प्रगटे श्री हरिवंशचन्द्रवर

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प्रगटे श्री हरिवंशचन्द्रवर , रसिकन के सरताज ॥
घर-घर बन्दनवार साथिये , सम्पत्ति सार सिंगार ।
नाचत गावत प्रेम विवश गति, प्रमुदित तन न सँभार॥
पंच शब्द मिलि बाजे-बाजें, धुनि सुनि श्रवन सिरात ।
भूषन वसन लुटावत बहुविध , आनन्द उर न समात॥
जाचक जन सब किये अयाची , पुजई मन की आस ।

श्री व्यास सुवन की चरन बलैया लग्यौ किशोरीदास ॥*

आदिब्रम्ह सिद्धाद्वैत दृढ रसिक अनन्य श्री हित राधावल्लभ सम्प्रदाये प्रवर्तक वंशी अवतार श्री हित हरिवंश जू महाराज के प्रागट्योत्सव

महाप्रभु सोलहवीं शताब्दी में आविर्भूत विभूतियों में से एक अनन्यतम विभूति थे। उन्होंने अपने अद्भुत चरित और आचरणों के द्वारा उपासना, भक्ति, काव्य और संगीत आदि के क्षेत्र में क्रान्तिकारी मोड दिए। वह तत्कालीन रसिक समाज एवं संत समाज में श्रीजू, श्रीजी, हित जू एवं हिताचार्यआदि नामों से प्रख्यात थे। उनका जन्म बैसाख शुक्ल एकादशी, विक्रम संवत् १५३० को मथुरा से 12 कि॰मी॰ दूर आगरा-दिल्ली राजमार्ग पर स्थित ‘बाद’ ग्राम में हुआ था।

हरिवंश महाप्रभु का जीवन

हरिवंश महाप्रभु के देववनसहारनपुर निवासी पिता पं. व्यास मिश्र जब ब्रज भ्रमण हेतु आए, उस समय उनकी मां श्रीमती तारा रानी गर्भवती थीं। अतएव उनकी मां को प्रसव पीडा के कारण बाद ग्राम में ठहरना पडा। यहीं पर एक सरोवर के निकट वट वृक्ष के नीचे हरिवंश महाप्रभु का जन्म हुआ। यहां चिरकाल पूर्व से राधावल्लभीयविरक्त संत निवास करते चले आ रहे हैं। इस स्थान का जीर्णोद्धार राजा टोडरमलने कराया था। वर्तमान में यहां श्री राधा रानी का अत्यंत भव्य मंदिर बना हुआ है। श्री हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु में अनेकानेक विलक्षण प्रतिभाएं थीं। जब वह मात्र 7वर्ष के थे तब वे देववनके एक अत्यधिक गहरे कुएं में कूद कर श्याम वर्ण द्विभुजमुरलीधारीश्री विग्रह को निकाल लाए थे। उन्होंने इसका नाम ठाकुर रंगीलालरखा। यह विग्रह देववनके राधा नवरंगीलाल मंदिर में विराजित है। हरिवंश महाप्रभु राधारानीको अपनी इष्ट के साथ गुरु भी मानते थे। रसिक वाणियों में यह कहा गया है कि हरिवंश जी को हित की उपाधि राधा रानी ने मंत्रदान करते समय दी थी।

वृंदावन प्रस्थान

महाप्रभु 31 वर्ष तक देववन में रहे। अपनी आयु के 32 वें वर्ष में उन्होंने श्री राधा रानी की प्रेरणा से वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में उन्हें चिरथावलग्राम में रात्रि विश्राम करना पडा। वहां उन्होंने स्वप्न में प्राप्त श्री राधारानी के आदेशानुसार एक ब्राह्मण की दो पुत्रियों के साथ विधिवत विवाह किया। बाद में उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों और कन्यादान में प्राप्त श्री राधावल्लभ लाल के श्री विग्रह को लेकर वृंदावन प्रस्थान किया। श्री हिताचार्य जब संवत् 1562 में वृंदावन आए, उस समय वृंदावन निर्जन वन था। वह सर्वप्रथम यहां के मदन टेर पर रहे और उसी जगह श्री राधावल्लभ लाल को लाड लडाया| बाद में उनके श्री वृंदावन मैं प्रथम शिष्य बने दस्यु सम्राट श्री नरवाहन जी ने श्री हित महाप्रभु को धनुश और बाण दिया और महाप्रभु से कहा जहां पर यह बाण जयेगा वहाँ तक की भुमि आप की। बाण तीर घाट [आज का चीर घाट] तक गया। श्री हित महाप्रभु जी श्री राधावल्लभ लाल के श्री विग्रह को संवत् 1562 की कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को लेकर श्री वृंदावन आये उसी दिन श्री विग्रह को विधिवत् प्रतिष्ठित किया।

