श्री हरि के वाहन गरुड़जी की रोचक कथा!

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गरुड़ देव के ये रहस्य आपको आश्चर्यचकित कर देंगे! आखिरकार भगवान विष्णु के वाहन गरूढ़ का क्या रहस्य है?

क्यों हिन्दू धर्म में उनको विशेष महत्व दिया जाता है, क्या है उनके जन्म का रहस्य और कैसे वह एक पक्षी से भगवान बन गए ?

गरूड़ भगवान के बारे में सभी जानते होंगे। यह भगवान विष्णु का वाहन हैं। भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है। गरूड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण पक्षी माना गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गरूड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख वाला) कहा गया है। जातक कथाओं में भी गरूड़ के बारे में कई कहानियां हैं।

माना जाता है कि गरूड़ की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश और व्यक्तियों को इधर से उधर ले जाना होता था। कहते हैं कि यह इतना विशालकाय पक्षी होता था जो कि अपनी चोंच से हाथी को उठाकर उड़ जाता था।

गरूड़ जैसे ही दो पक्षी रामायण काल में भी थे जिन्हें जटायु और सम्पाती कहा जाता था। ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में विचरण करते रहते थे। इनके लिए दूरियों का कोई महत्व नहीं था। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे इसीलिए यहां एक मंदिर है।

पक्षियों में गरुड़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गिद्ध और गरुड़ में फर्क होता है। संपूर्ण भारत में गरुड़ का ज्यादा प्रचार और प्रसार किसलिए है यह जानना जरूरी है। गरुड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। रामायण में तो गरुड़ का सबसे महत्वपूर्ण पात्र है।

आखिरकार भगवान विष्णु के वाहन गरूढ़ का क्या रहस्य है?

पक्षी तीर्थ :चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे ‘पक्षी तीर्थ’ कहा जाता है। यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है।

सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित रहते हैं। वहां के पुजारी के मुताबिक सतयुग में ब्रह्मा के 8 मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से 2 सतयुग के अंत में, 2 त्रेता के अंत में, 2 द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। कहा जाता है कि अब जो 2 बचे हैं, वे कलयुग के अंत में मुक्त होंगे।

गरुड़ हैं देव पक्षी :गरूड़ का जन्म सतयुग में हुआ था, लेकिन वे त्रेता और द्वापर में भी देखे गए थे। दक्ष प्रजापति की विनिता या विनता नामक कन्या का विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ। विनिता ने प्रसव के दौरान दो अंडे दिए। एक से अरुण का और दूसरे से गरुढ़ का जन्म हुआ। अरुण तो सूर्य के रथ के सारथी बन गए तो गरुड़ ने भगवान विष्णु का वाहन होना स्वीकार किया।

सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य-मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लंबी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आए, किंतु सम्पाती उड़ते ही गए।

सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वे समुद्र तट पर गिरकर चेतनाशून्य हो गए। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।

सतयुग में देवताओं से युद्ध :पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। कहते हैं कि उन्होंने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश छीन लिया था। दरअस्ल, ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी।

ये दोनों ही बहने थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी। दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। वनिता ने दो बलशाली पुत्र मांगे जबकि कद्रू ने हजार सर्प पुत्र रूप में मांगे जो कि अंडे के रूप में जन्म लेने वाले थे। सर्प होने के कारण कद्रू के हजार बेटे अंडे से उत्पन्न हुए और अपनी मां के कहे अनुसार काम करने लगे।

दोनों बहनों में शर्त लग गई थी कि जिसके पुत्र बलशाली होंगे हारने वाले को उसकी दासता स्वीकार करनी होगी। इधर सर्प ने जो जन्म ले लिया था लेकिन वनिता के अंडों से अभी कोई पुत्र नहीं निकला था। इसी जल्दबाजी में वनिता ने एक अंडे को पकने से पहले ही फोड़ दिया। अंडे से अर्धविकसित बच्चा निकला जिसका ऊपर का शरीर तो इंसानों जैसा था लेकिन नीचे का शरीर अर्धपक्व था। इसका नाम अरुण था।

अरुण ने अपनी मां से कहा कि ‘पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया। इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा। अगर दूसरे अंडे में से निकला उनका पुत्र उन्हें इस श्राप से मुक्त ना करवा सका तो वह आजीवन दासी बनकर रहेंगी।’

भय से विनता ने दूसरा अंडा नहीं फोड़ा और पुत्र के शाप देने के कारण शर्त हार गई और अपनी छोटी बहन की दासी बनकर रहने लगी।

