प्रेम आपका अस्तित्व है।

प्रेम कोई भावना नहीं है, हर व्यक्त्ति के परे प्रेम है। व्यक्त्तित्व बदलता है। शरीर, मन और व्यवहार हमेशा बदलते रहते हैं। हर व्यक्त्तित्व से परे अपरिवर्तनशील प्रेम है; वह प्रेम तुम हो। जब स्वयं को खो दोगे, तो स्वयं को पा लोगे। घटना के पीछे की घटना ज्ञान है। वस्तु के पीछे की वस्तु अनन्त है। व्यक्त्ति के परे व्यक्त्ति प्रेम है। वस्तु के परे अनन्त है। व्यक्त्ति के परे प्रेम है। घटना, व्यक्त्तित्व और वस्तु में फँस जाना माया है। घटना, व्यक्त्तित्व और वस्तु के परे देखना प्रेम है। देखने का जरा सा ही फेर है।

दिव्य प्रेम सबसे उच्च कोटि का प्रेम है। यह सदाबहार होता है और सदा नवीन बना रहता है। आप जितना इसके निकट जाएँगे उतना ही इसमें अधिक आकर्षण और गहनता आती है। इसमें कभी भी थकान नहीं आती है और यह हर किसी को उत्साह में रखता है। सांसारिक प्रेम सागर के जैसा है, परन्तु सागर की भी सीमा होती है। दिव्य प्रेम आकाश के जैसा है जिसकी कोई सीमा नहीं है। सागर की सीमा से आकाश की ओर की ऊँची उड़ान भरो। ईश्वरीय प्रेम सभी संबंधो से परे है और इसमें सभी संबंध सम्मिलित होते हैं।

हम अपने भीतर कभी उतरे ही नहीं। हमने कभी महसूस भी नहीं किया कि हम कौन हैं। हमें यह पता ही नहीं कि हम ऐसी एक चीज़ से बने हुए हैं, जिसका नाम प्रेम है। जब हम अपने खुद के साथ जुड़े हुए नहीं हैं तो फिर दूसरे के साथ जुड़ पाना इतना स्वाभाविक नहीं हो पाता।

‘सखा’ जीवन और मत्यु का साथी है – यह कभी साथ नहीं छोड़ता। सखा को केवल प्रियतम चाहिए। उसे ज्ञान या मुक्त्ति की परवाह नहीं। उत्कंठा, तृष्णा के कारण प्रेम अधूरा है। उसका प्रेम असीम है और अनन्तता में कभी पूर्णता संभव नहीं। उसका प्रेम अनन्त अपूर्णता में पूर्ण है। प्रेम के पथ का कोई अंत नहीं।पवित्र प्रेम शब्दों से परे एक एहसास है, जो आत्मा से अनुभूत किया जाता है, जिसके बिना हमें अपना जीवन निरर्थक लगता है, हम मृत प्राय हो जाते हैं। पवित्र प्रेम परमात्मा अर्थात सर्वश्रेष्ठ आत्मा का स्वरूप होता है। पवित्र प्रेम में केवल अपने प्रेमास्पद अर्थात आप जिससे प्रेम करते हो उसको सुख पहुँचाने की भावना होती है इसमें अपने सुख पाने की कहीं इच्छा ही नहीं होती है।

सबसे महान् प्रेम को आप ध्यान में ईश्वर के साथ सम्पर्क करके ही अनुभव कर सकते हैं। आत्मा और परमात्मा के बीच का प्रेम परिपूर्ण प्रेम है, जिस प्रेम को आप सभी खोज रहे हैं। जब आप ध्यान करते हैं, तो प्रेम बढ़ता है। आपके हृदय से लाखों रोमांच गुज़रते हैं… यदि आप गहनता से ध्यान करते हैं, तो आपको एक ऐसे प्रेम की अनुभूति होगी जिसका वर्णन कोई मानवीय वाणी नहीं कर सकती।आप उनके दिव्य प्रेम को जान लेंगें…. और आप उस प्रेम को दूसरों को देने में सक्षम बनेंगे। यदि आप दिव्य प्रेम के एक अंश का भी अनुभव कर सकें… तो आपका आनन्द इतना महान् हो जाएगा…. इतना अभिभूत कर देने वाला … कि आप उसे समाविष्ट नहीं कर सकेंगे।

सार्वभौमिक भाव में, सृष्टि में प्रेम आकर्षण की दिव्य शक्ति है जो सन्तुलन बनाती है, एकजुट करती है और आपस में बाँध कर रखती है… जो लोग प्रेम के आकर्षक बल के साथ अन्तर्सम्पर्क में रहते हैं, वे प्रकृति और अपने साथियों के साथ सामंजस्य को प्राप्त करते हैं और ईश्वर के साथ आनन्दपूर्ण पुनर्मिलन के लिए आकर्षित होते हैं। साधारण प्रेम स्वार्थी होता है, जिसका मूल अज्ञानतापूर्ण इच्छाओं और सन्तुष्टियों में होता है। दिव्य प्रेम में कोई शर्त, कोई सीमा, कोई परिवर्तन नहीं होता। मानव हृदय की चंचलता, पवित्र प्रेम के स्तम्भित करने वाले स्पर्श से सदा के लिए समाप्त हो जाती है।

