भक्त कोकिल भाग – 7

गतांक से आगे-

मानसी ध्यान सिद्ध था कोकिल साँई को …ये स्वयं मानसिक ध्यान में लीन रहते और अपने साधकों को भी यही सिखाते ।

बाल्यावस्था से ही कोकिल साँई मानसिक सेवा में ही अपने आपको डुबो देते थे …..पर उनके मानसिक ध्यान में वाल्मीकि रामायण की मुख्य भूमिका रही ….बाल मन में “श्रीराघवेंद्र सरकार का सीता जी को त्याग देना” ये इनको विचलित कर गया था …तभी से ये ऋषि वाल्मीकि आश्रम में ही सिया जू को देखते थे , इनको कोई ये प्रश्न भी कर देता कि राम ने सीता को क्यों त्यागा ? या इससे सम्बन्धित कोई प्रश्न तो कोकिल जी का वो कोमल हृदय रो उठता था ।

तर्क थे , पर उन तर्कों से कोकिल जी का कोई समाधान नही होता था …..चौबीस घण्टे ये इसी चेष्टा में रहते कि “मेरी सिया सुकुमारी का दुःख कैसे कम करूँ मैं”। क्या करूँ ऐसा जिससे वैदेही का कष्ट कम हो ….इसके लिये इन्होंने सहचरी भाव को धारण किया और दोनों के बीच मध्यस्थता का काम करना स्वीकार किया । ये कभी अयोध्या जातीं और अवधनाथ से सीता जी की स्थिति बतातीं …..फिर वो ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में आतीं और मिथिलेश किशोरी को श्रीराम की बात बतातीं …ये कोकिल सहचरी , इनका ये भाव देह था , इसी भाव देह से ये सिया राम जू के निकट सदैव रहतीं थीं ।

पर अब तो असह्य हो गया था कोकिल जी को सिया जू का दुःख ….इसलिये वो अयोध्या के लिये ही अपने साधकों के साथ चल दिये थे ।

श्रीवृन्दावन में कोकिल जी की जो कुटिया है “सुख निवास” वहाँ के एक सिन्धी भक्त हमें ये सब सुना रहे थे । गौरांगी और हम ,बड़े प्रेम से सुन रहे थे कोकिल साँई की अद्भुत भक्ति की रीत को।

अब आगे –


अयोध्या पहुँच कर कोकिल जी ने उस भूमि को प्रणाम किया ….पर वो भूमि उन्हें उदास लगी ….चारों ओर घनी उदासी ….उन्होंने अपने साधकों से कहा भी कि मेरी सिया जू यहाँ नही हैं इसलिये देखो लोक वन्दनीय अवध नगरी भी कैसी उदास है ।

कोकिल साँई कनकभवन गये ….वहाँ पर भी उन्होंने इधर उधर देखा पर हाथ नही जोड़े ….वो दूसरे ही भाव जगत में थे …..भाव में पूरी तरह से डूबे हुये थे ……”यहाँ मेरी सिया जू नही हैं इसलिये मैं सिर नही झुकाऊँगा” स्पष्ट कह रहे थे और धीरे नही ज़ोर से ।

एक दर्शनार्थी ने कहा भी …देखो , कनक भवन में दोनों सिया राम ही विराजें हैं ।

कोकिल साँई का उत्तर था …वो सुवर्ण की मूर्ति है मेरी सिया जू नही हैं , वो तो बहुत दुःख पाकर ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रह रही हैं…..पर इनको दया नही आती ।

रोते हुये सरयू के किनारे भागे थे कोकिल साँई ……और वहाँ जाकर गिर पड़े …..सिया , सिया , सिया , सिया ….बस यही नाम उनके रोम रोम से प्रकट हो रहा था ।

मानसी ध्यान अब कोकिल जी का प्रारम्भ हो गया था …भाव देह में सहचरी रूप से कोकिल जी अयोध्या नाथ के दरबार में उपस्थिति हो गये थे ….अद्भुत भाव , विलक्षण भाव ।


हे मेरे बाप ! हे मेरे स्वामी ! हे रघुकुल तिलक ! हे राघवेंद्र सरकार !

