नाथ जी के मन्दिर में ही माणिक्‍य-सिंहासन पर विराजे। जगन्‍नाथ जी पुराने थे, ये बेचारे नेय ही आये थे, इसलिये दोनों में कुछ प्रेम-कलह उत्‍पन्‍न हो गया। महाराज पुरुषोतमदेव ने दोनों को एक स्‍थान पर रखना उचित न समझकर अन्‍त में पुरी से तीन कोस की दूरी पर ‘सत्‍यवादी’ नामक ग्राम के समीप साक्षिगोपाल भगवान का मन्दिर बनवा दिया। तब से यहीं विराजमान हैं।

इनकी महिमा बड़ी अपार है, एक बार उड़ीसा-देश की महारानी इनके दर्शन के लिये पधारीं। इनकी मनमोहिनी बाँकी-झाँकी करके महारानी मुग्‍ध हो गयीं। उनकी इच्‍छा हुई कि ‘यदि भगवान की नाक छिदी हुई होती तो मैं अपने नाक का बहूमुल्‍य मोती भगवान को पहनाती।’

दूसरे ही दिन महारानी को स्‍वप्‍न हुआ मानो साक्षिगोपाल भगवान सामने खड़े हुए कह रहे हैं- ‘महारानी ! हम तुम्‍हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे। पुजारियों को पता नहीं कि हमारी छिदी हुई है। कल तुम ध्‍यानपूर्वक दिखवाना, हमारी नाक में छिद्र हैं। तुम सहर्ष अपना मोती पहनाकर अपनी इच्‍छा पूर्ण कर सकती हो।’ प्रात:काल उठते ही महारानी ने यह वृतान्‍त महाराज से कहा। महाराज ने उसी समय पुजारियों से भगवान की नाक दिखवायी। सचमुच उसमें छिद्र था। तब महारानी ने बड़े ही प्रेम से अपना बहूमुल्‍य मोती भगवान की नाक में पहनाया। इतना कहकर नित्‍यानन्‍द जी चुप हो गये। इस कथा को सुनकर प्रभु प्रेम में गदगद हो गये और साक्षिगोपाल की मनमोहिनी मूर्ति का ध्‍यान करते-करते ही वह रात्रि प्रभु ने वहीं बितायी।

क्रमशः अगला पोस्ट [93]
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[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



।। Srihari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radheshyam [Jap] Hare Krishna Hare Ram Sri Sakshigopal

walking on foot: idol-like. For the Brahman who is the god of a hundred days. This wonderful brahmin went to the country I bow to that cowherd of witnesses.

Waking up early in the morning, the Lord retired from his daily work and after seeing the Mangal-Aarti of Lord Shri Gopinath ji, he left for the future along with the devotees. On the way they found the Vaitarani river. Prabhu reached Rajpur after bathing in it. There is the place of Lord Varah. After visiting Lord Varah, reached Nabhigaya via Yazpur and taking bath in Shivling, Virjadarshan and Brahmakund. Having bathed there at Dashashwamedh Ghat, reached Kantak Nagar and saw Lord Sakshi Gopal. Krishna-kirtan continued for a long time in the temple of Sakshigopal ji. Many men and women of the city gathered to see the singing and dancing of the Lord. Seeing the Lord dancing, the men and women of the village also started dancing and jumping like puppets in ecstasy. Sankirtan-joy continued for a long time. Then the Lord along with His devotees rested in the temple of Sakshigopal.

While narrating with the devotees at night, the Lord asked Nityanand ji – ‘Shripad! You have visited almost all the main pilgrimage centers of India. There is probably no famous pilgrimage left with you, where you have not visited and bathed?’

Somewhat slowly Nityanand ji said – ‘ Yes, Lord! Twelve years were spent in pilgrimages like this.’ The Lord asked – ‘Have you come here before?’

The Lord said- ‘One must go to the pilgrimage and listen to the greatness of that pilgrimage. Without listening to the greatness, the fruit of the pilgrimage is only half. You tell me the greatness of Sakshigopal. Why was he named Sakshigopal? To whom did he witness?’ Hearing such an order of the Lord, Nityanand ji slowly started saying – ‘I have not heard the story of Lord Sakshigopal in any of the Puranas, because it is not a very ancient pilgrimage. In just a few days, Lord Sakshigopal has come here from Vidyanagar. The way I have heard the story of Sakshi Gopal from the mouth of the people, I narrate it.