बहुत लंबे काल के बाद दूसरा अंडा फूटा और उसमें से विशालकाय गरुड़ निकाला जिसका मुख पक्षी की तरह और बाकी शरीर इंसानों की तरह था। हालांकि उनकी पसलियों से जुड़े उनके विशालकाय पंक्ष भी थे। जब गरुड़ को यह पता चला कि उनकी माता तो उनकी ही बहन की दासी है और क्यों है यह भी पता चला, तो उन्होंने अपनी मौसी और सर्पों से इस दासत्व से मुक्ति के लिए उन्होंने शर्त पूछी।

सर्पो ने विनता की दासता की मुक्ति के लिए अमृत मंथन ने निकला अमृत मांग। अमृत लेने के लिए गरुड़ स्वर्ग लोक की तरफ तुरंत निकल पड़े। देवताओं ने अमृत की सुरक्षा के लिए तीन चरणों की सुरक्षा कर रखी थी, पहले चरण में आग की बड़े परदे बिछा ररखे थे। दूसरे में घातक हथियारों की आपस में घर्षण करती दीवार थी और अंत में दो विषैले सर्पो का पहरा।

वहां तक भी पहुंचाने से पहले देवताओं से मुकाबला करना था। गरुड़ सब से भीड़ गए और देवताओं को बिखेर दिया। तब गरुड़ ने कई नदियों का जल मुख में ले पहले चरण की आग को बुझा दिया, अगले पथ में गरुड़ ने अपना रूप इतना छोटा कर लिया के कोई भी हथियार उनका कुछ न बिगाड़ सका और सांपों को अपने दोनों पंजो में पकड़कर उन्होंने अपने मुंह से अमृत कलश उठा लिया और धरती की ओर चल पड़े।

लेकिन तभी रास्ते में भगवान विष्णु प्रकट हुए और गरुड़ के मुंह में अमृत कलश होने के बाद भी उसके प्रति मन में लालच न होने से खुश होकर गरुड़ को वरदान दिया की वो आजीवन अमर हो जाएंगे। तब गरुड़ ने भी भगवान को एक वरदान मांगने के लिए बोला तो भगवान ने उन्हें अपनी सवारी बनने का वरदान मांगा। इंद्र ने भी गरुड़ को वरदान दिया की वो सांपों को भोजन रूप में खा सकेगा इस पर गरुड़ ने भी अमृत सकुशल वापसी का वादा किया।

अंत में गरुड़ ने सर्पों को अमृत सौंप दिया और भूमि पर रख कर कहा कि यह रहा अमृत कलश। मैंने यहां इसे लाने का अपना वादा पूरी किया और अब यह आपके सुपूर्द हुआ, लेकिन इसे पीने के आप सभी स्नान करें तो अच्छा होगा।

जब वे सभी सर्प स्नान करने गए तभी वहां अचानक से भगवान इंद्र पहुंचे और अमृत कलश को वापस ले गए। लेकिन कुछ बूंदे भूमि पर गिर गई जो घांस पर ठहर गई थी। सर्प उन बूंदों पर झपट पड़े, लेकिन उनके हाथ कुछ न लगा। इस तरह गरुड़ की शर्त भी पूरी हो गई और सर्पों को अमृत भी नहीं मिला।

त्रेता युग में :जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया था।

गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी नाम के एक कौवे के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।

लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गरूड़ को सुना दी थी। इससे पूर्व हनुमानजी ने संपूर्ण रामायण पाठ लिखकर समुद्र में फेंक दी थी। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था।

हनुमानजी ने तोड़ दिया था गरुड़ का अभिमान :

भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है। विष्णु ने ही राम के रूप में अवतार लिया और विष्णु ने ही श्रीकृष्ण के रूप में। श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थीं- रुक्मणि, जाम्बवंती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रबिंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा। इसमें से सत्यभामा को अपनी सुंदरता और महारानी होने का घमंड हो चला था तो दूसरी ओर सुदर्शन चक्र खुद को सबसे शक्तिशाली समझता था और विष्णु वाहन गरूड़ को भी अपने सबसे तेज उड़ान भरने का घमंड था।

एक दिन श्रीकृष्ण अपनी द्वारिका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे और उनके निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी उनकी सेवा में विराजमान थे। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा- हे प्रभु, आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं?

