ऋषि कहता है, संन्यासी का विवेक रक्षक है।

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संन्यासी का अर्थ है : जो निरंतर जागा हुआ जी रहा है, होशपूर्वक जी रहा है। कदम भी उठाता है, तो जानते हुए कि कदम उठाया जा रहा है। श्वास भी लेता है, तो जानते हुए कि श्वास ली जा रही है। श्वास बाहर जाती है, तो जानता है कि बाहर गई; श्वास भीतर जाती है, तो जानता है कि भीतर गई।

एक विचार मन में उठता है, तो जानता है कि उठा; गिरता है, तो जानता है कि गिरा। मन खाली होता है, तो जानता है मन खाली है। मन भरा होता है, तो जानता है कि मन भरा है।

एक बात पक्की है कि जानने की सतत धारा भीतर चलती रहती है। और कुछ भी हो, जानने का सूत्र भीतर चलता रहता है।

यही रक्षा है, क्योंकि जानकर कोई गलत नहीं कर सकता। सब गलती अज्ञान है या सब गलती मूर्च्छा है। अगर किसी दिन…।

हमारी कलह के अतिरिक्त और क्या है! और पूरी जिंदगी हम सिवाय दुख के क्या अर्जित कर पाते है! यह सोए हुए होने की अनिवार्य परिणति है।

ऋषि कहता है, संन्यासी का तो विवेक ही रक्षा है।

हिम्मतवर लोग थे, बड़े साहसी लोग थे, जिन्होंने यह कहा। नहीं कहा कि नीति में रक्षा है, नियम में रक्षा है। नहीं कहा मर्यादा में रक्षा है, नहीं कहा शास्त्र में रक्षा है, नहीं कहा गुरु में रक्षा है। कहा विवेक में रक्षा है, होश में रक्षा है। होश के अतिरिक्त कोई रक्षा नहीं हो सकती। भूल होकर ही रहेगी।

करुणा ही उनकी क्रीड़ा है। करुणैव केलि:।

एक ही उनका खेल है, जागे हुओं का—करुणा। कहें कि एक ही उनका रस बाकी रह गया, कहें कि बस एक ही बात उन्हें और करने ‘योग्य रह गई है—करुणा।

करुणा का अर्थ है. देने के लिए जीना। वासना का अर्थ है. लेने के लिए जीना। वासना भिखारी है, करुणा सम्राट है।

लेकिन दे कौन सकता है? दे वही सकता है, जिसके पास हो। और वही दिया जा सकता है, जो हमारे पास हो। वह तो नहीं दिया जा सकता, जो हमारे पास न हो। वही दिया जा सकता है, जो हमारे पास हो।
हर हर महादेव
शिवोहम, एक ओमकार, ॐ, अनाहत नाद व शास्वत शून्य अद्वैत स्वरूप को मेरा प्रणाम ।
जय भोलेनाथ

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