हरि चरणों में आश्रय

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एक गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु बाबा छोटी से कुटिया बना कर रहते थे। वह ठाकुर जी के परम भक्त थे।
उनका स्वाभाव बहुत ही शांत और सरल था। उन्हें दिन-रात बस एक ही कार्य था, ठाकुर जी के ध्यान-भजन में खोए रहना। उन्हें ना खाने की चिंता ना पीने की !

चिंता थी तो बस एक कहीं ठाकुर जी की सेवा कमी ना रह जाए। भोर से पूर्व ही जाग जाते, स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होते और लग जाते ठाकुर जी की सेवा में। उनको स्नान कराते, धुले वस्त्र पहनाते, चंदन से तिलक करते, पुष्पों की माला पहनाते फिर उनका पूजन करते !

ठाकुर जी का भजन आदि करते, फिर जंगल से लाये गए फलों से ठाकुर जी को भोग लगाते। वह बिल्कुल वैरागी थे, किसी से विशेष कुछ लेना देना नहीं था उनको, वह फक्कड़ थे किन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे,यदि कोई कुछ दे गया तो स्वीकार कर लिया नहीं तो राधे-राधे !

फक्कड़ होने पर भी एक विशेष गुण उनमे समाहित था, उनके द्वार पर यदि कोई भूखा व्यक्ति आ जाए तो वह उसको बिना कुछ खिलाए नहीं जाने देते थे। कुछ नहीं होता था तो जंगल से फल लाकर ही दे देते थे किन्तु कभी उन्होने किसी को अपने द्वार से भूखा नहीं जाने दिया !

यही उनकी स्तिथी ठाकुर जी के प्रति भी थी। उनको इस बात की सदैव चिंता सताती रहती थी कि कही ठाकुर जी किसी दिन भूखे ना रह जाएं। उनके पास कुछ होता तो था नहीं कही कोई कुछ दे जाता था तो भोजन बना लेते थे, पर वह अपने पास थोड़ा गुड अवश्य रखा करते थे !

यदि भोजन बनाते थे तो पहले भोजन ठाकुर जी को अर्पित करते फिर स्वयं ग्रहण करते, किन्तु यदि कभी भोजन नहीं होता था तो गुड से ही काम चला लेते थे।
थोड़ा गुड ठाकुर जी को अर्पित करते और फिर थोड़ा-थोडा़ खुद खा कर पानी पी लेते थे !

एक बार वर्षा ऋतु में कई दिन तक लगातार वर्षा होती रही, जंगल में हर और पानी ही पानी भर गया, जंगल से फल ला पान संभव नहीं रहा, उनके पास रखा गुड़ भी समाप्त होने वाला था। भारी बारिश को होते देख अब बाबा जी को बड़ी चिंता होने लगी !

वह सोंचने लगे कि यदि वर्षा इसी प्रकार होती रही तो में जंगल से फल कैसे ला पाउँगा, और ठाकुर जी को भोग कैसे लगाऊंगा, गुड भी समाप्त होने वाला है, ठाकुर जी तो भूखे ही रह जायेंगे, और यदि द्वार पर कोई भूखा व्यक्ति आ गया तो उसको क्या खिलाऐंगे हम !

यह सोंचकर वह गहरी चिंता में डूब गए, उन्होंने एक निश्चय किया कि अब से में कुछ नहीं खाऊंगा, जो भी मेरे पास है वह ठाकुर जी और आने वालो के लिए रख लेता हूँ। ऐसा विचार करके उन्होंने कुछ भी खाना बंद कर दिया और मात्र जल पीकर ही अपना गुजरा करने लगे !

किन्तु वह ठाकुर जी को नियमित रूप से भोग लगाते रहे। बाबा जी की भक्ति देखकर ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए, किन्तु उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का विचार भी किया। दो दिन बाद ठाकुर जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उस बाबा की कुटिया में उस समय गये जब बहुत तेज वर्षा हो रही थी !

