भज ले श्रीहरि का नाम “

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क्या तुम नहीं देखते कि आधी आयु तो नींद से ही नष्ट हो जाती है??? और कुछ आयु भोजन आदि में समाप्त हो जाती है ।

आयु का कुछ भाग बचपन में , कुछ विषय – भोगों में
और कुछ बुढ़ापे में व्यर्थ बीत जाता है । फिर तुम धर्म का आचरण कब करोगे ?

बचपन और बुढ़ापे में भगवान की आराधना नहीं हो सकती , अत : अहङ्कार छोड़कर युवावस्था में ही धर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये ।

यह शरीर मृत्यु का निवास स्थान और आपत्तियों का सबसे बड़ा अड्डा है । शरीर रोगों का घर है । यह मल आदि से सदा दूषित रहता है । फिर मनुष्य इसे सदा रहने वाला समझकर व्यर्थ पाप क्यों करते हैं ??

यह संसार असार है । इसमें नाना प्रकारके दुःख भरे हुए हैं । निश्चय ही यह मृत्यु से व्यापत है , अतः इस पर विश्वास नहीं करना चाहिये । इसलिये सुनो , मैं यह सत्य कहता हूँ – देह बन्धन की निवृत्ति के लिये भगवान् विष्णु की ही पूजा करनी चाहिये ।

यह स्थावर जंगमरूप जगत् केवल भावनामय है । और बिजलीके समान चञ्चल है । अत : इसकी ओर से विरक्त होकर भगवान् जनार्दन का भजन करो ।

यदि मुक्ति चाहते हो तो सच्चिदानन्दस्वरूप परमदेव भगवान् नारायण का सम्पूर्ण चित्त से भजन करो ।

जो भक्त भगवान् विष्णु के मन्दिर में दर्शन के लिये जाते हैं । उन्हीं हाथों को सफल समझना चाहिये ।।

जो भगवान् विष्णु की पूजा में तत्पर होते हैं । पुरुषों के उन्हीं नेत्रों को पूर्णतः सफल जानना चाहिये , जो भगवान् जनार्दन का दर्शन करते हैं ।

साधुपुरुषों ने उसी जिह्वा को सफल बताया है , जो निरन्तर हरिनाम के जप और कीर्तन में लगी रहती है । मैं सत्य कहता हूँ , हित की बात कहता हूँ और बार – बार सम्पूर्ण शास्त्रों का सार बतलाता हूँ- इस असार संसार में केवल श्रीहरि की आराधना ही सत्य है ।

यह संसार बन्धन अत्यन्त दृढ़ है और महान् मोह में डालनेवाला है । भगवद्भक्ति रूपी कुठारसे इसको काटकर अत्यन्त सुखी हो जाओ ।

वही मन सार्थक है , जो भगवान् विष्णुके चिन्तन में लगता है , तथा वे ही दोनों कान समस्त जगत् के लिये वन्दनीय हैं , जो भगवत्कथा की सुधाधारा से परिपूर्ण रहते हैं ।

जो आनन्दस्वरूप , अक्षर एवं जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे रहित तथा हृदयमें विराजमान हैं , उन्हीं भगवान्का तुम निरन्तर भजन करो ।

Don’t you see that half the life is destroyed by sleep??? And some age ends in food etc.

Some part of life in childhood, some in pleasures
And some get wasted in old age. Then when will you practice religion?

God cannot be worshiped in childhood and old age, so one should leave the ego and perform religious rituals in youth.

This body is the abode of death and the biggest base of objections. The body is the home of diseases. It is always contaminated by faeces etc. Then why do humans commit futile sins considering it to be eternal??

This world is useless. There are different types of sorrows in it. Certainly it is associated with death, so it should not be believed. That’s why listen, I say this truth – Lord Vishnu should be worshiped only for the retirement of body bondage.

This immovable mobile world is only emotional. And as fickle as lightning. Therefore, being detached from his side, worship Lord Janardan.

If you want liberation, then worship Lord Narayana, the Supreme God, the Supreme God of true bliss, with all your mind.

● The devotees who go to the temple of Lord Vishnu for darshan. Those hands should be considered successful.

● Those who are ready to worship Lord Vishnu. Only those eyes of men should be considered completely successful, which see Lord Janardan.

● Saints have called that tongue successful, which is continuously engaged in chanting and chanting Harinam. I speak the truth, I speak the matter of interest and again and again I tell the essence of all the scriptures – in this Asar world, only the worship of Sri Hari is true.

●This worldly bondage is very strong and greatly deluding. Cut it with the ax of devotion to the Lord and be very happy.

● Only that mind is meaningful, which is engaged in the contemplation of Lord Vishnu, and those two ears are worshipable for the whole world, which are filled with the good news of Bhagwatkatha.

●You should constantly worship the Lord who is blissful, devoid of the three states of Akshara and Jagrat and resides in the heart.

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