
बुरे काममें देर करनी चाहिये
महर्षि गौतमके एक पुत्रका नाम था चिरकारी वे बुद्धिमान थे, कार्यकुशल थे, किंतु प्रत्येक कार्यको बहुत सोच-विचार करनेके पश्चात् करते

महर्षि गौतमके एक पुत्रका नाम था चिरकारी वे बुद्धिमान थे, कार्यकुशल थे, किंतु प्रत्येक कार्यको बहुत सोच-विचार करनेके पश्चात् करते

घरमें ही वैरागी चक्रवर्ती भरतके जीवनकी एक घटना है कि एक दिन एक विप्रदेवने उनसे पूछा- ‘महाराज! आप वैरागी हैं

‘भय बिनु होइ न प्रीति’ सेनासहित लंका जानेके लिये श्रीरघुनाथजी समुद्रके तटपर कुशा विछा महासागरके समक्ष हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो

अहंकार किसी समयकी बात है, रामनगरमें एक वृद्ध भिखारी रहता था। वह सड़कके किनारे बैठकर भीख माँगता था। उसका स्थान

पट्टन-साम्राज्यके महामन्त्री उदयनके पुत्र बाहड़ जैनोंके शत्रुञ्जयतीर्थका पुनरुद्धार करके दिवंगत पिताकी अपूर्ण इच्छा पूरी कर देना चाहते थे। तीर्थोद्धारका कार्य

पटना शहरमें कोई ब्राह्मण रहते थे। उनका नियम था – प्रतिदिन एक ब्राह्मणको भोजन कराके तब स्वयं भोजन करते ।

हरगिज नहीं करेंगे एक था राक्षस उसने एक आदमीको पकड़ लिया था। वह उससे बराबर काम लेता रहता था। जब

सत्कर्मपर आस्था बनाये रखिये रामगंगा नदीके तटपर एक शिवमन्दिर था। उसमें एक पण्डित और एक चोर रोज आते थे। पण्डितजी

बंगालके एक छोटे से रेलवे स्टेशनपर ट्रेन खड़ी हुई। स्वच्छ धुले वस्त्र पहिने एक युवकने ‘कुली! कुली!’ पुकारना प्रारम्भ किया।

एक बौद्ध ब्रह्मचारी था। अवस्था बीस वर्षकी होगी । चतुर तो था ही, ज्ञानार्जनमें भी कुशल और तत्पर था। वह