वृद्ध ब्राह्मण को कुटिया पर आया देख साधु बाबा बहुत प्रसन्न हुए और उनको प्रेम पूर्वक कुटिया के अंदर ले गए।
उनको प्रेम से बैठाया कुशल क्षेम पूँछी, तब वह ब्राह्मण बड़ी ही दीन वाणी में बोले कि मैं तीन दिन से भूखा हूँ, भूख के कारण मेरा शरीर बहुत कमजोर हो गया है !

यदि कुछ खाने का प्रबन्ध हो जाये तो बहुत कृपा होगी।
तब साधु बाबा ने ठाकुर जी को मन ही मन धन्यवाद दिया कि उनकी प्रेरणा से ही वह कुछ गुड़ बचा पाने में सफल हुए। वह बाबा स्वयं भी तीन दिन से भूखे थे, किन्तु उन्होंने यथा संभव गुड और जल उन ब्राह्मण देव को अर्पित किया और कहा कि !

श्रीमान जी इस समय तो इस कंगले के पास मात्र यही साधन उपलब्ध है, कृपया आप इसको ग्रहण करें। बाबा की निष्ठा देख ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु उन्होंने अभी और परीक्षा लेने की ठानी, वह बोले इससे मेरी भूख भला कैसे मिटेगी, यदि कुछ फल आदि का प्रबंध हो जाये तो मेरी भूख कुछ शांत होगी !

अब बाबा जी बहुत चिंतित हुए, उनके द्वार से कोई भूखा लोटे यह उनको स्वीकार नही था, वह स्वयं वृद्ध थे, तीन दिन से भूखे थे, शरीर भूख निढाल था, किन्तु सामने विकट समस्या थी। उन्होंने उन ब्राह्मण से कहा ठीक है श्रीमान जी आप थोड़ा विश्राम कीजिये मैं फलों का प्रबन्ध करता हूँ !

बाबा जी ने ठाकुर जी को प्रणाम किया और चल पड़े भीषण वर्षा में जंगल की और फल लाने। जंगल में भरा पानी था, पानी में अनेको विषैले जीव इधर-उधर बहते जा रहे थे, किन्तु किसी भी बात की चिन्ता किये बिना साधु बाबा, कृष्णा कृष्णा का जाप करते चलते रहे !

उनको तो मात्र एक ही चिंता थी की द्वार पर आए ब्राह्मण देव भूखे ना लोट जाएं। जंगल में पहुंच कर उन्होंने बहुत कठिनाई से फल एकत्र किये और वापस कुटिया की और चल दिए। जब वह कुटिया पर पहुंचे तो देखा कि ब्राह्मण देव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे !

बाबा जी ने वर्षा और भरे हुए पानी के कारण हुए विलम्ब के कारण उनसे क्षमा मांगी और फल उनको अर्पित किए।
वह वृद्ध ब्राह्मण बोले बाबा जी आप भी तो ग्रहण कीजिये किन्तु वह बाबा ब्राह्मण देव से बोले क्षमा करें श्रीमान जी, मैं अपने ठाकुर जी को अर्पित किए बिना कुछ भी ग्रहण नहीं करता !

यह फल में आपके लिए लाया हूँ मेने इनका भोग ठाकुर जी को नही लगाया है। तब वह ब्राह्मण बोला ऐसा क्यों कह रह हैं आप ठाकुर जी को तो आपने अभी ही फल अर्पित किये हैं। बाबा बोले अरे ब्राह्मण देव क्यों परिहास कर रहे हैं, मेने कब अर्पित किये ठाकुर जी को फल !

तब ब्राह्मण देव बोले अरे यदि मुझ पर विश्वाश नहीं तो जा कर देख लो अपने ठाकुर जी को, वह तो तुम्हारे द्वारा दिए फलों को प्रेम पूर्वक खा रहे हैं। ब्राह्मण देव की बात सुनकर बाबा जी ने जा कर देखा तो वह सभी फल ठाकुर जी के सम्मुख रखे थे जो उन्होंने अभी-अभी ब्राह्मण देव को अर्पित किये थे !

