गीता के पाँचवें अध्याय का माहात्म्यं

stream mountain village


श्री भगवान कहते हैं: हे देवी! अब सब लोगों द्वारा सम्मानित पाँचवें अध्याय का माहात्म्य संक्षेप में बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो। मद्र देश में पुरुकुत्सपुर नामक एक नगर है, उसमें पिंगल नामक एक ब्राह्मण रहता था, वह वेदपाठी ब्राह्मणों के विख्यात वंश में, जो सर्वदा निष्कलंक था, उत्पन्न हुआ था, किंतु अपने कुल के लिए उचित वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय को छोड़कर ढोल बजाते हुए उसने नाच-गान में मन लगाया, गीत, नृत्य और बाजा बजाने की कला में परिश्रम करके पिंगल ने बड़ी प्रसिद्धी प्राप्त कर ली और उसी से उसका राज भवन में भी प्रवेश हो गया।

वह राजा के साथ रहने लगा, स्त्रियों के सिवा और कहीं उसका मन नहीं लगता था, धीरे-धीरे अभिमान बढ़ जाने से उच्छ्रंखल होकर वह एकान्त में राजा से दूसरों के दोष बतलाने लगा, पिंगल की एक स्त्री थी, जिसका नाम था अरुणा, वह नीच कुल में उत्पन्न हुई थी और कामी पुरुषों के साथ विहार करने की इच्छा से सदा उन्हीं की खोज में घूमा करती थी, उसने पति को अपने मार्ग का कण्टक समझकर एक दिन आधी रात में घर के भीतर ही उसका सिर काटकर मार डाला और उसकी लाश को जमीन में गाड़ दिया, इस प्रकार प्राणों से वियुक्त होने पर वह यमलोक पहुँचा और भीषण नरकों का उपभोग करके निर्जन वन में गिद्ध हुआ।

अरुणा भी भगन्दर रोग से अपने सुन्दर शरीर को त्याग कर घोर नरक भोगने के पश्चात उसी वन में शुकी हुई, एक दिन वह दाना चुगने की इच्छा से इधर उधर फुदक रही थी, इतने में ही उस गिद्ध ने पूर्वजन्म के वैर का स्मरण करके उसे अपने तीखे नखों से फाड़ डाला, शुकी घायल होकर पानी से भरी हुई मनुष्य की खोपड़ी में गिरी, गिद्ध पुनः उसकी ओर झपटा, इतने में ही जाल फैलाने वाले बहेलियों ने उसे भी बाणों का निशाना बनाया, उसकी पूर्वजन्म की पत्नी शुकी उस खोपड़ी के जल में डूबकर प्राण त्याग चुकी थी, फिर वह क्रूर पक्षी भी उसी में गिर कर डूब गया।

यमराज के दूत उन दोनों को यमलोक में ले गये, वहाँ अपने पूर्वकृत पाप कर्म को याद करके दोनों ही भयभीत हो रहे थे, तदनन्तर यमराज ने जब उनके घृणित कर्मों पर दृष्टिपात किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि मृत्यु के समय अकस्मात् खोपड़ी के जल में स्नान करने से इन दोनों का पाप नष्ट हो चुका है, तब उन्होंने उन दोनों को मनोवांछित लोक में जाने की आज्ञा दी, यह सुनकर अपने पाप को याद करते हुए वे दोनों बड़े विस्मय में पड़े और पास जाकर धर्मराज के चरणों में प्रणाम करके पूछने लगेः “भगवन ! हम दोनों ने पूर्वजन्म में अत्यन्त घृणित पाप का संचय किया है, फिर हमें मनोवाञ्छित लोकों में भेजने का क्या कारण है?”

