प्रभु प्रेम के भाव

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जहाँ प्रेम है वहां प्रभु प्रेम की खोज प्रारम्भ होती है। वह किरया कर्म में परमात्मा को खोजता है। हे प्रभु प्राण नाथ हे स्वामी ये संसार तुम्हारी रचना है। इसके कण कण में तुम समाए हुए हो ।मै जिस चीज को स्पर्श करता हूं मुझे उस में तुम्हारा स्पर्श महसुस होता है। और मै प्रेम के गहरे सागर में डूब जाती हूं। किरया और कर्म चल रहे हैं। पर उसमें मै नहीं हूं मै अपने प्रभु के चिन्तन में खो जाती हूं। परमात्मा आकर सहायक बन कर कर्म करवा जाते हैं। परम प्रकाश रुप अपने में मुझे समेट लेते हैं।

भगवान जब अपनी ओर खींचते है। तब दिल देखकर पढकर लिखकर भी तृप्त नहीं होता हैं। दिल सबमें परम पिता परमात्मा को ढुंढता है। ये प्रभु की कैसी लीला है जो कण कण में समाया है ।वहीं खोज करवाता है।

भगवान के जब पास जाओ तो दर्द की न

कोई बात नहीं कहो। 

नैनो से नीर बहा के मिलन की बात करलु मै। कुछ अपने दिल की कहु कुछ प्रभु की सुन लु मै।
भगवान को भजते हुए भोग लगाते हुए आरती करते हुए धीरे-धीरे दिल में बिठा ले हम, हमे जिस दिन भगवान दिल में महसुस होगें ।हमारी नांव पार हो जाएगी। हम जीवन का नया अध्याय पढेगे। हर कार्य में कुशलता समा जाएंगी। कर्तव्य परायण बन जाएगे ।जीवन में समर्पित भाव प्रवेश कर जाएगा प्रेम आंखों से टपकेगा।
आंखे भरी हुई में मुस्कराने का मजा ही ओर हैं। जब भगवान के अहसास होते हैं तब नयनों में नीर भी होता है और आनंदित भी होते हैं जय श्री राम अनीता गर्ग

When God draws you. Then after seeing the heart, even after reading and writing, it is not satisfied. The heart searches for the Supreme Father, the Supreme Soul in all. What kind of leela of GOD is this, which is contained in every particle. It makes the search done there.

When you go near God, there is no pain

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