समर्पण भक्ति

भगवान की भक्ति हो या अध्यात्म में मोक्ष पाना हो, ये सब कुछ एक ही भाव पर पूर्ण हो सकता है और वह है ‘समर्पण’ या ‘आत्मसमर्पण’। समर्पण शब्द सुनने और समझने में आसान लग सकता है लेकिन इसमें बहुत गहराई है और इसकी तह में उतरना हर किसी की बात नहीं। जो उतर पाता है, वही ईश्वर को पा पाता है।

संत कबीर कहते हैं-
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।।

कबीरदास ने आजीवन जो कुछ भी अर्जित किया, खुद में जितना भी ज्ञान, सम्मान, साधना समाहित किया था, सबको ईश्वर का बता दिया। उन्होंने किसी भी चीज का श्रेय खुद नहीं लिया। वो भगवान को खुद को समर्पित करते हुए कहते हैं कि मेरे पास जो कुछ है, सब तुम्हारा ही तो है, मेरा कुछ भी नहीं है।

कबीरदास आज के दौर में एक ऐसे संत के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने धर्म की आलोचना की, मूर्तिपूजा का विरोध किया। कोई भी उससे ऊपर उनके बारे में सोच नहीं पा रहा जो कि अज्ञानता है। लेकिन सच्चाई यह है कि ईश्वर के प्रति उनकी जागरुकता हम सबसे कहीं ऊपर थी और इस दोहे से समझ आता है कि बिना भगवान के स्वरूप को पूजे उन्होंने किस तरह अपनी भक्ति और समर्पण के जरिए भगवान को पाया।

समर्पण कभी भी शंका, नियमों या शर्तों के साथ नहीं आता। समर्पण तो अपने जीवन का समस्त बागडोर ईश्वर के हाथों में सौंप देना है।

समर्पण तो अपने सभी इच्छाओं और विकारों से मुक्त होकर स्पष्ट जागरुकता के साथ यह सोच लेना है कि ये भावनाएं, विचार, उपलब्धियां कुछ भी आपकी नहीं बल्कि सबका नियंत्रण उस परमात्मा के हाथों में है। जब आप समर्पण कर देते हैं, तो फिर आप अच्छी-बुरी भावना से ऊपर उठ जाते हैं क्योंकि आप समझ जाते हैं कि कुछ भी आपके नियंत्रण में नहीं है।

अगर बुरा हुआ है, तो होना ही था और आप फिर उसका दु:ख नहीं मनाते बल्कि उसे ईश्वर की इच्छा मान लेते हैं। समर्पण का अर्थ उम्मीद छोड़ना या हारना नहीं है बल्कि बुरे हालातों के लिए भगवान या किस्मत को कोसना नहीं है और खुद में यह आस्था जगाना है कि भगवान ने यह संकट दिया है, तो वह ही उबारेंगे। आपको बस प्रयत्न करते जाना है। अगर आपको उस परमात्मा की नीयत पर थोड़ी भी शंका हुई, तो आप उनका सानिध्य खो देंगे। अतः, इससे जुड़ी एक कथा प्रस्तुत है-

एक बार भगवान कृष्ण भोजन कर रहे थे और उनकी पत्नी रुक्मिणि पंखा झल रही थीं। अचानक बीच में भगवान कृष्ण भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए और जूठे हाथ दरवाजे की ओर दौड़ पड़े। रुक्मिणि को कुछ समझ न आया लेकिन वह उनका इंतजार करती रहीं। थोड़े ही देर में प्रभु लौट आये और वापस भोजन करने लगे।

जब रुक्मिणि ने जाने का प्रयोजन पूछा, तो श्री कृष्ण ने कहा कि उनके एक भक्त को कुछ लोग पत्थरों से मार रहे थे और वो उसी को बचाने दौड़ पड़े। ‘तो फिर आपने उसे बचाया क्यों नहीं’- रुक्मिणि ने पूछा। दरअसल, पहले तो वह मुझे याद करता रहा लेकिन फिर बाद में उसने खुद को बचाने के लिए स्वयं ही पत्थर उठा लिया। अब उसे मेरी आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, मैं लौट आया।