भक्ति मार्ग

रस भक्ति धारा के प्रवर्तक हरिवंश महाप्रभु ने वृंदावन में भक्ति मार्ग का नवोन्मेषकिया। साथ ही उन्होंने रस भक्ति को ब्रजभाषा का अत्यंत आकर्षक उपास्य तत्व बनाया। उन्होंने समाज संगीत की परिपाटी का शुभारंभ किया। उनके द्वारा राग, भोग और उत्सवों पर आधारित सात भोग और पांच आरती वाली विधि निषेध शून्य अष्टयामीसेवा पद्धति का प्रसार किया गया। उन्हीं ने राधा वल्लभ सम्प्रदाय की नींव डाली। मध्यकालीन हिंदी साहित्य में मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियोंसे इस सम्प्रदाय का योगदान अतुलनीय है। नाम, वाणी, लीला, धाम और उपासना आदि के क्षेत्र में उनकी अनेकों महानतम व मौलिक देन हैं। उन्होंने पंचकोसीवृन्दावन में रासमण्डल, सेवाकुंज, वंधशीवट, धीर समीर, मानसरोवर, हिंडोल स्थल, श्रृंगार वट और वन विहार नामक लीला स्थलों को प्रकट किया। उन्होंने निर्गुण व सगुण भक्ति मार्गो को पृथक प्रकट करके हिंदी साहित्य के इतिहास में अभिनव व अद्भुत क्रान्ति उत्पन्न की। हितजीने ब्रज भाषा में हित चौरासी व स्फुट वाणी एवं संस्कृत भाषा में राधासुधानिधि व यमुनाष्टकनामक ग्रंथों का प्रणयन किया उनके यह ग्रंथ रसोपासनाके आधार स्तम्भ हैं। हरिवंश महाप्रभु अपने स्वभाव से अत्यंत उदार व कृपालु थे। वे ऊंच-नीच वर्ण-अवर्ण तथा योग्य-अयोग्य का ध्यान न रखते हुए सभी पर समान दृष्टि से कृपा रखते थे। उन्होंने सवर्ण एवं अवर्ण सभी को स्वयं के द्वारा लाभान्वित किया। वह अत्यंत निस्पृह था। लौकिक वैभव से वह अत्यंत विरक्त थे।

रुपयों-मुद्राओं का वह स्पर्श तक नहीं करते थे। वस्तुत:उनमें सुमधुरवादिता, अनुपम उदारता, शरणागत पालिता, निराभिमानता, परोपकारिता एवं निन्दकों पर भी कृपा करने के सुमधुरवादिता, अनुपम उदारता, शरणागत पालिता, निराभिमानता, परोपकारिता एवं निन्दकों पर भी कृपा करने के अनेकानेक गुण थे। युग प्रवर्तक हित हरिवंश महाप्रभु ब्रज में यमुना तट पर मानसरोवर के निकट भांडीरवन के भंवरनीनामक निकुंज में संवत् 1609की आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) की रात्रि को प्रिया जी! आप कहां हो? कहां हो? कहते हुए और देखते ही देखते लोक दृष्टि से ओझल हो गए।



Revealed Shri Harivanshchandravar, the ruler of Rasikan. House-to-house bandanwar companion, property essence singar. Dancing, singing, love, compulsive speed, not a merry body Five words milli baje-bajene, dhuni listen shravan sirat. Bhushan Vasan Lutawat Multiple, Anand ur na samaat. The conscious people did everything, worshiped the hope of the mind.

Shri Vyas Suvan’s Charan Balayya Lagyau Kishoridas *

Pragatyotsav of Adibrahma Siddhadvaita firm connoisseur exclusive Sri Hit Radhavallabha sect initiator Vanshi incarnation Sri Hit Harivansh Ju Maharaj

Mahaprabhu was one of the most unique among the embodiments of the sixteenth century. Through his wonderful character and conduct, he gave revolutionary modes in the field of worship, devotion, poetry and music etc. He was famous in the then Rasik Samaj and Sant Samaj by the names of Shreeju, Shreeji, Hit Ju and Hitacharya etc. He was born on Baisakh Shukla Ekadashi, Vikram Samvat 1530 in ‘Baad’ village located on the Agra-Delhi highway, 12 km from Mathura.