भगवान सत्यभामा की बातों का जवाब देते उससे पहले ही गरूड़ ने कहा- भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। तभी सुदर्शन से भी रहा नहीं गया और वह भी बोल उठा कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है? द्वारकाधीश समझ गए कि तीनों में अभिमान आ गया है। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे और सोचने लगे कि इनका अहंकार कैसे नष्ट किया जाए, तभी उनको एक युक्ति सूझी…

भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़ से कहा कि हे गरूड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए।

इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी, आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया।

तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई भी प्रवेश न करने पाए। सुदर्शन चक्र ने कहा, जो आज्ञा भगवान और भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गया।

गरूड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए पधारे हैं। आपको बुला लाने की आज्ञा है। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।

हनुमान ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए बंधु, मैं आता हूं। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा। खैर मुझे क्या कभी भी पहुंचे, मेरा कार्य तो पूरा हो गया। मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़ चले।

लेकिन यह क्या? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम के रूप में श्रीकृष्ण ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?

हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु आपसे मिलने से मुझे क्या कोई रोक सकता है? इस चक्र ने रोकने का तनिक प्रयास किया था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे।

अंत में हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया, हे प्रभु! मैं आपको तो पहचानता हूं आप ही श्रीकृष्ण के रूप में मेरे राम हैं, लेकिन आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है।

अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़ तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए। भगवान ने अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त हनुमान द्वारा ही दूर किया। अद्भुत लीला है प्रभु की।

गरूड़ घंटी का महत्व है :मंदिर के द्वार पर और विशेष स्थानों पर घंटी या घंटे लगाने का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। यह घंटे या घंटियां 4 प्रकार की होती हैं:- 1.गरूड़ घंटी, 2.द्वार घंटी, 3.हाथ घंटी और 4.घंटा।

  1. गरूड़ घंटी :गरूड़ घंटी छोटी-सी होती है जिसे एक हाथ से बजाया जा सकता है।
  2. द्वार घंटी :यह द्वार पर लटकी होती है। यह बड़ी और छोटी दोनों ही आकार की होती है।
  3. हाथ घंटी: पीतल की ठोस एक गोल प्लेट की तरह होती है जिसको लकड़ी के एक गद्दे से ठोककर बजाते हैं।
  4. घंटा :यह बहुत बड़ा होता है। कम से कम 5 फुट लंबा और चौड़ा। इसको बजाने के बाद आवाज कई किलोमीटर तक चली जाती है।

हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख घरों में आपको गरूढ़ घंटी मिल जाएगी। हिन्दू और जैन घरों में तो यह विशेष तौर पर गरूड़ के आकार की ही होती है। छोटी और बड़ी सभी आकार की यह घंटी मिल जाएगी।

गरूड़ ध्वज :महाभारत में गरूड़ ध्वज था। प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है।

गरुड़ भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाने वाले गुप्त शासकों का प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही था। कर्नाटक के होयसल शासकों का भी प्रतीक गरुड़ था। गरुड़ इंडोनेशिया, थाईलैंड और मंगोलिया आदि में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है। इंडोनेसिया का राष्ट्रिय प्रतीक गरुड़ है। वहां की राष्ट्रिय एयरलाइन्स का नाम भी गरुड़ है। इंडोनेशिया की सेनाएं संयुक्त राष्ट्र मिशन पर गरुड़ नाम से जाती है। इंडोनेशिया पहले एक हिन्दू राष्ट्र ही था। थाईलैंड का शाही परिवार भी प्रतीक के रूप में गरुड़ का प्रयोग करता है। थाईलैंड के कई बौद्ध मंदिर में गरुड़ की मूर्तियाँ और चित्र बने हैं। मंगोलिया की राजधानी उलनबटोर का प्रतीक गरुड़ है।

गरूड़ पुराण :गरूड़ नाम से एक व्रत भी है। गरूड़ नाम से एक पुराण भी है। गरुण पुराण में, मृत्यु के पहले और बाद की स्थिति के बारे में बताया गया है। हिन्दू धर्मानुसार जब किसी के घर में किसी की मौत हो जाती है तो गरूड़ पुराण का पाठ रखा जाता है। गरूड़ पुराण में उन्नीस हजार श्लोक कहे जाते हैं, किन्तु वर्तमान समय में कुल सात हजार श्लोक ही उपलब्ध हैं।

गरूड़ पुराण में ज्ञान, धर्म, नीति, रहस्य, व्यावहारिक जीवन, आत्म, स्वर्ग, नर्क और अन्य लोकों का वर्णन मिलता है। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिए अनेक लौकिक और पारलौकिक फलों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आयुर्वेद, नीतिसार आदि विषयों के वर्णनके साथ मृत जीव के अन्तिम समय में किए जाने वाले कृत्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है।



These secrets of Garuda Dev will amaze you! After all, what is the secret of Garuda, the vehicle of Lord Vishnu?

