नंद के आनंद भयो कृष्ण जन्माष्टमी

आज नंदोत्सव है । नंदोत्सव अर्थात कल रात्रि में भगवान श्री कृष्ण नर रूप में पृथ्वी तल पर प्रकट हुए और नंद एवं यशोदा को तीसरे पनमें इस दिव्य पुत्र की प्राप्ति हुई ।

इसलिए आनंद मनाया गया । दासाभास ध्यान से देखे तो श्रीमद्भागवत में जब कृष्ण का जन्म हुआ तब कहा गया

‘जाताह्लादो महामना’ अर्थात महान आनंद उत्पन्न हुआ । अर्थात श्रीकृष्ण को आनंद के नाम से कहा गया ।

नंद भी जो हैं वह भी आनंद ही हैं । जो आनंद प्रदान करें सभी को वह नंद है ।
जो सभी को यश प्रदान करें, वह यशोदा है

रही श्री कृष्ण की बात तो दासाभास सहित हम आप सभी जानते हैं कि वे सच्चिदानंद घन हैं ।

सच्चिदानंद में सत अर्थात सदैव रहने वाले । अभी उन्होंने नर रूप में जन्म लिया । कभी वह नहीं थे या कभी वह नहीं रहेंगे ऐसा नहीं है वह अनादि हैं । सदा सदा से हैं और सदा सदा रहेंगे।

चित् माने चैतन्य ।
चैतन्य का अर्थ कि वह जड़ नहीं है । जागृत हैं । एक्टिव है । चलते फिरते हैं । क्रियाशील हैं । कार्य करते है । वृक्ष की भांति या पत्थर की भांति जड़ नहीं है ।

और तीसरा है आनंदघन
घन कहते हैं जो ऊपर नीचे दाएं बाएं चारों तरफ से आनंद ही आनंद से ओतप्रोत हो वह आनंदघन कहलाता है

जैसे एक बर्फ की सिल्ली । उस में कहीं से भी दासाभास या आप कांटा मारो तो बर्फ ही निकलती है । इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भी आनंद स्वरुप हैं । आनंदमय विग्रह हैं । वह आनंदमय विग्रह उस आनंद स्वरूप नंद के घर में प्रकट हुआ और आनंद को आह्लाद भी कहते हैं ।

सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ भगवान की जो शक्ति है वह भी है आह्लादिनी शक्ति श्री राधा ।

दूसरी बात यह भी है जब आनंद है, तो कृष्ण है आनंद की मात्रा के अनुसार ही कृष्ण का आविर्भाव है ।

जिस घर में जिस वर में
जिस दिल में जिस हृदय में
जिस मन में जिस बुद्धि में
जिस देश में जिस परिवेश में
जिस आवेश में जितना आनंद है,
निश्चित है कि वहां कृष्ण है

और आज तो दासाभास के ठाकुर के घर में नंद उत्सव में आनंद ही आनंद है । आनंद घन का आनंद उत्सव वो भी नंद के आंगन में है तो आनंद ही आनंद है ।

आज हम भी सब कुछ भूल कर उस आनंद में ऐसे डूबे के आनंद में आनंद की प्राप्ति । आनंद का दर्शन । आनंद का परशन और आनंद ही आनंद ।

नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की इसलिए यहां भी नंद के कृष्ण भए ऐसा नहीं कहा

‘नंद के आनंद भयो’

कृष्ण आनंद घन विग्रह और जहां आनंद नहीं वहां कृष्ण नहीं । अतः सदा प्रयास करें कि हमारे आस-पास, हमारे चेहरे पर, आपके, हमारे, दासाभास के, सबके घर में आनंद का वास हो ।

समस्त वैष्णव जन को मेरा सादर प्रणाम
जय श्री राधे ।



Today is Nandotsav. Nandotsav i.e. last night, Lord Shri Krishna appeared on earth in male form and Nand and Yashoda were blessed with this divine son in their third birth.

Therefore there was joy. Dasabhas If you look carefully, in Srimad Bhagwat, when Krishna was born, it was said that

‘Jatahlado Mahamana’ meaning great joy arose. That is, Shri Krishna was called by the name of Anand.

Nand is also Anand. The one who provides happiness to everyone is Nand. The one who bestows fame on all is Yashoda.

As far as Shri Krishna is concerned, we all including Dasabhas know that he is Sachchidanand Ghan.

Sat means one who always remains in Sachchidananda. Now he took birth in male form. It is not that he never existed or that he will never exist. He is eternal. Always have been and will always be.

Chit means consciousness. Consciousness means that it is not inert. Are awake. Is active. Let’s move around. Are active. Let’s work. It is rootless like a tree or like a stone.

And the third one is Anandghan The one who is filled with joy from top, bottom, right and left all around is called Anandghan.

Like a block of ice. If you hit Dasabhas or a thorn in it from anywhere, only ice comes out. Similarly, Lord Shri Krishna is also an embodiment of happiness. There are blissful idols. That blissful idol appeared in the house of that blissful form of Nand and bliss is also called Ahalaad.

The power of the supreme best God is also the Ahladini Shakti Shri Radha.

Secondly, when there is joy, there is Krishna. The appearance of Krishna depends on the amount of joy.

In which house in which groom In which heart in which heart In which mind and in which intellect In which country and environment The joy in which there is passion, sure krishna is there

And today there is only joy in the Nand Utsav in the house of Thakur of Dasabhas. The joyous celebration of Anand Ghan is also in the courtyard of Nand, so joy is joy.

Today we too forget everything and immerse ourselves in that bliss and attain bliss in bliss. Vision of joy. The question of happiness and happiness is happiness.

Nand ke Anand Bhayo Jai Kanhaiya Lal ki, hence it is not said here also that Nand ke Krishna is there.

‘Nand ke Anand Bhayo’

Krishna is the embodiment of Anand Ghan and where there is no Anand, there is no Krishna. Therefore, always try to ensure that happiness resides around us, on our faces, in yours, ours, Dasbhas’s and everyone’s house.

My regards to all Vaishnav people Jai Shri Radhe .

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