मैं ऋषि वाल्मीकि के आश्रम से आयी हूँ ….और आपके सामने फ़रियाद लेकर आयी हूँ ।

वो कोकिल सहचरी उस श्रीराम की सभा में खड़ी थी और स्पष्टता से अपनी बात रख रही थी ।

हाँ , कहो , क्या कहना चाहती हो ? तुम्हें क्या कोई कष्ट है ? बताओ ये रामराज्य है यहाँ कोई दुःखी नही है ! श्रीराघवेंद्र सरकार भी शान्त भाव से बोले थे ।

श्रीराजाराम की बात सुनकर हंसी , मुँह छुपाकर हंसी कोकिल सखी ।

तुम हंसती क्यों हो ? श्रीराम ने पूछा ।

क्या करूँ फिर ? हे राघवेंद्र ! आपकी इस बात पर मुझे हंसी आयी कि आपने कहा मेरे राम राज्य में कोई दुखी नही है ! कैसे कह रहे हैं आप ये बात ? बताइये ! कहाँ हैं वो आपके वाम भाग में सुशोभित जनकनन्दिनी ?

भरी सभा में निरुत्तर हो गए थे श्रीरामभद्र । सभा भी कोकिल सहचरी को देखती ही रह गयी थी ।

आप कौन हो ? कुछ देर में बोले थे श्रीराघवेंद्र ।

मैं ? मैं सिया जू की सेविका – कोकिल सखी ।

सजल नयन हो गये थे श्रीराम के …कण्ठ अवरुद्ध हो गया था …वो कुछ बोल नही पा रहे थे ।

कुछ नीच लोगों की बात मानकर आपने उन सती शिरोमणि को त्याग दिया ! क्यों ?

क्या आपको पता नही है ….वो कितनी पवित्र हैं ! गंगा के जल में भी शायद किन्तु लगे …पर महारानी सिया जू के बारे में कोई अपवित्रता की कल्पना भी करता है तो महापाप लगेगा ।

आक्रामक हो गयीं थीं कोकिल सहचरी ….आपको पता है हर समय वो आपके ही चिन्तन में डूबी रहतीं हैं …..उनके रोम रोम से आपका ही नाम प्रकट होता है …..वो कभी आपसे शिकायत नही करेंगीं ….उनके मन में आपके प्रति शिकायत है ही नही …..पर वो बहुत दुःखी हैं …कोकिल सहचरी घुटनों में बल बैठ गयी थीं …हाथ जोड़कर ….उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे ।

वो काँटे में चलती हैं ……काँटों से उनके पाँव छिल जाते हैं …..रक्त बहता है उसमें से ….पर उन्हें कोई भान नही है …वो निरन्तर आपको ही स्मरण करती रहती हैं ….ये दुःख उनके लिये दुःख नही है ..दुःख तो ये है की आपसे वो दूर हैं । कहते कहते कोकिल सहचरी की वाणी रुक गयी ।

मैं भी जनकनन्दिनी के बिना दुखी हूँ – क्या कहूँ !

भरी सभा में श्रीराघवेंद्र रो पड़े ।

पर राजा हूँ …राज सत्ता में बैठने पर व्यक्तिगत जीवन राजा का समाप्त ही हो जाता है …उसका परिवार उसकी प्रजा होती है …..

पर हे रघुनाथ जी ! मैं तो आपके सामने अबोध बालिका हूँ …फिर भी इतना कहती हूँ …अब वो महारानी नही हैं ….आम प्रजा हैं वो ..तो क्यों न इस सभा में बुलाकर उनका पक्ष भी सुना जाये ।

कोकिल सखी श्रीरघुनाथ जी के सामने अपनी बात रख रही थी ।

मुझे नही लगता की इससे राजधर्म की कोई हानि होगी ।

“राजधर्म की कोई हानि नही होगी”
लक्ष्मण जी बोल उठे । ठीक कह रहीं हैं ये सखी …..भरत जी बोल रहे थे …हनुमान जी आदि ने भी समर्थन किया , गुरुवशिष्ठ जी ने भी जब समर्थन किया ….तो ख़ुशी से उछल पड़ी कोकिल सखी ……उठकर खड़ी हो गयी ।

प्रणाम किया और चल पड़ी …….

अरे ! कहाँ जा रही हो ? सुनो तो ….सभा के लोग बोलने लगे ।

मैं बस आधे घड़ी में ही आती हूँ आपका संदेशा सिया सुकुमारी को देकर …आरही हूँ …..उन्हें यहाँ की ये बातें बहुत सुख देने वाली हैं …पूरी बात बिना सुने ही कोकिल सखी तो चली गयी ।

हे जनककिशोरी ! श्रीराम का कोई अपराध नही था ….वो तो आपसे बहुत प्रेम करते हैं ।

राजधर्म के पालक हैं वो , जगत को धर्म की शिक्षा देने के लिये उनका अवतार हुआ है …इसलिये उनको दोष देना मुझे लगता है उचित नही है ।

श्रीकिशोरी जी ने अपने भारी पलकों को उठाकर कोकिल सखी की ओर देखा और इतना ही पूछा -मुझे याद करते हैं मेरे नाथ ?