Why is he given special importance in Hinduism, what is the secret of his birth and how he became a god from a bird?

Everyone would know about Lord Garuda. It is the vehicle of Lord Vishnu. Lord Garuda is also known by the names Vinayaka, Garutmat, Tarakshaya, Vainteya, Nagantaka, Vishnuratha, Khageshwar, Suparna and Pannagashan. Garuda is considered an important bird in Hinduism as well as Buddhism. According to Buddhist texts, Garuda is called Suparna (with good wings). There are many stories about Garuda in the Jataka tales as well.

It is believed that there was a species of Garuda, which was considered intelligent and its job was to carry messages and people from here to there. It is said that it was such a huge bird that it used to lift the elephant with its beak and fly away.

Like Garuda, there were two birds in the Ramayana period also called Jatayu and Sampati. Both of them also used to roam in the Dandakaranya area. Distance did not matter to them. According to local belief, there was a war between Ravana and Jatayu in the sky of Dandakaranya and some parts of Jatayu had fallen in Dandakaranya, hence there is a temple here.

Garuda is considered the best among birds. It is intelligent and intelligent as well as has the ability to fly at high speed. There is a difference between a vulture and an eagle. It is important to know why Garuda is being promoted and spread all over India. There are many stories about Garuda in the Puranas. Garuda is the most important character in Ramayana.

After all, what is the secret of Garuda, the vehicle of Lord Vishnu?

Bird Teerth : There is a pilgrimage center 60 km from Chennai which is called ‘Pakshi Teerth’. This shrine is on top of the Vedagiri mountain. For many centuries, the Garuda pair descends from the distant sky at midday and then returns to the sky after receiving the food given by the temple priest.

Hundreds of people are already present there to see him. According to the priest there, 8 Manasputras of Brahma had become Garuda due to the curse of Shiva in Satyuga. 2 of them have been freed from the curse at the end of Satyuga, 2 at the end of Treta, 2 at the end of Dwapar. It is said that the 2 who are left now will be free at the end of Kali Yuga.

Garuda is a god bird: Garuda was born in Satyuga, but he was also seen in Treta and Dwapar. Daksha Prajapati’s daughter Vinita or Vinata was married to Kashyap Rishi. Vinita laid two eggs during childbirth. Arun was born from one and Garuda was born from the other. When Arun became the charioteer of Surya’s chariot, Garuda accepted to be the vehicle of Lord Vishnu.

Sampati and Jatayu were the sons of Arun. In childhood, Sampati and Jatayu took a long flight with the aim of touching the solar system. Distraught by the unbearable brilliance of the sun, Jatayu returned from the middle, but Sampati kept flying.

On approaching the Sun, Sampati’s wings were burnt by the heat of the Sun and he fell unconscious on the beach. A sage named Chandrama took pity on him and treated him and blessed his wings to freeze again by the sight of the monkeys searching for Shri Sita in Treta.

War with the gods in Satyuga: Many stories are described in the Puranas about the might of Lord Garuda. It is said that after fighting with the gods, he snatched the nectar from them. In fact, the sage Kashyap had many wives, two of whom were Vanitha and Kadru.

These two were sisters, who were jealous of each other. Both did not have sons, so husband Kashyap gave both of them a boon for a son. Vanitha asked for two powerful sons while Kadru asked for thousand snake sons who were to be born in the form of eggs. Being a snake, thousand sons of Kadru were born from eggs and started working according to the instructions of their mother.

There was a condition between the two sisters that the one whose son would be strong, the loser would have to accept his servitude. Here the snake had taken birth but no son had yet emerged from the eggs of Vanitha. In this haste, Vanitha broke an egg before it was cooked. A semi-developed child emerged from the egg, whose upper body was similar to that of humans, but the lower body was half-mature. His name was Arun.

Arun told his mother that even after the father’s advice, you lost patience and did not allow my body to expand. So I curse you that you will have to spend your life as a servant. If her son who came out of the second egg could not free her from this curse, then she would remain as a slave for life.’

Out of fear, Vinata did not break the second egg and due to the curse of the son, she lost the condition and started living as a maidservant of her younger sister.

