प्रीत की यह कैसी नई रीत है रसोपासना – भाग-4


प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं !… प्रेम की नदी सीधी बहती कहाँ है !

प्रेम नगरी में रोना, हँसने को कहते हैं… और हँसना यानि रोना ।

प्रेम पन्थ में “ना” यानि “हाँ”… और हाँ का मतलब “ना” ।

प्रेम कुञ्ज में प्रगाढ़ मिलन यानि विरह और विरह में मिलन की अनुभूति।

ये लीलाएं चल रही हैं निकुञ्ज में… निकुञ्ज यानि श्रीधाम वृन्दावन ।

वृन्दावन यानि ‘युग्मतत्व” की विहार स्थली… जहाँ सत्य और आनन्द मिल रहे हैं… केलि चल रही है…

कब से ?

ये प्रश्न व्यर्थ है… सृष्टी कब से ? इसका हिसाब फिर भी लगाया जा सकता है… ब्रह्मा विष्णु शंकर कब से हैं ? इसका भी हिसाब शायद कोई लगा ले… पर ये ब्रह्म और आल्हादिनी की यह प्रेम केलि कब से ?… सत्य और आनन्द की ये केलि कब से ?… इसका कोई पता नही… अनादि काल से चल ही रही है… और चलती ही रहेगी… महाप्रलय कितने हुए… ब्रह्मा विष्णु महेश कितने आये और कितने गए… पर युगल की ये प्रेम लीला अनवरत चल ही रही है ।

नही नही… अवतार काल में भी जब पृथ्वी पर श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर लीला करने गये थे… तब भी ये निकुञ्ज की लीलाएं चल ही रही थीं… ये कभी रूकती नही हैं ।

हाँ हाँ… एक बात तो सुनो… “मिले रहत मानो कबहुँ मिले ना” ।

दोनों मिले हैं… मिले ही रहते हैं… फिर भी प्यास कम नही होती ।

अद्भुत है ये प्रेम केलि इन युगल की ।

छोड़िये इन गम्भीर चर्चा को… चलिये – ध्यान में बैठते हैं…

और चलते हैं उसी नित्य निकुञ्ज में… जहाँ बहुत कुछ चल रहा है ।


श्रीधाम वृन्दावन प्रेम का एक कमल पुष्प है… उस कमल में जो पीले-पीले केशर हैं… वो सखियाँ हैं… उन केशरों में जो पराग है… वह श्री कृष्ण हैं… और उन पराग में जो मकरन्द है… वो श्रीराधारानी हैं । इस तरह दिव्य ध्यान कीजिये… आहा !

प्रातः होने में कुछ ही समय शेष है… दिव्य श्रीधाम वृन्दावन है… प्रेम महल में दोनों युगलवर शयन किये हैं…

पर ये क्या ! एकाएक श्री श्याम सुन्दर कोई सपना देख – उठे ।

आँखें उनकी मुदीं हुयी हैं… पर जोर-जोर से पुकार रहे हैं –

हे श्रीराधे ! हे प्राणेश्वरी ! हे प्रियतमें ! आप कहाँ हो ? मुझे छोड़ कर आप कहाँ गयीं ? मेरे प्राण आप में ही बसते हैं… ये जानते हुए भी आपने मुझे कैसे छोड़ दिया… हिलकियाँ छूट गयीं श्याम सुन्दर की ।

मेरे प्राण तड़फ़ रहे हैं… आप आओ… आप आओ !

बैठ गए हैं श्याम सुन्दर… उनके कमल नयन से अश्रु गिर रहे हैं…

पर जैसे ही अपने समीप में देखा… श्रीजी तो यहीं हैं… श्रीराधा रानी को अपने पास में देखकर उनके आनन्द की सीमा नही रही… अरे ! मन ही मन हँसे… अब तक जो दुःख के आँसू बह रहे थे वे आनन्दाश्रु के रूप में फिर बहने लगे थे… “मैं भी बाबरो है गयो… मेरी प्यारी… मेरी प्राण बल्लभा तो यहीं हैं” ।

अपलक देखने लगे थे… अपनी श्रीराधा रानी को ।

पर श्याम सुन्दर के नेत्रों का ताप अत्यन्त कोमलांगी श्रीराधारानी कैसे सह लेतीं… उनकी नींद खुल गयी ।

अरे ! प्यारे ! आप उठ गए ? क्या रात बीत गयी ? और हे श्याम सुन्दर ! आप बैठे क्यों हो ? फिर आपके नेत्रों से ये अश्रु ?