On the banks of river Godavari in Tailang-country was the ancient capital of Kot-country named ‘Vidyanagar’. The city was very prosperous and was the center of commerce due to its proximity to the sea. In the same city lived a prosperous noble Brahmin. Brahmin was a devotee of God. He used to have devotion in cow, brahmin and deities. There was no shortage of food and drink in the house. The boys had grown up, so they used to do all the household chores. This old Brahmin used to do bhajan with a garland.

There was a son, daughter-in-law, wife and an unmarried younger daughter in the house. The Brahmin wished to go on a pilgrimage. A poor Brahmin’s son lived near that old Brahmin. His parents left him when he was young and passed away. He used to make his living by working hard. But he had complete devotion towards God in his heart. He always used to worship God in solitude. That’s why God’s grace was upon him. The thickest recognition of God’s grace is that the one who has faith in Brahmins, pilgrimages, Bhagwat-characters, Devasthans, Bhagwat idols, cows, holy trees like Tulsi-Peepal etc. It should be understood that he has become a vessel of God’s grace. That Brahmin Kumar had affection for all of them, that’s why that old Brahmin used to have affection on this boy.

One day that old Brahmin said to this young man – ‘Brother! If you wish, let’s go on a pilgrimage. Let me be free from the entanglement of the household for a few days.’

Expressing happiness, the young man said- ‘What can be better than this? Only a fortunate man can get the opportunity of pilgrimage. I am ready to go with you.’

The old Brahmin was very happy to find a companion worthy of his mind and left home for a pilgrimage taking the young man with him. Both Gaya, Kashi, Prayag, Ayodhya, Naimisharanya, Brahmavart etc. visited the pilgrimage places and reached Vrajmandal. There he traveled to twelve forests and groves like Bhadravan, Vilvavan, Lohavan, Bhandivan, Mahavan, Madhuvan, Talvan, Bahulavan, Kamyavan, Khadirvan and Sri Vrindavan.

After visiting all the pilgrimages of Vraj, Nandgaon, Barsana, Govardhan etc., these people came to Vrindavan and rested for a few days. That young Brahmin Kumar did all kinds of service and care to that old Brahmin very selflessly throughout the journey. That old Brahmin was very much satisfied with the service and care of this young man. Expressing his gratitude in Gopal ji’s temple, he said to that Brahmin Kumar – ‘Brother! You have done such a wonderful service to us that even a son cannot do such service to his father. I am being crushed by the burden of this gratitude, I am thinking, what can I do you in return?’

‘ Brahmin Kumar said- ‘ You are my worshiper like that, then old, devotee of God, neighbor, equal to my father and nowadays a pilgrim. Serving you is my religion in every way. What work have I done in this that deserves praise. I have only followed my human duty. I did not serve you out of any desire, so what is the need to repay it?’

The old Brahmin said – ‘ You do not want revenge, but I also have some duty, I will not be at peace until I can reciprocate this great favor of yours. I wish to marry my daughter to you?’

Expressing surprise, the young man said- ‘What kind of things are you talking about, where are you such a very elite, wealthy, householder with a big family, where am I, a parentless, uncouth, orphan Brahmin Kumar! What kind of relationship do you have with me? Relationships always happen between men of similar virtues. The old man said – ‘It is the duty of the father to find a suitable husband for the girl. Do not pay special attention to his wealth, family and glory. Where else would one find a groom of modesty like yours for his daughter? That’s why I will give you my daughter. Will you accept my request?

That young man said- ‘You will agree anyway, but when did your wife, your son and caste-family members start accepting this relationship? Will they be furious on hearing this?’

The old Brahmin said with firmness – ‘Let everyone be enraged. What is anyone’s share in this? The girl is mine, I will give it to whomever I want. What can one say in this? You accept. The young man said – ‘I have no objection in accepting you, but you will go home and forget everything here, you will not be able to do anything there in front of the request of the wife, son and family members.’

