मीरा चरित भाग- 76

अब तक वे किले से उतर कर मालवे की ओर जाने वाले पथ पर घोड़ों को दौड़ा चुके थे।
‘ठीक फरमाते हैं खुदाबंद’- वजीर ने कहा- ‘लेकिन ये राजपूत हैं।खुदा जाने किस फौलाद से बनाकर भेजता है जमीं पर।एक औरत के लिए दुनियाँ तबाह कर दें।’
‘क्यों भूलते हो खान कि उनकी औरतें भी गैर मर्द के हाथ पड़ने के बदले जिंदा आग में जल जाना पसंद करतीं हैं।आग न मिले तो जैसे भी हो ख़ुदकुशी कर लेतीं हैं।अब ऐसी औरत के पीछे अगर दुनियाँ तबाह करनी पड़े तो कौन बड़ी बात है?’- शाह ने हँस कर कहा।
‘बजा फरमाते हैं हुजूर, इस मामले में हम मोमिन ख़ुशक़िस्मत हैं।हमारे यहाँ आदमी औरत को इतनी बंदिश नही है।’
‘बंदिश से कोई नहीं बँधता खान, यह तो मुहब्बत और दिल में उतरने की बात है।तुम जानते हो कि किसी किसी हिंदू राजा के यहाँ कोई कोई औरत खाविंद के रहते भी बेवा की जिंदगी बसर करती है, फिर भी दूसरे के यहाँ जाना पसंद नहीं करती।इतना ही नहीं खान, उस फख्त नाम के खाविंद के मर जाने पर उसकी लाश के साथ ख़ुशी ख़ुशी जिंदा जल जाती है।मुझे तो यह सब सोच कर ही दहशत होती है।हिम्मत कितनी है इनमें।’
‘हिम्मत और दिलेरी तो उनकी विरासत हैं खुदाबंद, खुदा झूठ न बुलवाये कोई कोई राजपूत तो माथा कट जाने पर भी शमशीर चलाते रहते हैं।या अल्लाह तौबा तौबा।हाँ हुजूर मैं उस मल्का का बात कर रहा था कि इस मुलाक़ात की सजा कहीं उसे न भुगतनी पड़े।हुजूर की बोली से वहाँ बैठे लोग जानगये होगें कि हम मुसलमान हैं और उस हीरे की कंठी ने हुजूर का रूतबा रौशन कर दिया होगा।हमको जल्दी से जल्दी अपनी सरहदमें पहुँच जाना चाहिए।ये लोग अपनी औरत का गैर मर्द से बोलना तो अलहदा रहा, किसी की नजर पड़ना भी गवारा नहीं करते।’
‘लेकिन खान, वहाँ तो बहुत आदमी बैठे थे?’
‘हाँ खुदाबंद, वे या तो खुदा के दीवाने फकीर थे या फिर तीरथ यात्री।एक दूसरे ही मुल्क का शाह, विधर्मी और वह भी दुश्मन, हम जैसा वहाँ एक भी न था।आप जानते होगें कि ये हिंदू अपने मंदिरों में किसी विधर्मी को नहीं घुसने देते।उनका मानना है कि इससे मंदिर नापाक हो जाता है, और कुछ न हो हमारा यह कसूर ही उनका गुस्सा बढ़ाने को काफ़ी है।’
शाह हा- हा- हा- हा- हा करके हँस पड़ा।
‘सुना तो मैनें भी है खान लेकिन खुदा तो पाक परवरदिगार है।वह या उसका घर किसी के आने जाने से नापाक कैसे हो सकता है? फिर उस मल्का ने तो ऐसा कोई रूख नहीं दिखाया।लगता है वह इन सबमें ज़्यादा समझदार है।कुछ भी हो खान, मैं बहुत खुश हूँ।आ भी जायें राजपूत हमको घेर लें और मैं जंग में मारा भी जाऊँ तब भी अफसोस न होगा।’
‘लाहौल विला कूवत, ऐसा न फरमाएँ हुजूर।अब बस, अपनी सरहद में आ ही गये हैं।’