श्रीराधा रानी भी उठकर बैठ जाती हैं… और बड़े प्रेम से कज्जल मिश्रित श्याम सुन्दर के अश्रुओं को अपने आँचल से पोंछ देती हैं ।

हाँ… रात्रि तो बीत गयी… बड़ी जल्दी बीत गयी रात्रि !

श्रीश्याम सुन्दर श्रीजी के कपोलों को चूमते हुए बोले थे ।

मेरी राधे ! मैंने एक सपना देखा… बहुत बुरा सपना था…

मैंने सपना देखा – कि आप मुझ से दूर चली गई हो… बहुत दूर… मैं पुकारता हुआ आपके पीछे जा रहा हूँ… पर आप बस चली जा रही हो… मेरी और देखती भी नही हो…

इतना कहते हुये फिर श्याम सुन्दर अपनी श्रीजी को हृदय से लगा लेते हैं… पर… श्रीराधा रानी ये सब सुनकर हँसती हैं…

आप हँस रही हो ? मेरे हृदय की धड़कन तो देखो !

श्रीजी का हाथ लेकर अपने वक्ष से लगाते हैं श्याम सुन्दर ।

पर आप ऐसा सपना क्यों देखते हो !… आप और हम कोई अलग तो हैं नहीं… जैसे – जल और तरंग अलग नही हैं… जैसे – अग्नि और ताप अलग नही है… जैसे – दूध और उसकी सफेदी अलग नही हैं… ऐसे ही हम दोनों भी कहाँ अलग हैं ?

अच्छा बताओ ! क्या जल और तरंग को कोई अलग कर सकता है ?

श्रीराधा जी जब पूछती हैं… तब श्याम सुन्दर बड़े ही मासूमियत से अपना सिर “नही” में हिलाते हैं ।

पर मैं आपका मुखचन्द्र बिना देखे रह नही सकता… मुझे लगता है… मैं आपको देखता रहूँ… बस देखता रहूँ… पर हाँ, एक बात और… ये जो पलक हैं ना… यही विघ्न डालते हैं… ये जब गिरते हैं उस क्षण में मुझे ऐसा लगता है कि घने अन्धकार ने मुझे घेर लिया है… फिर एकाएक हिलकियों से श्याम सुन्दर रो पड़े… मेरी आपसे बस एक प्रार्थना है… प्यारी ! ये मुख चन्द्र मेरे नयनों के आगे ही रहे… बस मुझे यही चाहिये ।

पर ये क्या ! प्यारे ! ये क्या कर रहे हो आप ?

श्रीराधा जी ने हाथ पकड़ लिया श्याम सुन्दर का…

पर ये तो रसिक शिरोमणि हैं… ऐसे कहाँ मानते… चरण पकड़ लिये श्री राधा रानी के… चरणों में टप् टप् टप् आँसू गिरने लगे… हे मेरी प्राण बल्लभा श्रीराधा ! मेरी एक ही कामना है कि इन चरणारविन्द का मुझे दास बनाकर कभी छोड़ना नहीं ।

इस सेवक को अपना मान कर कभी त्यागना नहीं ।

इतना सुनते ही श्रीराधा रानी ने श्याम सुन्दर को अपने हृदय से लगा लिया… और प्रगाढ़ आलिंगन में बांध लिया ।

“पुलकि प्रिया लियें लाए हिये सों !
ढरकी जुरावनि वदन वदन की, यह छबि नित रहू लागी जिये सों !!
सिचनि सुधा भुजनि की भीचनि, निरखि नगीचनि भाव भिये सों !!
“श्रीहरिप्रिया” पोष परिपागे, अनुरागे रस दिये लिए सों !! “

शेष “रस चर्चा” कल –

🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩

🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷



Where does love walk straight! Where does the river of love flow straight!

Crying in the city of love is called laughing… and laughing means crying.

In the sect of love, “no” means “yes”… and yes means “no”

Deep meeting in Prem Kunj means feeling of meeting in separation and separation.

These pastimes are going on in Nikunj… Nikunj means Shridham Vrindavan.

Vrindavan i.e. the pilgrimage place of “Yugmatattva”… where truth and joy are meeting… Keli is walking…

since when ?