यमराज ने कहा: गंगा के किनारे वट नामक एक उत्तम ब्रह्म-ज्ञानी रहते थे, वे एकान्तवासी, ममतारहित, शान्त, विरक्त और किसी से भी द्वेष न रखने वाले थे, प्रतिदिन गीता के पाँचवें अध्याय का जप करना उनका सदा नियम था, पाँचवें अध्याय को श्रवण कर लेने पर महापापी पुरुष भी सनातन ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसी पुण्य के प्रभाव से शुद्ध चित्त होकर उन्होंने अपने शरीर का परित्याग किया था, गीता के पाठ से जिनका शरीर निर्मल हो गया था, जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे, उन्ही महात्मा की खोपड़ी का जल पाकर तुम दोनों पवित्र हो गये, अतः अब तुम दोनों मनोवाञ्छित लोकों को जाओ, क्योंकि गीता के पाँचवें अध्याय के माहात्म्य से तुम दोनों शुद्ध हो गये हो।

श्री भगवान कहते हैं: सबके प्रति समान भाव रखने वाले धर्मराज के द्वारा इस प्रकार समझाये जाने पर दोनों बहुत प्रसन्न हुए और विमान पर बैठकर वैकुण्ठधाम को चले गये।

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥



Sri Bhagavan says: O Goddess! Now let me briefly describe the importance of the fifth chapter, respected by all, listen carefully. There is a town named Purukutsapur in the country of Madra, in which there lived a brahmin named Pingal, who was born in the famous lineage of Vedapathi brahmins, who was always spotless, but leaving the self-study of the Vedas-shastras appropriate for his clan, playing the drum He devoted his mind to dancing, by working hard in the art of singing, dancing and playing the baja, Pingal gained great fame and from that he also entered the Raj Bhavan.

He started living with the king, except for women, he did not feel like anywhere else, gradually becoming irritable due to increasing pride, he started telling the king the faults of others in solitude, there was a woman of Pingal, whose name was Aruna, she She was born in a low caste and always wandered in search of them with the desire to live with the sexiest men, mistaking her husband as a thorn in her path, one day in the middle of the night, he beheaded her inside the house and killed her dead body. He was buried in the ground, thus being separated from his life, he reached Yamaloka and after consuming the horrific hells, became a vulture in the deserted forest.

Aruna too renounced her beautiful body from the disease of fissure and after going through a severe hell, she was plucked in the same forest, one day she was hopping here and there with the desire to pick the grain, in that vulture remembering the enmity of her previous birth, took her to her. Torn with sharp fingernails, Shuki was injured and fell into the skull of a man filled with water, the vulture again swung towards him, in the same way the shepherds who spread the net also targeted him with arrows, Shuki, the wife of his previous birth, fell into the water of that skull. She had given up her life by drowning, then that ferocious bird also fell into it and drowned.

Yamraj’s messengers took both of them to Yamalok, there both were getting frightened by remembering their previous sinful deeds, then when Yamraj looked at their abominations, then he came to know that at the time of death, suddenly in the water of the skull. The sins of both of them have been destroyed by taking a bath, then he ordered both of them to go to the desired world, on hearing this, remembering their sin, they both fell in great astonishment and went near and bowed at the feet of Dharmaraja and asked: “Lord! We have both accumulated the most heinous sin in our previous lives, then what is the reason for sending us to the desired worlds?”

Yamraj said: On the banks of the Ganges lived an excellent brahma-jnani named Vat, he was solitary, loveless, quiet, detached and did not have any hatred towards anyone, it was always his rule to chant the fifth chapter of the Gita daily, the fifth chapter On hearing this, the great sinner also acquires the knowledge of the eternal Brahman, with the effect of the same virtue, having a pure mind, he had abandoned his body, whose body was purified by the recitation of the Gita, who had attained self-knowledge. By getting the water of the same Mahatma’s skull, both of you became pure, so now both of you go to the desired worlds, because both of you have been purified by the greatness of the fifth chapter of the Gita.

Sri Bhagavan says: Both of them were very happy on being explained in this way by Dharmaraja, who has equal feelings towards everyone, and went to Vaikunth Dham by sitting on the plane.

॥ Hari: Om Tat Sat.

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