‘कौन थे ये लोग’- शाह और वजीर के निकलते ही मंदिर में खुसर पुसर होने लगी।
‘बोली से तो मुसलमान जान पड़ते थे, किंतु पहनावा तो हिंदू था।’
‘यदि मुसलमान थे तो मंदिर भ्रष्ट कर गये।मारो विधर्मियों को, इनकी इतनी हिम्मत?’
‘पर किसी बड़े घर के लगते हैं।हीरे की कंठी देखी?’
‘बड़े घर के हैं तो क्या हमारा धर्म बिगाड़ेगें? चलो उठो पकड़ लें।अभी तो नीचे भी नहीं उतर पाये होगें।’
‘चलो, चलो’- पहले धीमे स्वर में बादमें जोर जोर से बोलने लगे लोग- ‘मारो विधर्मियों को।हमारा मंदिर भ्रष्ट कर गये।’
‘क्या हुआ’- मीरा ने ठंडे स्वर से जोशीजी से पूछा।
‘ये जो अभी मंदिर से निकले, वे मुसलमान हैं, ऐसा लगा हुकुम।अपना मंदिर भ्रष्ट कर गये।अभी दूर नहीं गये होंगे।बाँध लायें दौड़कर।’
‘क्यों क्या अपराध किया उन्होंने? आपके पास कौन सा प्रमाण है कि वे मुसलमान हैं? यदि हो भी तो क्या उन्हें भगवान ने नहीं बनाया? बहुत से हिंदू मुसलमानों के यहाँ चाकरी करते हैं इसी से उन्हीं की भाषा बोलने लग जाते हैं।बोली से कोई मुसलमान हो जाता है क्या? उनका वेश तो हिंदू है।यदि मुसलमान भी मान लें तो अपना उन्होंने बिगाड़ा ही क्या है? उन्होंने भगवान के दो नाम सुने और चले गये।रही मंदिर भ्रष्ट होने की बात सो मंदिर आपका और मेरा नहीं, भगवान का घर है।यहाँ आने वाले सभी उसके बालक हैं।जाँति पाँति मनुष्यों ने बनाई है।भगवान ने तो मनुष्य को केवल मनुष्य ही बनाया है।जाँति पाँति और धर्म का नाम लेकर लड़ना मूर्खता है।यदि वे लड़ने आये होते तो बात समझ में आती है, किंतु व्यर्थ में युद्ध के बीज न बोयें।बेटे के आने से बाप भ्रष्ट नहीं हो जाता।बैठकर शांति से ज्ञान की बातें सुनिये।’- मीरा ने गम्भीरता से सबको समझाया।
‘किंतु हुकुम, वे मालवा के सुल्तान के आदमी हो सकते हैं।गुप्तचरी करने आये हों।उनके लोग समाचार इकट्ठे करने के लिए घूम रहे होगें और वे निरापद स्थान समझ कर यहाँ बैठ गये हों।’
‘तब यह बात श्री जी के काम की है।आप उन्हें सूचना दीजिए।वे जो उचित समझेगें सो करेगें अथवा आदेश बख्शेगें।यहाँ तो सत्सँग होने दीजिए।’

विष का प्याला…..

‘जीजा आपने कुछ सुना’- महाराणा विक्रमादित्य ने उदयकुँवर बाईसा से कहा।
‘नहीं, क्या हुआ? भाभी म्हाँरा कोई नई आफत खड़ी कर दी क्या?’
‘अरे नाक कटवा दी सिसोदियों की’
‘ऐसा क्या कर दिया?’
‘यह पूछिये बाकी क्या रहा?’
‘आप फरमाये तो सही’
‘क्या कहूँ, सारंगपुर का नवाब आया था।मन्दिर में बैठकर उसने भाभी म्हाँरा के भजन सुने और बातचीत की। उसने हीरे की एक कण्ठी भेंट की।मैं तो जीजा हुकुम मुँह दिखाने के योग्य भी नहीं रहा।हे भगवान, क्या करूँ मैं? कौन से पाप किये थे हमने जो यह कुलबोरणी भाभी होकर यहाँ आई।जिस दिन से आई है, एक दिन भी ललाट पोंछ कर शांति से नहीं रह सके।एक एक करके सबका भक्षण कर गई यही।’
महाराणा को अपने प्रबंध की ढिलाई नहीं दिखाई दी कि शत्रु उनके घर में से होकर चला गया और उन्हें ज्ञात भी नहीं हुआ।ज्ञात हुआ तब जब वह अपने घर के समीप जा पहुँचा।सच है अपनी भूल किये दिखाई देती है भला? सारा क्रोध मेड़तणी जी सा पर उफन पड़ा।
उन्होंने निर्णय लिया- ‘बहुत सबर कर ली। अब या तो मैं रहूँगा या फिर मेड़तणीजीसा रहेंगी। इन्होंने तो हमारी पाग ही उछाल दी है।’
क्रमशः