Life of Harivansh Mahaprabhu

When Harivansh Mahaprabhu’s father Pt. Vyas Mishra, a resident of Devvansaharanpur, came to visit Braj, his mother Mrs. Tara Rani was pregnant at that time. Therefore his mother had to stay in the village after the pain of childbirth. Here Harivansh Mahaprabhu was born under a banyan tree near a lake. From time immemorial, Radhavallabhiya virtuous saints have been residing here. This place was renovated by King Todarmal. At present, a very grand temple of Shri Radha Rani is built here. Shri Hit Harivansh Chandra Mahaprabhu had many unique talents. When he was only 7 years old, he jumped into a very deep well of Devavana and brought out the black varna Dwibhujmurlidhari Shree Deity. He named it Thakur Rangilal. This deity is enshrined in the Radha Navrangilal temple of Devavane. Harivansh considered Mahaprabhu Radharani as his guru along with his favor. It is said in the Rasik Vaanis that the title of ‘Hit’ was given to Harivansh ji by Radha Rani while giving the mantra.

Vrindavan Departure

Mahaprabhu stayed in Devavan for 31 years. In the 32nd year of his age, he left for Vrindavan under the inspiration of Shri Radha Rani. On the way he had to take rest for the night at Chirthavalgram. There he duly married two daughters of a Brahmin as per the orders of Shri Radharani, received in a dream. Later he left for Vrindavan with both his wives and Shri Radhavallabh Lal’s Deity received in Kanyadaan. When Shri Hitacharya came to Vrindavan in 1562, at that time Vrindavan was a deserted forest. He first stayed at Madan Ter here and fought Shri Radhavallabh Lal at the same place. Later, his first disciple in Shri Vrindavan, the Dasyu Emperor Shri Narvahan ji gave bow and arrow to Shri Hit Mahaprabhu and told Mahaprabhu that where this arrow will fly, you land till there. The arrow went up to the arrow ghat [today’s chir ghat]. Shri Hit Mahaprabhu ji brought Shri Radhavallabh Lal’s Shri Vigraha to Shri Vrindavan on the Kartik Shukla Trayodashi of Samvat 1562, on the same day Shri Deity was duly consecrated.

path of devotion

Harivansh Mahaprabhu, the originator of Ras Bhakti stream, innovated the path of devotion in Vrindavan. At the same time, he made Ras Bhakti a very attractive worship element of Brajbhasha. He started the tradition of society music. By him, the method of seven bhog and five aartis based on raga, bhog and festivals was disseminated zero Ashtyamiseva method. He laid the foundation of Radha Vallabh sect. The contribution of this sect in medieval Hindi literature is incomparable both in terms of quantity and quality. He has many greatest and original contributions in the field of name, speech, Leela, Dham and Upasana etc. He revealed the places of Leela named Rasmandal, Sewakunj, Vandashivat, Dhir Sameer, Mansarovar, Hindol Sthal, Shringar Vat and Van Vihar in Panchkosi Vrindavan. He created an innovative and wonderful revolution in the history of Hindi literature by revealing the Nirguna and Saguna Bhakti paths separately. Hitji has penned texts named Hit Chaurasi and Sphut Vani in Braj language and Radhasudhanidhi and Yamunashtakana in Sanskrit language, these texts are the basis pillars of Rasopasana. Harivansh Mahaprabhu was very generous and kind by his nature. He used to shower mercy on everyone with equal vision, irrespective of the high and low castes and the worthy and the unworthy. He benefited all the upper and lower castes by himself. He was very innocent. He was very detached from worldly splendor.

He did not even touch the rupees and coins. In fact, he had many qualities of sweetness, incomparable generosity, surrenderedness, selflessness, altruism and grace even to the slanderers. Yuga Pravartak Hit Harivansh Mahaprabhu on the night of Ashwin Purnima (Autumn Purnima) of the year 1609 in the park called Bhandiravan near Mansarovar on the banks of Yamuna in Braj, Priya ji! Where are you? Where are you? As he said and looked, he disappeared from sight.

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