न मैं जानूं आरती-वंदन, न पूजा की रीत।

मीरा ठीक कहती है: न मैं जानूं आरती-वंदन, न पूजा की रीत।
, जिनके जीवन में प्रेम नहीं है। वे ही जाते हैं मंदिर में घंटियां बजाते हैं, फूल चढ़ाते हैं, मस्जिदों में नमाज पढ़ते हैं, गुरुद्वारों में जपुजी का पाठ करते हैं, गिरजों में सूली पर चढ़े हुए जीसस को प्रणाम करते हैं। ये वे ही लोग हैं, जिनको प्रेम का पता नहीं है। तो प्रेम की कमी किसी तरह बेचारे पूरी कर रहे हैं।
लेकिन प्रेम न तो जानता है आरती, न वंदन, न जानता है रीति। प्रेम तो मर्यादा-मुक्त है। प्रेम सीमाएं नहीं मानता।
प्रेम पर्याप्त है अपने में। फिर तुम जो चढ़ा दो–जो चढ़ा दो! दो आंसू। सिर झुका दो। दो शब्द बोल दो। जरूरत थोड़े ही है कि संस्कृत में बोलो, मराठी में भी बोलोगे तो समझ में आ जाएगा परमात्तमा के।
बात भाव की है, भाषा की नहीं है। अंतर्तम की है। क्या कहते हो, कैसे कहते हो, व्याकरण सही है कि गलत–इस चिंता में मत पड़ना। परमात्तमा कोई स्कूल का शिक्षक नहीं है कि पहले व्याकरण की शुद्धियां करेगा, पहले भाषा ठीक जमाने को कहेगा। परमात्तमा तुम्हारा भाव समझ लेगा। न कहो तो भी चल जाएगा। चुपचाप मौन खड़े हो जाओ तो भी चल जाएगा।
आंखें अगर दीये बन जाएं तो और क्या चाहिए! बस ये दो आंखें उसकी प्रतीक्षा में, उसकी प्रार्थना में डूब जाएं तो दीये बन जाती हैं।
तुम्हें प्रेम का तीर्थ बनना है। इन आंखों को प्रतीक्षा बन जाने दो। आएगा अतिथि, निश्चित आएगा। राह देखने की अनंत क्षमता चाहिए। इंतजार की ऐसी क्षमता चाहिए जो चुके ही न। अनंत प्रतीक्षा जो करने में सफल है, एक न एक दिन, जब भी तुम परिपक्व हो जाते हो, वह द्वार पर दस्तक देता है।



Meera is right: I neither know Aarti-Vandan nor the method of worship. , who have no love in their life. It is they who go to temples to ring bells, offer flowers, offer namaz in mosques, recite Japuji in Gurudwaras, and pay obeisance to crucified Jesus in churches. These are the only people who do not know love. So somehow the poor people are making up for the lack of love. But love neither knows aarti, nor worship, nor knows rituals. Love is limitless. Love knows no boundaries. Love is enough in itself. Then whatever you offer – whatever you offer! Two tears. Bow your head. Say two words. There is little need to speak in Sanskrit, if you speak in Marathi also then you will understand God. It is a matter of feelings, not language. Is of the innermost. Don’t worry about what you say, how you say it, whether the grammar is right or wrong. God is not a school teacher who will first correct the grammar and first ask to correct the language. God will understand your feelings. Even if you don’t say, it will be okay. Even if you stand quietly, it will be fine. If eyes become lamps then what else is needed? If these two eyes are immersed in waiting for him and praying for him, they become lamps. You have to become a pilgrimage of love. Let these eyes become waiting. The guest will come, he will definitely come. Infinite ability to see the path is required. We need the ability to wait for something that we haven’t already done. What eternal waiting is successful in doing is that one day or the other, whenever you become mature, it knocks at the door.

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