This question is futile… since when the creation? It can still be calculated… Since when is Brahma Vishnu Shankar? Someone may calculate this too… But since when this love between Brahma and Alhadini?… Since when is this love of truth and joy?… No one knows about it… It has been going on since time immemorial… and will continue to happen… Mahapralay How many have happened… how many Brahma Vishnu Mahesh have come and how many have gone… But this love leela of the couple is going on continuously.

No no… Even during the time of incarnation, when Shriradharani and Shyam had gone to perform beautiful pastimes on earth… even then these pastimes of Nikunj were going on… they never stop.

Yes yes… at least listen to one thing… “Mile rahat mano kabhun met na na”.

Both have met… they keep meeting… still the thirst does not subside.

Amazing is this love of this couple.

Leave these serious discussions… come on – let’s sit in meditation…

And let’s go to the same Nikunj everyday… where a lot is going on.

Shridham Vrindavan is a lotus flower of love… the yellow saffron in that lotus… are the friends… the pollen in those saffron… is Shri Krishna… and the nectar in that pollen… is Shriradharani. Do divine meditation like this… Aha!

There is little time left for the morning… Vrindavan is the divine Sridham… Both the couples are sleeping in the palace of love…

But what is this ! Suddenly Mr. Shyam Sundar woke up after seeing a dream.

His eyes are closed… but he is calling out loudly –

Hey Shriradhe! Hey Praneshwari! Hey dear! Where are you ? Where did you go leaving me? My life resides only in you… How did you leave me despite knowing this… Shyam Sundar’s movements were lost.

My soul is dying… you come… you come!

Shyam Sundar is sitting… tears are falling from his lotus eyes…

But as soon as he saw near him… Shreeji is right here… There was no limit to his joy seeing Shriradha Rani near him… Hey! The heart laughed… The tears of sorrow that were flowing till now started flowing again in the form of tears of joy… “Main bhi Babro hai gayo… Meri pyari… Meri Prana Ballabha toh hihi hai”.

You started looking at your Shri Radha Rani.

But how could the very tender Shriradharani bear the heat of Shyam Sundar’s eyes… She woke up.

Hey ! Dear! You woke up ? Has the night passed? And hey Shyam Sundar! why are you sitting Then these tears from your eyes?

Shriradha Rani also gets up and sits down… and with great love wipes the tears of Shyam Sundar mixed with kajal with her aanchal.

Yes… the night has passed… the night has passed very quickly!

Shree Shyam had spoken while kissing Sundar Shreeji’s cheeks.

My Radhe! I had a dream… It was a bad dream…

I dreamed – that you have gone away from me… far away… I am going after you calling… but you are just leaving… you do not even look at me…

Saying this, then Shyam Sundar hugs his Shreeji with his heart… but… Shriradha Rani laughs hearing all this…

are you laughing Look at my heartbeat!

Shyam Sundar takes Shreeji’s hand and hugs his chest.

But why do you see such a dream!… You and I are no different… like – water and waves are not different… like – fire and heat are not different… like – milk and its whiteness are not different… like this we both are. Where are they different?

Well tell! Can anyone separate water and wave?

When Shriradha ji asks… then Shyam Sundar very innocently nods his head “no”.

But I can’t live without seeing your face… I think… I keep looking at you… I just keep looking… But yes, one more thing… These are the eyelids… They create obstacles… When they fall, I feel like It seems that dense darkness has surrounded me… Then suddenly Shyam Sundar started crying… I just have one request from you… Dear! May this moon remain in front of my eyes… That’s all I want.

But what is this ! Dear! what are you doing

Shriradha ji held the hand of Shyam Sundar…

But he is a rasik Shiromani… Where do you believe like this… Holding the feet of Shri Radha Rani… Tears started falling at the feet of Shri Radha Rani… Oh my life Vallabha Shriradha! I have only one wish that this Charanarvind should never leave me as a slave.

Never leave this servant considering it as your own.

On hearing this, Shriradha Rani hugged Shyam Sundar to her heart… and tied him in a deep embrace.

“Pulki Priya Liyen Laye Heye Son! Dharki Juravani Vadan Vadan Ki, Yah Chhabi Nit Rahu Laagi Jiye Son!! Sichani sudha bhujani ki bhichani, nirkhi nagichani bhaav bhiye son!! “Sriharipriya” posh paripage, anuraage ras diye liye son!! “

The rest of “Juice Discussion” tomorrow –

🚩Jai Shri Radhe Krishna🚩

🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷

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