The old Brahmin got excited and said – ‘ I testify to God Gopal that I will definitely marry my daughter with you. Enough, now will you believe?’ Brahmin Kumar said softly – ‘It is a good thing’, everything will be known by walking there!’ In this way, after promising to give a daughter to Gopal, the old Brahmin returned to Vidyanagar with the young man after a few days.

Coming there in a fit of rage, the Brahmin promised to give a daughter, but he did not have the courage to say this in front of his wife, son etc. One day he revealed this to his son in private. On hearing this, there was a conflict in the whole house. The boy lost his temper, the woman got ready to consume a different poison. The family members together started threatening to separate him from the caste.

The old Brahmin became like a cuckold. He could not understand what to do in such a situation. Now he was afraid to even make eye contact with that young man.

The young man waited for some time for the brahmin himself to act according to his words, but when many days passed, the young man thought – ‘It is possible that old Baba has forgotten his words, so remember him once. Should be given. Then it is up to them to act or not to act accordingly?

Thinking of this, the young man went to the old Brahmin’s place. The old Brahmin’s face fell on seeing that young man. He said with a dry mouth – ‘ Come brother! Today it was seen after many days.

After talking here and there for a while, that young man said – ‘ Baba! You had promised to give me your daughter in front of Gopal ji in Vrindavan, remember?’ As long as the old Brahmin could not answer this, his son ran on him with a stick and said – ‘Why? Lowly ! Such a great courage of yours? Want to be my brother-in-law? Get out of my house right now, otherwise I will thrash you in such a way that your skull will crack open.’

Hearing this, the young man got very angry. He was not sad about not getting married, he started burning because of his humiliation. He started feeling very sad about his situation, he started thinking – If my parents were there today and I had four paise with me, then how dare he, who could insult me ​​in this way? Well, no matter what happens, I will definitely take revenge for this insult. Either I will marry his sister or I will not be alive. Thinking of this, he gathered the punches.

When the Panchas gathered, he told the whole story from beginning to end and in the end said – ‘I don’t want anything else. Should this old baba tell his religion in front of the Panchs that he did not promise to give me a daughter in Gopal ji’s temple while giving his own witness?’

The Brahmin was already cured by his son by teaching him. He had made his father understand that you should not tell the truth or lie. Just say this – ‘ I don’t know anything about that time. There is no lie in this either. You tell me about which day? Due to the son’s affection along with sorrow, the father accepted this saying in front of the judges. On being asked by the Panchas, the Brahmin said softly – ‘I do not remember exactly, it was a matter of when.’ That’s all, his son said in the middle – this uncouth Brahmin youth is a liar. There was no other man with my father, he was the only one, he fed Datura to my father to steal money and took all the money. Now he makes such things. Well, can my father ever promise to give his daughter to such a noble, homeless, pauper?’

The punches said to that young man – ‘Why brother! What is it saying? When the old man promised to give you a daughter, there was some other man there, can you testify?’

The young man said with seriousness- ‘He had said this in front of Gopal ji and I have no other witness except Gopal ji.’

A young man heard the punch and said in a voice of laughter – ‘ So can you bring Gopal here to testify?

In a fit of rage, the young man said loudly – ‘Yes, I can bring it.’

On hearing this, everyone was speechless and expressing surprise, all of them said in one voice – Yes, yes, if you bring Gopal ji as a witness and Gopal ji gives your witness in front of all the Panchs. We can forcefully get the girl married to you.’

Expressing happiness with this, the old Brahmin said – ‘ Yes, that is right. If he brings Gopal ji as a witness, I will definitely marry my daughter to him.’ Will come for But when could that impudent son of his believe that even a stone idol could ever come to testify? He thought, it turned out to be a very good solution on its own. Neither the stone statue will come here to witness nor will I have to marry my sister to it. Thinking of this, he quickly spoke – ‘I accept this thing too, if Gopal ji comes and gives a witness to this in front of everyone, then I will definitely make him my brother-in-law.’

The faithful young man got the Panchs to sign on this and also took the signatures of the old Brahmin along with his son that if Gopal comes to testify, we will definitely get him married. After getting everyone in writing, he reached Vrindavan directly and went there and with great humility prayed to Gopal ji in Katarvani. Hearing the cry of the devotee, God appeared and said to him- ‘You come, I will appear there and testify for you.’ The young man said- ‘God! It will not work like this. Don’t know in what form you may appear and whether those people believe in him or not. That’s why you walk with me in the form of this statue.