By now they had dismounted from the fort and made their horses run on the road leading to Malve. ‘Khudaband is right’ – the Wazir said – ‘But these are Rajputs. God knows what kind of steel he makes and sends on the ground. Destroy the world for a woman.’ ‘Why do you forget, Khan, that their women also prefer to be burnt alive in fire instead of falling into the hands of a non-man. What’s the matter?’- Shah said with a smile. ‘Huzoor says, in this matter we believers are fortunate. We do not have so many restrictions on men and women.’ No one is bound by restrictions, Khan, it is a matter of love and getting into the heart. You know that in some Hindu king’s house, some woman lives the life of a widow even when she is a husband, yet prefers to go to another’s place. She doesn’t. Not only this, Khan, on the death of that pigeon named Khavind, happily burns alive along with his dead body. I get scared just thinking about all this. ‘Courage and courage are their heritage. The people sitting there would have come to know from the words of the master that we are Muslims and that diamond bracelet must have brightened the status of the master. We should reach our border as soon as possible. So stay aloof, don’t even bother to look at anyone.’ ‘But Khan, there were many people sitting there?’ ‘Yes Khudaband, they were either fakirs who were crazy about God or pilgrims. The king of another country, a heretic and that too an enemy, there was no one like us. They don’t allow us to enter. They believe that this makes the temple impure, and if nothing happens, this fault of ours is enough to increase their anger.’ Shah laughed ha-ha-ha-ha-ha. ‘I have heard that I am also a Khan, but God is a pure God. How can he or his house become impure due to someone’s coming and going? Then that Malka did not show any such attitude. It seems that he is more sensible in all this. Whatever happens, Khan, I am very happy. Even if the Rajputs come and surround us, I will not regret even if I die in the war. ‘ ‘Lahaul Villa Kuwat, don’t say like this sir. Now that’s it, we have come to our border.’

‘Who were these people’ – As soon as the Shah and the Wazir came out, there was a commotion in the temple. ‘The speech appeared to be a Muslim, but the dress was Hindu.’ ‘If they were Muslims, they would have corrupted the temple. Kill the heretics, do they have that much courage?’ ‘But it looks like a big house. Have you seen the diamond bracelet?’ ‘If you are from a big family, will you spoil our religion? Let’s get up and hold on. You must not have been able to get down even now.’ ‘Come on, come on’ – first in a low voice, then people started saying loudly – ‘Kill the heretics. They have corrupted our temple.’ ‘What happened’- Meera asked Joshiji in a cold voice. ‘Those who have just come out of the temple are Muslims,’ the order read. ‘Why what crime did he commit? What proof do you have that they are Muslims? If so, didn’t God create them? Many Hindus work in the homes of Muslims, because of this they start speaking their language. Does speaking make someone a Muslim? His dress is Hindu. If Muslims also accept it, then what has he done to himself? He heard two names of God and went away. Temple is not yours and mine, it is God’s house. It is foolish to fight in the name of caste and religion. If they had come to fight, it would have been understandable, but do not sow the seeds of war in vain. The father does not get corrupted by the arrival of the son. Listen to the words of.’- Meera seriously explained to everyone. ‘But Hukum, they may be men of the Sultan of Malwa. They may have come for espionage. Their men must have been roaming about to gather news and they have sat down here thinking it to be a safe place.’ ‘Then this matter is of Shriji’s use. You inform him. He will do whatever he thinks fit or will spare the orders. Let the satsang happen here.’

why drink poison

‘Brother-in-law, have you heard something’- Maharana Vikramaditya said to Udaykunwar Baisa. ‘no what happened? Sister-in-law, have you created any new trouble?’ ‘Are the noses of the Sisodias cut off’ ‘What did you do?’ ‘Ask this, what’s left?’ ‘If you say so’ ‘What can I say, the Nawab of Sarangpur had come. Sitting in the temple, he listened to Bhabhi Mhanra’s hymns and talked. He presented a diamond bracelet. I am not even able to show my brother-in-law’s face. Oh God, what should I do? What sins did we commit that this Kulborani came here as sister-in-law. From the day she came, she could not live peacefully even for a single day by wiping her forehead. She devoured everyone one by one.’ Maharana did not see the laxity of his management that the enemy passed through his house and he did not even know. He came to know when he reached near his house. All the anger boiled over on Medtani ji. He decided – ‘ I have had a lot of patience. Now either I will remain or Medtaniji will remain. They have only raised our feet. respectively

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on pinterest
Share on reddit
Share on vk
Share on tumblr
Share on mix
Share on pocket
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *