घर में रहकर भगवान के दर्शन कर सकते हैं भाव भक्ति का बना कर रखे

हम सब अपने घर में रहकर भी श्रीभगवान का दर्शन कर सकते है,बस हमारा भाव यही होना चाहिए कि कण कण में भगवान व्याप्त है। पढ़िए।
गोपियाँ सबमे श्रीभगवान को निहारती हैं। वे कहती हैं –
“इस वृक्ष में,लता में फूल में,मुझे मेरे प्रभु दिखते हैं। मेरा कृष्ण तो मुझे छोड़कर तो जाता ही नहीं हैं। “ऐसे,गोपियों को घर में ही श्रीपरमात्मा का साक्षात्कार हुआ हैं। श्री भागवत में कहा है कि घर में रहो,अपने व्यवहार करो,फिर भी परमात्मा को प्राप्त कर सकोगे. घर में रहना पाप नहीं है,परन्तु मन में रखना पाप हैं। सबको साधु होने की जरूरत नहीं हैं। यदि आप सब सन्यास ले लेंगे तो साधुसन्यासियो का स्वागत कौन करेगा ? उनकासन्मान कौन करेगा? गोपियों की प्रेमलक्षणा भक्ति ऐसी दिव्य है कि
उनको घर में रहते हुआ भी प्रभु की प्राप्ति हुई है. श्रीकृष्णरूप बनी हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण में मन मिलेगा वह श्रीकृष्णरूप हो जायगा।ऐसे अलौकिक भक्तिमार्ग का भगवान व्यास नारायण इस भगवतशास्त्र में वर्णन करेंगे और इसी भक्ति द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार होगा।
श्रीमद्भागवत आपके प्रत्येक व्यहवार को भी भक्तिमय बना देगा. भगवान,व्यवहार और परमार्थ का समन्वय कर देगा.
आपको घर में ही वहीं आनंद मिलेगा -जो योगी वन में बैठकर भोगते है. योगी समाधिमें जैसा आनंद पाते है वैसा आनंद गृहस्थ को भी प्राप्त हो सके, इसलिए भगवतशास्त्रकी रचना की गई है. संसार के विषय-सुखो के प्रति “वैराग्य” हो -और प्रभु के प्रति “प्रेम” जगे- यही श्रीभागवत की कथालीलाओ का उदेश्य हैं।
भागवत अर्थात भगवन को मिलने-मिलाने का साधन।
संतो का आश्रय केने वाला संत बनता है,भागवत का आश्रय लेने वाला भगवन होता है.
भक्ति केवल मंदिरों में ही हो सकती है ऐसा नहीं है, भक्ति तो जहाँ भी बैठ जाओ वहीँ हो सकती है. इस भक्ति के लिए कोई देश (स्थान) या काल (समय) की जरूरत नहीं हैं. भक्ति तो चौबीसों घंटे करनी है. भक्ति के काल (समय) और भोग के काल (समय)) ऐसा जो भेद रखना नहीं चाहिए..
भक्ति सतत करो,निरंतर करो. चौबीसों घंटे ब्रह्म संबंध बनाये रखो. इश्वर का हमेशा ध्यान रखो,सदा सावधान रहो कि माया के संबंध न हो जाय। जय जय श्री राधे कृष्णा जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।



We all can have darshan of Shri Bhagwan even while staying in our house, our only feeling should be that God is present in every particle. Read. Gopis look at Shri Bhagwan among all. She says- “In this tree, in the creeper, in the flower, I see my Lord. My Krishna never leaves me.” In this way, the Gopis have realized the Supreme Lord at home. It is said in Shri Bhagwat that stay at home, behave yourself, still you will be able to attain God. Staying at home is not a sin, but keeping it in the heart is a sin. Not everyone needs to be a saint. If you all take retirement then who will welcome the monks and nuns? Who will respect him? The loving devotion of the Gopis is so divine that He attained God even while living at home. She has become like Shri Krishna. In this way, when the mind is found in Shri Krishna, he will become Shri Krishna. Lord Vyas Narayan will describe such supernatural path of devotion in this Bhagwat Shastra and through this devotion, God will be realized. Shrimad Bhagwat will make your every behavior devotional. God will coordinate behavior and charity. You will get the same pleasure at home – which yogis enjoy while sitting in the forest. Bhagwat Shastra has been composed so that a householder can also get the same joy that a Yogi finds in Samadhi. To become dispassionate towards worldly pleasures and to awaken love for God – this is the objective of the stories of Shri Bhagwat. Bhagwat means means of meeting God. One who takes shelter of saints becomes a saint, one who takes shelter of Bhagwat becomes God. It is not that devotion can be done only in temples, devotion can be done wherever you sit. There is no need of any country (place) or time (time) for this devotion. Devotion has to be done 24 hours. There should be no difference between the time of devotion and the time of enjoyment. Do devotion continuously. Maintain connection with Brahma 24 hours. Always keep God in mind, always be careful not to get involved in Maya. Jai Jai Shri Radhe Krishna Ji. May Shri Hari bless you.

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