God laughed and said – ‘ Does the stone statue also move somewhere? This is absolutely impossible.

The young devotee said – ‘ Lord! May anything be impossible for you!’ You will have to walk with me in this way.’

God is subordinate to the devotees, he accepted it and said – ‘You go ahead, I will follow you. Don’t look back at me. Wherever you look back, I will settle there.’

The devotee said with some emphasis – ‘ Then how do I know that you are coming after me? If you return somewhere in the middle then?

God laughed and said – ‘You will keep hearing the sound of my feet ringing from behind, from that you can understand that I am coming with you.’

The devotee accepted this and started walking forward, from behind he used to hear the sound of the nupuras ringing from the feet of the Lord, that is why he knew that the Lord was following him. On the way, after preparing various types of food and offering food to God, he came near Vidyanagar. When he came close to the city, he could not resist. He thought- ‘Let me see once whether God is behind me or not. Thinking of this, he looked back. God stood there laughing and expressing happiness said – ‘Now I will stay here. From here I will give your witness. You call those people here.’

After getting God’s permission, that Brahmin Kumar came to the village and told the people the story of Shri Gopal Bhagwan’s arrival. As soon as they heard, all the men and women, children, old and young men of the village came running to see God. Everyone returned to the ground and prostrated before the Lord. Some used to bring fruits and offer them to God, some used to worship Lord Shri Gopal only with fruits and flowers. Thus offerings of various kinds began to be made before the Lord and he was worshiped at all times. Then no one had the courage to take the witness of God. The Brahmin’s son very happily married his sister to that young man and both the old Brahmin and the young man together always remained in the service and worship of God. The news of the Lord’s arrival spread far and wide. Everyday thousands of people started coming to see Lord Gopal. When this news came to the king of that country, he got a big temple built for Lord Gopal and since then he became famous as Sakshigopal.

Nityanand ji was listening to Mahaprabhu telling this story while sitting with the devotees. The Lord was attentively listening to this His Holiness’s anecdote.

When Nityanand ji became silent, the Lord asked – ‘ Then why did Sakshigopal come here from Vidyanagar? Tell us more about this.’

After remaining silent for a moment, Nityanandji started saying – ‘At that time, Param Bhagwat Maharaj Purushottam Dev used to rule in Orissa-country. He expressed his desire to marry the princess of the king of Vidyanagara. On this, the king of Vidyanagar did not give his daughter to Maharaj Purushotamdev and while rejecting said- ‘I will not give my daughter for the sweeper of the temple.’

Enraged at this, Maharaj Purushottamdev attacked Vidyanagar and by the grace of Lord Jagannath conquered Vidyanagar and merged it with his kingdom and married the princess with him. That’s why Maharaj prayed to Sakshigopal to come to Puri. Pleased with Maharaj’s devotion, Sakshigopal-Lord came to Puri and sat on the Manikya-throne in the temple of Jagannath ji for some time. Jagannath ji was old, this poor man had just come, that’s why some love-discord arose in both of them. Maharaj Purushotamdev did not think it appropriate to keep both at one place, and at last, at a distance of three kos from Puri, near the village named ‘Satyavadi’, the temple of Lord Sakshigopal was built. He has been sitting here since then.

His glory is immense, once the queen of Odisha came to visit him. The queen was mesmerized by seeing his charming balance. She wished that ‘If God’s nose was pierced, I would wear the precious pearl of my nose to God.’

The very next day, the queen had a dream as if God Sakshigopal was standing in front of her and saying – ‘Queen! We will fulfill your wish. The priests do not know that we are pierced. Tomorrow you show me carefully, we have holes in our nose. You can happily fulfill your wish by wearing your pearl.’ The queen told this story to Maharaj as soon as she woke up in the morning. At the same time Maharaj showed the nose of God to the priests. It really had a hole in it. Then the queen very lovingly put her priceless pearl on the Lord’s nose. Saying this, Nityanand ji became silent. Hearing this story, the Lord fell deeply in love and spent the night there meditating on the charming idol of Sakshi Gopal.

respectively next post [93] , [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari, published by Geetapress, Gorakhpur]

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