बहुत याद करते हैं …बहुत याद करते हैं ….उन्होंने मुझे बताया कि कोई क्षण ऐसा नही जाता जिस क्षण वैदेही की याद न आये । आहा ! श्रीकिशोरी जी को ये सुनकर अत्यन्त सुख की अनुभूति हुयी । फिर अब क्या ? कोकिल सहचरी की ओर ही देखा सिया जू ने ।

मैं हूँ ना ……कोकिल सहचरी मुस्कुराईं …..और बोलीं – बस मैं आधी घड़ी में फिर आती हूँ ।

पर तू जा कहाँ रही है ? सिया जू ने पूछा । वहीं आपके प्राणनाथ के पास ।

इतना कहकर वो चली गयी कोकिल सहचरी ।

हे राम ! सीता को अब अपने पवित्र होने का प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नही है ….वो पवित्रों को भी पवित्र करने वाली हैं …..गुरु वशिष्ठ जी बोल रहे थे श्रीराम की सभा में ।

तभी कोकिल सहचरी पहुँची तो हाथ जोड़कर कोने में खड़ी हो गयीं ।

हनुमान जी ने ही उन्हें आगे किया था ।

तुम क्या कहती हो ? श्रीराम भद्र ने कोकिल को देखा तो प्रसन्न होकर पूछा ।

आपके पास पुष्पक विमान है …उसे मँगवाइये और अभी चलिये ….सिया जू को बड़े ही आदर के साथ अयोध्या लेकर आइये । कोकिल सखी की बात सुनते ही समस्त सभासदों को आनन्द आगया । गुरुवशिष्ठ जी ने भी आज्ञा दे दी ।

आप आइये , मैं स्वामिनी जू के पास जाती हूँ ……उनको तैयार करती हूँ ।

ये कहकर उछलती कूदती हुयी आनंदित वो कोकिल ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में आयीं ।

कोकिला ! सच में मेरे नाथ मुझे लेने आरहे हैं ? पूछ रही हैं सीता जी ।

हाँ , स्वामिनी जू ! वो आ रहे हैं …अब आपके सारे दुःख दूर हो जाएँगे ।

पर …….सीता जी रुक गयीं ..शून्य में तांकने लगीं ।

क्या हुआ ? आप कुछ कहना चाह रही हैं ? कोकिल ने पूछा ।

सखी ! नाथ संकोची हैं …तुम लोगों के दबाव से तो मुझे लेने नही आरहे ?

कोकिल सहचरी भाव में डूब गयीं …उन्होंने अपना हाथ श्रीकिशोरी जी के मस्तक में रखा ….आशीष देने की मुद्रा में ……और एक पद गाया –

मैथिलि , रघुवर तरु तुम बेली ।
बिलग न होहुँ नवेली छिन भर , मिली रहों मन मेली ।
अवध महल की सरस नवेली , तिरहुत की जनमेली ।
प्रात समय प्राची उदयाचल भुवन द्वीप दरशेली ।।
करत सदा जीवे सिय स्वामिनी , चन्द्र वदन चमकेली ।
कोकिल सखी मैं बलि बलि जाऊँ , मधु मधु धार बहेली ।।

तभी आकाश से पुष्पक विमान उतरा ..ऋषि वाल्मीकि बहुत आनंदित थे …अन्य वन में रहने वाली जितनी थीं वो सब सिया जू को सजा कर लेकर आयीं ….

अब हृदय से लगाओ …आनन्द से फूली नही समा रही है ये कोकिल सखी ।

श्रीराम जी ने अपनी प्रिया सिया जू को हृदय से लगाया ….कोकिला सखी नाच रही है …पुष्पों को उछाल रही है ….दोनों युगलवर के ऊपर पुष्प उछालते हुये कह रही है ….”तुम ऐसे ही मिले रहो ..तुम कभी दूर मत होना “ ।

विमान में बैठा दिया था कोकिल सखी ने ….वाम भाग में सिया जू को देखकर ये बारंबार आशीष दिये जा रही थी । सिया जू का मुख चन्द्र खिल गया था ….उनको कितना आनन्द हो रहा होगा ये सोच सोचकर कोकिला सखी गदगद है ।


