
मौन की महिमा
मौन की महीमा उत्तर शब्दों से नहीं, आचरण सेमनुष्य के व्यवहार का सबसे सूक्ष्म, पर सबसे प्रभावशाली आयाम है—शांति। बाह्य

मौन की महीमा उत्तर शब्दों से नहीं, आचरण सेमनुष्य के व्यवहार का सबसे सूक्ष्म, पर सबसे प्रभावशाली आयाम है—शांति। बाह्य

माला मन से लड़ पड़ी , कहाॅं फिरावैं मोहिं ।मन की माला फेरी ले, राम मिलाउं तोहिं ॥ कबीर दास

परमात्मा श्रीराम परमानन्द के स्वरूप हैं। निराकार आनन्द ही नराकार। निराकार वस्तु आँख को दीखती नहीं। यह फूल साकार है,
एक भक्त अंतर्मन से भाव में है अन्तर्मन से भगवान का सतसंग चल रहा है भक्त भाव मे गहरा चला

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं….जीवात्मा का विनाश करने वाले “काम, क्रोध और लोभ” यह तीन प्रकार के द्वार मनुष्य को

एक भक्त की कर्म प्रधान साधना हैं। भक्त कर्म करते हुए जितना आनंद विभोर होता है । कर्म करते हुए
माओत्से-तुंग ने अपने बचपन की एक छोटी सी घटना लिखी है। लिखा है कि मेरी मां का एक बगीचा था।

क्योंकि सुख और दुख को भोगने के लिए ही इस शरीर की उत्पत्ति हुई है या जन्म होता है ।

रमण की समाधि समझने जैसी है। ज्यादा उम्र उनकी न थी। ज्यादा होती तो शायद समाधि मिलती भी न। ज्यादा

मनुष्य शरीर मिलना परम सौभाग्य की बात है। यह शरीर सुंदर घर है जिसके भीतर हृदय में परमात्मा विराजमान हैं।