
प्रसादका अपमान
प्रसादो जगदीशस्य अन्नपानादिकं च यत् । ब्रह्मवन्निर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत् ॥ नरेशका हृदय जला जा रहा था। वे मन-ही

प्रसादो जगदीशस्य अन्नपानादिकं च यत् । ब्रह्मवन्निर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत् ॥ नरेशका हृदय जला जा रहा था। वे मन-ही

उन्नीसवीं शताब्दीके दूसरे चरणके कुछ साल बाद हो अंग्रेजी और तुर्की सेना तथा रूसी सेनामें कालेसागर के तटपर युद्ध आरम्भ

गढ़मण्डलके राजा पीपाजी राज-काज छोड़ रामानन्द स्वामीके शिष्य बने और उनकी आज्ञासे द्वारकामें हरि दर्शनार्थ गये। दर्शन करके अपनी पत्नीसहित

काशीनरेशकी महारानी अपनी दासियोंके साथ वरुणा स्नान करने गयी थीं। उस समय नदीके किनारे दूसरे किसीको जानेकी अनुमति नहीं थी।

श्रमका संस्कार एक बार कुछ किसान हल जोतनेके लिये खेतों में गये। इतनेमें चारों ओर काली घटाएँ छा गयीं। किसानोंने

[3] नैतिक सामाजिकता एक फटे हाल महिला घायल अवस्थामें सड़कके किनारे पड़ी हुई कराह रही थी। पासमें उसका अबोध शिशु

प्रियदर्शी सम्राट् अशोकके जन्म-दिनका महोत्सव था। सभी प्रान्तोंके शासक एकत्र हुए थे। सम्राट्की ओरसे घोषणा हुई—‘सर्वश्रेष्ठ शासक आज पुरस्कृत होगा।’

रहीम खानखाना अपने समयके उदार और दानीदे व्यक्तियोंमेंसे एक थे। वे बहुत बड़े गुणग्राहक और भगवद्भक्त थे। उन्होंने अपने जीवनकालमें

शक्तियोंको खोलनेका मार्ग मनुष्यका यह स्वभाव है कि दूसरे आदमी उसे जैसा पुनः पुनः कहते हैं, धीरे-धीरे वह स्वयं भी

अहन्ताके त्यागसे ही जीवन्मुक्ति एक राजा था, वह अत्यन्त विचारशील था। एक बार वह विचार करते-करते व्याकुल हो उठा, उसे