वह तुरंत बाहर आए और आकर ब्राह्मण देव के पैरों में पड़ गए और बोले कृपया बताएं आप कोन हैं। यह सुन कर श्री हरी वहां प्रत्यक्ष प्रकट हो गए, ठाकुर जी को देख वह वृद्ध बाबा अपनी सुध-बुध खो बैठे बस ठाकुर जी के चरणों से ऐसे लिपटे मानो प्रेम का झरना बह निकला हो !

आँखों से अश्रुओं की धारा ऐसे बहे जा रही थी जैसे कुटिया में ही वर्षा होने लगी हो। ठाकुर जी ने उनको प्रेम पूर्वक उठाया और बोले तुम मेरे सच्चे भक्त हो, मैं तुम्हारी भक्ति तुम्हारी निष्ठा और प्रेम से अभिभूत हूँ, मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा, कहो क्या चाहते हो !

किन्तु साधु बाबा की तो मानो वाणी ही मारी गई हो, बस अश्रु ही बहे जा रहे थे, और वाणी मौन थी, बहुत कठिनता से स्वयं को संयत करके वे बोले…हे नाथ जिसने आपको पा लिया हो उसको भला और क्या चाहिए। अब तो आप बस मुझे इन चरणों में आश्रय दे दीजिये !

ऐसा कह कर वह पुनः ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़े। तब ठाकुर जी बोले मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, मांगो क्या चाहते हो, कहो तो तुमको मुक्ति प्रदान करता हूँ , यह सुनते ही बाबा विचलित हो उठे तब बाबा बोले हे श्री हरी, हे नाथ, मुझको यूं ना छलिये, मैं मुक्ति नहीं चाहता !

यदि आप देना ही चाहते है, तो जन्मों-जन्मों तक इन चरणों का आश्रय दीजिए, हे नाथ बस यही वरदान दीजिए कि में बार-बार इस धरती पर जन्म लूँ और हर जन्म में आपके श्री चरणों के ध्यान में लगा रहूँ, मैं हर जन्म में इसी प्रकार आपको प्राप्त करता रहूँ !

तब श्री हरी बोले तथास्तु, भगवान् के ऐसा कहते ही साधु बाबा के प्राण श्री हरी में विलीन हो गए। जिसको मुक्ति ही मिल जाये तो और उसे क्या चाहिए। मुक्ति ही तो सबका लक्ष्य होता है। परन्तु इस बाबा ने मुक्ति की बजाय भगवान की सेवा का वरदान माँगा !

On the outskirts of a village, an old sadhu Baba lived by making a small hut. He was a great devotee of Thakur ji.
His nature was very calm and simple. He had only one task day and night, to be lost in the meditation and hymns of Thakur ji. Don’t worry about not eating them or drinking them!

If there was concern then there should be only one lack of service of Thakur ji. Waking up early in the morning, retiring from bath and daily work, and engaged in the service of Thakur ji. Bathing them, wearing washed clothes, tilak with sandalwood, garlanding them with flowers and then worshiping them.

He used to worship Thakur ji, etc., then offered food to Thakur ji with fruits brought from the forest. He was absolutely a recluse, he had nothing to do with anyone, he was a fool but did not spread his hands in front of anyone, if someone gave something, he accepted it, otherwise Radhe-Radhe!

Even though he was a fool, he had a special quality, if a hungry person came to his door, he would not let him go without feeding him. If nothing happened, he would have brought fruits from the forest and gave it, but he never let anyone go hungry from his door.

The same was his position for Thakur ji as well. He was always worried about the fact that Thakur ji might not go hungry someday. If he had something, he used to make food if someone had given something, but he used to keep some jaggery with him.

If he used to prepare food, he would first offer food to Thakur ji and then take it himself, but if food was never available, he used to do the work with jaggery.
He used to offer some gud to Thakur ji and then eat little by little himself and drink water.

Once in the rainy season, it rained continuously for many days, every other water in the forest was filled with water, it was not possible to bring fruits from the forest, the jaggery kept with them was also about to end. Seeing the heavy rain, now Baba ji started getting worried.

