समर्पण भाव की जागृति 3

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हे परम पिता परमात्मा मै अभी तुम्हें जानता नहीं हू। कैसे भगवान से मिलन होता है भगवान का असली रूप क्या है वे कैसे भक्त को अपना स्वरूप प्रकट करते हैं।

भगवान मे कितना तेज होता है भक्त उस तेज को कैसे सम्भाल पाता है। दिव्य दृष्टि क्या होती है हे भगवान हे परमात्मा हे प्रभु प्राण नाथ मै तुम्हे कैसे जान पाऊगा मेरी खोटि बुद्धि हैं ।मै दिल में खोजता हूँ। दिल मे पवित्रता दिखाई नहीं देती है। हे भगवान फिर मिलन कैसे हो।

हे सर्वस्व हे स्वामी भगवान नाथ अब ये आत्मा तुम्हारी बन जाना चहती है ।मैं जन्म पर जन्म लेता रहा बस तुम्हारे पास ही नहीं आता हूँ। मेरा ध्यान पुजन  सिमरन सब कच्चे ही हैं तभी तो भगवान नाथ कृपा दृष्टि नहीं करते हैं


भक्त भगवान से यही प्रार्थना करता है हे प्रभु प्राण नाथ अब तक मैंने तुम्हें देखा नहीं। जब तक तुम्हारे से साक्षात्कार नहीं होता है तब तक मैं कैसे मानु कि तुम प्रकाश रूप हो। तुम प्रेम हो तुम प्रीत हो।हे नाथ ऐसे तुम कण-कण में व्यापक हो ये शरीर ये जगत तुम्हारी रचना है।

तुम से भिन्न कुछ भी नहीं जङ चेतन मे तुम्हारा निवास है तुम प्रेम हो प्रेम की प्रकाष्ठा विरह की तङफ भी तुम हो मै और तुम दोनों तुम हो हे नाथ फिर भी दुरी क्यो दिखाई देती है। मानव जन्म लेकर कठपुतली की तरह नाचता रहता है वह समझ जाता है तेरा प्रितम तेरे अन्दर बैठा है तुझे प्रियतम के रंग में रंगना है

जीवन की शाम हो तब तक सांस सांस से भजती रहूँ। नाथ लिखने से क्या प्यास बुझती है हे नाथ प्यास दिन दिन बढाते रहना। एक दिन विरह वेदन की तङफ तुम तक पहुंचे जिस दिन नाथ को भनक लगेगी आयेंगे प्राण प्रिय। मेरे रघुवर की बन जाऊंगी। रघुवर से मिलन होगा तब तन तन नहीं रहेगा सबकुछ परम पिता परमात्मा होगा। मै तु का भेद मिट जाएगा। जय श्री राम अनीता गर्ग

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