After a very long time, the second egg broke and took out a giant eagle, whose face was like a bird and the rest of the body was like that of a human. Although they also had giant feathers attached to their ribs. When Garuda came to know that his mother was his sister’s maidservant and why he also came to know, he asked his aunt and snakes for the condition to get rid of this slavery.

For the emancipation of the servitude of Vinata, the snake churned out Amrit Manthan asking for nectar. To take the nectar, Garuda immediately left for the heavenly world. For the protection of the nectar, the deities had protected three steps, in the first stage, large screens of fire were laid. In the second there was a wall of friction between deadly weapons and finally two venomous snakes were guarded.

Before reaching there too, he had to compete with the gods. Garuda got crowded and scattered the deities. Then Garuda took the water of many rivers in his mouth and extinguished the fire of the first stage, in the next path Garuda reduced his form so much that no weapon could harm him and holding the snakes in both his paws, he blew it with his mouth. Picked up the nectar urn and walked towards the earth.

But then Lord Vishnu appeared on the way and even after having a pot of nectar in Garuda’s mouth, being happy that there was no greed in his mind, he gave a boon to Garuda that he would become immortal for life. Then Garuda also asked God to ask for a boon, then God asked him for a boon to be his rider. Indra also gave a boon to Garuda that he would be able to eat snakes in the form of food, on which Garuda also promised the safe return of nectar.

In the end, Garuda handed over the nectar to the snakes and placed it on the ground and said that this was the nectar urn. I fulfilled my promise to bring it here and now it is handed over to you, but it would be better if you all take a bath after drinking it.

When all the snakes went to take a bath, suddenly Lord Indra arrived there and took back the nectar urn. But some drops fell on the ground which had stayed on the grass. The snake pounced on those drops, but nothing touched them. In this way the condition of Garuda was also fulfilled and the snakes did not even get nectar.

In Treta Yuga: When Ravana’s son Meghnath tied Shriram to Nagpasha while fighting with Shriram, then Garuda, at the behest of Devarshi Narada, freed Shri Ram from the bondage of Nagpasha by eating all the serpents of Nagpasha. Garuda had doubts that Shri Ram was God after Lord Rama was tied in this way.

To remove Garuda’s doubts, Devarshi Narada sends him to Brahmaji. Brahmaji sends them to Shankarji. Lord Shankar also sent Garuda to a crow named Kakbhushundiji to clear his doubts. In the end Kakbhushundiji cleared Garuda’s doubts by narrating the holy story of Rama’s character.

Kakbhushundi became a crow due to the curse of Rishi Lomash. Rishi Lomash blessed him with Rama Mantra and the boon of euthanasia to get rid of the curse. He lived his entire life as a crow. Even before Valmiki, Kakbhushundi had narrated the Ramayana to Garuda. Earlier, Hanumanji had written the entire Ramayana text and thrown it into the sea. Valmiki was a contemporary of Shri Ram and wrote the Ramayana when Rama was coronated after Ravana’s slaying.

Hanumanji had broken the pride of Garuda:

Lord Krishna is considered an incarnation of Vishnu. Vishnu incarnated as Rama and Vishnu as Sri Krishna. Shri Krishna had 8 wives – Rukmani, Jambavanti, Satyabhama, Kalindi, Mitrabinda, Satya, Bhadra and Lakshmana. Out of this, Satyabhama was proud of her beauty and being a queen, on the other hand Sudarshan Chakra considered himself to be the most powerful and Vishnu vehicle Garuda was also proud of his fastest flight.

One day, Shri Krishna was sitting on the throne with Queen Satyabhama in his Dwarka, and Garuda and Sudarshan Chakra were also seated near him in his service. In a matter of words, Queen Satyabhama asked in a sarcastic tone – Oh Lord, you had incarnated as Rama in Tretayuga, Sita was your wife. Was she more beautiful than me?

Even before answering the words of Lord Satyabhama, Garuda said – Lord, can anyone in the world fly faster than me. Then Sudarshan could not stay away and he also said that God, I have given you victory in big wars. Is there anyone more powerful than me in the world? Dwarkadhish understood that pride has come in all three. Lord started smiling slowly and started thinking how to destroy his ego, only then he came up with a trick…

God was smiling softly. He was knowing that these three of his devotees had become egoistic and the time had come for their ego to be destroyed. Thinking so, he said to Garuda that O Garuda! You go to Hanuman and say that Lord Rama is waiting for him along with Mother Sita. Garuda went to fetch Hanuman with the permission of the Lord.