जिसका हृदय ईश्वर के प्रेम से भरा होता है वह किसी को जानबूझकर चोट नहीं पहुँचा सकता। जब आप ईश्वर से बिना किसी शर्त के प्रेम करते हैं, तो वे आपके हृदय में सबके लिए अपना निशर्त प्रेम भर देते हैं। उस प्रेम का कोई भी मानवीय जिह्वा वर्णन नहीं कर सकती…साधारण मनुष्य दूसरों से इस प्रकार प्रेम करने में असमर्थ है। मैं, मुझे और मेरा की चेतना में आत्म केन्द्रित रहकर उसने अभी तक सर्वव्यापक ईश्वर को नहीं पाया है, जो उसमें और अन्य समस्त प्राणियों में वास करता है। हम सब एक ही ब्रह्म के अंश हैं। जब आप धर्म के सच्चे अर्थ को अनुभव करते हैं, जो है… ईश्वर को जानना, तो आप जान जाएँगे कि वे ईश्वर आपकी आत्मा हैं, और वे सभी प्राणियों में समान और निष्पक्ष रूप से विद्यमान हैं। तब आप दूसरों को अपनी आत्मा के रूप में प्रेम करने में समर्थ होंगे।

जो व्यक्ति ईश्वर के दिव्य प्रेम में डूबा है, उसकी चेतना में कोई कपट नहीं होता, जाति और धर्म की कोई संकीर्णता नहीं, किसी तरह की कोई सीमाएँ नहीं होतीं। जब आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव करेंगे, तो आप एक पुष्प और एक पशु, एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में कोई भेद नहीं देखेंगे। आप पूरी प्रकृति के साथ सम्पर्क स्थापित कर लेंगे और आप समस्त मानव जाति को समान रूप से प्रेम करेंगे। दिव्य अनुभूति के लिए सब जीवों के प्रति दया आवश्यक है क्योंकि ईश्वर स्वयं इस गुण से ओतप्रोत हैं। कोमल हृदय वाले लोग अपने आपको दूसरों के स्थान पर कल्पित करके उनके दुःखों का अनुभव कर सकते हैं और फिर उन दुःखों को कम करने का प्रयास कर सकते हैं।



Love is not an emotion, love is beyond every person. Personality changes. Body, mind and behavior are always changing. Beyond every individuality is unchangeable love; That love is you. When you lose yourself, you will find yourself. The phenomenon behind the phenomenon is knowledge. The thing behind the thing is infinite. The individual is love beyond the individual. There is infinity beyond the object. Love is beyond the individual. Getting trapped in events, personalities and things is Maya. Love is seeing beyond events, personalities and things. There is only a slight change in view.

Divine love is the highest form of love. It is evergreen and always remains new. The closer you get to it, the more attractive and profound it becomes. It never gets tiring and keeps everyone in good spirits. Worldly love is like an ocean, but even an ocean has limits. Divine love is like the sky which has no limits. Fly high from the edge of the ocean towards the sky. Divine love transcends all relationships and includes all relationships.

We never went within ourselves. We never even realized who we are. We don’t even know that we are made of one such thing, whose name is love. When we are not connected with ourselves then it does not become so natural to connect with others.

‘Friend’ is the companion of life and death – it never leaves you. A friend only wants her beloved. He does not care about knowledge or liberation. Love is incomplete because of longing and desire. His love is infinite and perfection is never possible in infinity. His love is perfect in infinite imperfection. There is no end to the path of love. Holy love is a feeling beyond words, which is felt by the soul, without which we find our life meaningless, we are almost dead. Pure love is the form of God i.e. the best soul. In pure love, there is only a feeling of giving happiness to your beloved i.e. the one you love, in this there is no desire to get your own happiness.

You can experience the greatest love only by contacting God in meditation. The love between soul and God is perfect love, the love you all are searching for. When you meditate, love increases. A million thrills pass through your heart… If you meditate deeply, you will experience a love that no human speech can describe. You will know His divine love… And you will be able to give that love to others. If you can experience even a fraction of divine love… then your joy will be so great…. So overwhelming…that you won’t be able to contain it.

In a universal sense, love is the divine force of attraction in creation that balances, unites, and binds together… Those who are in touch with the attractive force of love achieve harmony with nature and their fellow beings. Receive and are drawn to joyful reunion with God. Ordinary love is selfish, rooted in ignorant desires and satisfactions. There are no conditions, no limits, no changes in divine love. The fickleness of the human heart is ended forever by the shocking touch of holy love.

One whose heart is filled with the love of God cannot intentionally hurt anyone. When you love God unconditionally, He fills your heart with His unconditional love for everyone. No human tongue can describe that love…an ordinary human being is incapable of loving others in this way. By remaining self-centered in the consciousness of I, me and mine, he has not yet found the omnipresent God who resides in him and all other beings. We are all parts of the same Brahma. When you experience the true meaning of religion, which is… knowing God, you will know that God is your soul, and He exists equally and impartially in all beings. Then you will be able to love others as your own soul.

The person who is immersed in the divine love of God has no deceit in his consciousness, no narrow-mindedness of caste and religion, no boundaries of any kind. When you experience that divine love, you will see no difference between a flower and an animal, one human being and another human being. You will be in touch with all of nature and you will love all mankind equally. For divine experience, compassion towards all living beings is necessary because God himself is imbued with this quality. People with a soft heart can imagine themselves in the place of others and experience their sorrows and then try to reduce those sorrows.

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