He started thinking that if the rain continues like this, how will I be able to bring fruits from the forest, and how will I offer food to Thakur ji, the jaggery is also going to end, Thakur ji will remain hungry, and if a hungry person comes to the door. If we go, what will we feed him?

Thinking this, he was deeply worried, he made a decision that from now on I will not eat anything, whatever I have, I will keep it for Thakur ji and others to come. Thinking like this, he stopped eating anything and started making his living by drinking only water.

But he continued to offer bhog to Thakur ji regularly. Thakur ji was very pleased to see Baba ji’s devotion, but he also thought of taking his test. Two days later, Thakur ji assumed the form of an old Brahmin and went to that Baba’s hut when it was raining heavily.

Sadhu Baba was very pleased to see the old Brahmin coming to the hut and lovingly took him inside the hut.
He was seated with love and asked for well-being, then that Brahmin said in a very humble voice that I am hungry for three days, my body has become very weak due to hunger!

If arrangements are made for some food, it will be very graceful.
Then Sadhu Baba thanked Thakur ji in his heart that due to his inspiration he was able to save some jaggery. That Baba himself was hungry for three days, but he offered jaggery and water as much as possible to those Brahmin gods and said that!

Sir, at this time only this means is available with this pauper, please accept it. Thakur ji was very happy to see Baba’s loyalty, but he decided to take more tests now, he said, how will my hunger be satisfied by this, if some fruits etc.

Now Baba ji was very worried, it was not acceptable to him that any hungry lot came from his door, he himself was old, was hungry for three days, the body was hungry, but there was a serious problem in front. He said to those brahmins, okay sir, take some rest, I will arrange for the fruits!

Baba ji bowed down to Thakur ji and went to the forest in the heavy rain to bring more fruits. The forest was full of water, many poisonous creatures were flowing here and there in the water, but without worrying about anything, the sadhu Baba kept on chanting Krishna Krishna.

He had only one concern that the Brahmin gods who came to the door should not go hungry. After reaching the forest, he collected fruits with great difficulty and went back to the hut. When he reached the hut, he saw that the Brahmin gods were waiting for him.

Baba ji apologized to him for the delay caused by rain and filled water and offered the fruits to him.
That old brahmin said, Baba ji, you should also accept it, but that baba brahmin said to God, sorry sir, I do not accept anything without offering it to my Thakur ji!

I have brought this fruit for you, I have not offered them to Thakur ji. Then the Brahmin said why are you saying this, you have just offered fruits to Thakur ji. Baba said, oh brahmin, why are the gods laughing, when did I offer fruits to Thakur ji!

Then the brahmin Dev said, oh, if you do not have faith in me, then go and see your Thakur ji, he is lovingly eating the fruits given by you. After hearing the words of Brahmin Dev, Baba Ji went and saw that all those fruits were placed in front of Thakur Ji, which he had just offered to Brahmin Dev.

He immediately came out and fell at the feet of Brahmin Dev and said please tell who are you. Hearing this, Shri Hari appeared there directly, seeing Thakur ji, that old Baba lost his mind and just wrapped himself around Thakur ji’s feet as if a spring of love had flowed out!

Tears were flowing from her eyes as if it was raining in the hut itself. Thakur ji picked them up with love and said you are my true devotee, I am overwhelmed by your devotion and love, I will fulfill your every wish, say what you want!

But Sadhu Baba’s speech was as if only tears were being shed, and the voice was silent, restraining himself with great difficulty, he said… Oh Nath, who has found you, what else does he need. Now you just give me shelter in these feet!

Saying this he again fell at the feet of Thakur ji. Then Thakur ji said my darshan does not go in vain, ask what you want, if you say, I will give you liberation, Baba got distracted on hearing this, then Baba said, O Shri Hari, O Nath, do not deceive me like this, I do not want salvation!

Then Shri Hari said, Friend, as soon as the Lord said this, the soul of Sadhu Baba merged with Shri Hari. Whoever gets salvation, what else does he need? Liberation is everyone’s goal. But instead of salvation, this Baba asked for the boon of serving God.

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