Here Shri Krishna told Satyabhama that Goddess, you should dress up as Sita and Dwarkadhish himself took the form of Rama.

Then Shri Krishna ordered Sudarshan Chakra and said that you should guard the entrance of the palace and keep in mind that no one should enter the palace without my permission. Sudarshana Chakra said, the chakra was stationed at the entrance of the palace after receiving the permission of the Lord and the Lord.

Garuda reached Hanuman and said that hey monkey! Lord Rama along with Mother Sita has come to meet you in Dwarka. You are ordered to call. You go with me I will take you there on my back soon.

Hanuman humbly said to Garuda, you come brother, I will come. Garuda thought, I do not know when this old monkey will reach. Well, whenever I reach, my work is done. I walk to God. Thinking this, Garuda hurriedly flew towards Dwarka.

But what is this? Arriving in the palace, Garuda sees that Hanuman is already sitting in front of the Lord in the palace before him. Garuda’s head bowed in shame. Then Shri Krishna in the form of Shri Ram said to Hanuman that how did you enter the palace without permission, the son of Pawan? Didn’t someone stop you at the entrance?

With folded hands, Hanuman, bowing his head, took out the Sudarshan Chakra from his mouth and placed it in front of the Lord. Hanuman said that Lord, can anyone stop me from meeting you? This chakra had made every effort to stop, so keeping it in my mouth, I came to meet you. I’m sorry. God smiled softly.

In the end, with folded hands, Hanuman asked Shri Ram, Oh Lord! I know you, you are my Rama in the form of Shri Krishna, but today you have given so much respect to which maid in place of Mother Sita that she is sitting on the throne with you.

Now it was the turn of Queen Satyabhama to dissolve her ego. He had an ego of beauty, which was shattered in an instant. The pride of Queen Satyabhama, Sudarshan Chakra and Garuda was shattered. They were understanding the Leela of God. Tears started flowing from their eyes and they bowed down at the feet of the Lord. God removed the ego of his devotees only through his devotee Hanuman. Wonderful Leela of the Lord.

Significance of Garuda bell: The practice of putting bells or bells at the entrance of the temple and at special places has been there since ancient times. These bells or bells are of 4 types:- 1. Garuda bell, 2. Door bell, 3. Hand bell and 4. Ghanta. Garuda bell : Garuda bell is small which can be played with one hand. Door bell : It hangs on the door. It is both big and small in size. Hand bell: A brass solid is like a round plate, which is played by tapping it with a wooden mattress. Hour: It’s huge. At least 5 feet tall and wide. After playing it, the sound goes for several kilometers.

In Hindu, Buddhist, Jain and Sikh homes, you will find the garudha bell. In Hindu and Jain houses, it is specially shaped like Garuda. This bell of all sizes small and big will be available.

Garuda Flag : There was Garuda flag in Mahabharata. On the one hand, Garuda, and on the other hand, the idol of Hanumanji has been placed at the gates of ancient temples. The Garuda bell in the temple kept in the house and the Garuda flag on the top of the temple.

Garuda is the religious of India and the national bird of America. Garuda was the emblem of the Gupta rulers in what is known as the Golden Age in the history of India. The Hoysala rulers of Karnataka also had a symbol of Garuda. Garuda is also popular as a cultural symbol in Indonesia, Thailand and Mongolia etc. The national emblem of Indonesia is Garuda. The name of the national airlines there is also Garuda. Indonesian forces go by the name Garuda on the United Nations Mission. Indonesia was earlier a Hindu nation. The royal family of Thailand also uses the Garuda as a symbol. Garuda statues and images are made in many Buddhist temples in Thailand. The Garuda is the symbol of Ulaanbaatar, the capital of Mongolia.

Garuda Purana: There is also a fast by the name of Garuda. There is also a Purana by the name of Garuda. In Garuna Purana, the situation before and after death is told. According to Hindu religion, when someone dies in someone’s house, then the text of Garuda Purana is kept. Nineteen thousand verses are said in Garuda Purana, but at present only seven thousand verses are available.

Garuda Purana describes knowledge, religion, policy, mystery, practical life, self, heaven, hell and other worlds. In this, with the glory of devotion, knowledge, detachment, virtue, selfless action, many cosmic and transcendental fruits have been described to induce all the common people in auspicious deeds like sacrifice, charity, tapa, pilgrimage etc. Apart from this, along with the description of subjects like Ayurveda, Nitisar etc., the actions to be performed in the last time of the dead soul have been described in detail.

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