अगर प्रभु के उस भक्त ने भयवश या शंकावश पत्थर उठाया होगा या यह सोचकर की उसे ईश्वर के मदद की आवश्यकता नहीं, तो उसने भगवान को खो दिया।

समर्पण भाव का विकास-
समर्पण का भाव एक मजबूत मनोस्थिति का परिणाम होती है जिसे विकसित करने के लिए कई सांसारिक भावों का त्याग करना होगा। आपको कर कर्म को इश्वर का आदेश समझना होगा।

जो कुछ भी मिला है या मिलता है, उसके प्रति उस परमात्मा का आभार प्रकट करें। कभी भी बुरे हालातों में यह शंका न पैदा करें कि भगवान आपका बुरा चाहता है।

जीवन में जो भी मुसीबत आये, उसे राह का रोड़ा मानने के बजाय एक सबक की तरह सीखें और यह समझें कि ये चुनौतियां आपको सही लक्ष्य तक पहुंचाने आई हैं।

कभी भी इस बात का अहंकार मत कीजिए कि आपने खुद को इश्वर को समर्पित कर दिया है बल्कि इस भाव को और प्रगाढ़ कीजिए।



Whether it is devotion to God or to get salvation in spirituality, all this can be complete on the same house and that is ‘surrender’ or ‘surrender’. It may seem easy to hear and understand the word dedication, but it has a lot of depth and it is not everyone’s talk to get into its bottom. The one who can get down, he can find God.

Saint Kabir says- I have nothing in me, whatever is there. You hand over you, what is the cost.

Whatever Kabirdas earned for life, all the knowledge, honor, spiritual practice in himself, told everyone to God. He himself did not take credit for anything. He dedicates himself to God and says that whatever I have, everything is yours, I have nothing.

Kabirdas is known as a saint in today’s era who criticized religion, opposed the idolatry. Nobody is able to think about them above that which is ignorance. But the truth is that his awareness towards God was most above us and this couplet understands how he found God without worshiping the nature of God through his devotion and dedication.

Dedication never comes with doubts, terms or conditions. Dedication is to be handed over to God in the hands of God.

Dedication is free from all its desires and disorders and think with clear awareness that these feelings, thoughts, achievements are nothing but everyone’s control is in the hands of that divine. When you surrender, then you rise above good and bad feelings because you understand that nothing is under your control.

If bad has happened, then you had to be and you do not celebrate it again, but consider it as the will of God. The meaning of dedication is not to leave or lose hope, but to curse God or luck for bad conditions and to arouse the faith in himself that God has given this crisis, then he will heal. You just have to keep trying. If you have a little doubt on the intention of that divine, then you will lose their company. Therefore, a story related to it is presented-

Once Lord Krishna was eating food and his wife Rukmini was fanning. Suddenly, Lord Krishna left the food and stood up and ran towards the door. Rukmini did not understand anything but she kept waiting for her. In a short time the Lord returned and started eating back.

When Rukmini asked for the purpose of leaving, Shri Krishna said that some people were killing one of his devotees with stones and he ran to save him. ‘Then why didn’t you save him’- Rukmini asked. Actually, at first he kept remembering me but then later he lifted the stone himself to save himself. Now he did not need me. So, I returned.

If that devotee of the Lord would have raised the stone fearlessly or suspicious or thinking that he did not need God’s help, then he lost God.

Development of dedication The sense of dedication is the result of a strong mood that has to be sacrificed to develop many worldly expressions. You have to understand the order of God by doing karma.

Whatever you have found or get, thank that God. Never create doubt in bad conditions that God wants your bad.

Instead of considering whatever trouble comes in life, learn it as a lesson and understand that these challenges have come to bring you to the right goal.

Never ego ego that you have dedicated yourself to God, but intensify this feeling.

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