उस आनन्द की अवस्था में मानसिक ध्यान टूट गया कोकिल साँई का ।

सामने सरयू बह रही हैं …वही अयोध्या , वही दूर कनकभवन । उदासी ।

फिर उदासी छाने लगी कोकिल साँई को ….तब कोकिल जी के हृदयाकाश में भगवान श्रीरामभद्र की वाणी गूंजी ……”हम दोनों अलग नही हैं …हम दोनों कभी अलग हो ही नही सकते , हम दोनों एक ही हैं ….और अगर तुमको विश्वास नही हो तो तुम्हारे कण्ठ में जो स्वर्ण मय भोजपत्र है उसको देखो”….तुरन्त कोकिल साँई ने जब अपने कण्ठ का स्वर्णमय भोजपत्र देखा तो उसमें अब सिया राम जू की झाँकी कोकिल जी को दिखाई दी ।( मैंने पूर्व में बताया है कि सिया जू के चरण चिन्ह की प्राप्ति कोकिल जी को बहुत पहले हो चुकी थी …उसी में आज युगल की झाँकी भी भगवान ने दिखा दी )

हे कोकिल ! तुम्हारे भाव जगत में भी तो हम मिल चुके हैं …तुमने ही मिला दिया है ….और भक्त के भाव ही सत्य हैं …बाक़ी सब मिथ्या है …..

कोकिल जी ने पूछा – अब मेरे लिए क्या आज्ञा है ? मैं कहाँ जाऊँ ?

तभी श्रीराम जी और उनके वाम अंग से सिया जू प्रकटीं ….. दोनों के साक्षात् दर्शन करके और और गदगद हो गये अब तो कोकिल जी । फिर प्रश्न किया ….मैं अब कहाँ जाऊँ ?

श्रीजी ने कहा …सरकार का प्रेमपूर्ण अवतार है श्रीकृष्ण ….तुम उन्हीं के धाम में जाओ …और वहीं जाकर अखण्ड वास करो …श्रीधाम वृन्दावन । वहाँ वृषभान दुलारी का तुमको भरपूर वात्सल्य मिलेगा।

पर आपको मैं कैसे छोड़ दूँ ? कोकिल साँई ने कहा ।

हम ही तुम्हें नही छोड़ेंगे ….हमें लेकर जाओ श्रीधाम वृन्दावन ।

इतना कहकर श्रीकिशोरी जी और अवधनाथ अन्तर्ध्यान हो गये थे ।

साधकों को कुछ समझ में नही आया था कि यहाँ क्या घटना घट चुकी है ……

सरयू जी को प्रणाम कर श्रीधाम वृन्दावन की ओर निकल पड़े थे कोकिल साँई और समस्त उनके साधक वृन्द ।


अयोध्या में सिया जू ने आज्ञा दी कोकिल साँई को …कि श्रीधाम वृन्दावन जाओ ?

हाँ , उन सिन्धी भक्त ने हमें बताया ….इस बात को एकान्त में कोकिल जी अपने साधकों को कहते थे ….अयोध्या धर्म का स्थान है ….काशी मुक्ति का स्थान है ….किन्तु श्रीवृन्दावन और श्रीजनकपुर प्रेम का स्थान है ….भक्ति का स्थान है । मुझे सिया जू ने जनकपुर की आज्ञा नही दी …मैंने वहाँ रहने की भी सोची थी ….पर उन्होंने मुझे श्रीवृन्दावन ही भेजा …मेरी दृष्टि में जनकपुर और वृन्दावन की उपासना सिद्धांत अभिन्न हैं । क्यों की एक ओर मिथिलेश नन्दिनी हैं …तो दूसरी ओर वृषभान नन्दिनी हैं ….जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण अभिन्न हैं ऐसे ही ये दोनों कीर्ति किशोरी और जनककिशोरी अभिन्न तत्व ही हैं ।

वो सिन्धी भक्त कह रहे थे ….जैसे भगवान भी भिन्न भिन्न रूप धारण करके रस का आस्वादन करते हैं …ऐसे ही भक्त भी रसास्वादन करने हेतु अपने इष्ट का नाम रूप आदि से रस लेते रहते है ….ये भक्ति की अद्भुत रीत है । कोकिल साँई कहते थे …भक्त को सब पता है …ऐसा मत सोचना की भक्त कुछ जानता ही नही है ….सब एक हैं ..तत्वतः सब राम कृष्ण एक हैं …पर रस लेने के लिये तो रबड़ी चाहिये पेड़ा चाहिये खुरचन चाहिये …वैसे मूलतः सब दूध ही है …पर साहब , अपनी अपनी रुचि है ….उस रस को ग्रहण करने की अपनी अपनी रीत है ।

फिर श्रीधाम वृन्दावन में आकर क्या हुआ ? गौरांगी ने पूछा ।

सिन्धी भक्त बताने लगे थे आगे कि बात ……….

शेष कल –

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