नौवें अध्याय के माहात्म्य

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भगवान शिव कहते हैं:- पार्वती अब मैं आदरपूर्वक नौवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करुँगा, तुम स्थिर होकर सुनो।

नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है, वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदांगों के तत्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथियों के प्रेमी थे, उन्होंने विद्या के द्वारा बहुत धन कमाकर एक महान यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया, उस यज्ञ में बलि देने के लिए एक बकरा मंगाया गया, जब उसके शरीर की पूजा हो गयी, तब सबको आश्चर्य में डालते हुए उस बकरे ने हँसकर उच्च स्वर से कहाः “ब्राह्मण! इन बहुत से यज्ञों द्वारा क्या लाभ है? इनका फल तो नष्ट हो जाने वाला तथा ये जन्म, जरा और मृत्यु के भी कारण हैं, यह सब करने पर भी मेरी जो वर्तमान दशा है इसे देख लो,” बकरे के इस अत्यन्त कौतूहल जनक वचन को सुनकर यज्ञ मण्डप में रहने वाले सभी लोग बहुत ही विस्मित हुए, तब वे यजमान ब्राह्मण हाथ जोड़ अपलक नेत्रों से देखते हुए बकरे को प्रणाम करके आदर के साथ पूछने लगे।

ब्राह्मण बोलेः- आप किस जाति के थे? आपका स्वभाव और आचरण कैसा था? तथा जिस कर्म से आपको बकरे की योनि प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये।

बकरा बोलाः- ब्राह्मण ! मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मणों के अत्यन्त निर्मल कुल में उत्पन्न हुआ था, समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और वेद-विद्या में प्रवीण था, एक दिन मेरी स्त्री ने भगवती दुर्गा की भक्ति से विनम्र होकर अपने बालक के रोग की शान्ति के लिए बलि देने के निमित्त मुझसे एक बकरा माँगा, तत्पश्चात् जब चण्डिका के मन्दिर में वह बकरा मारा जाने लगा, उस समय उसकी माता ने मुझे शाप दियाः

“ओ ब्राह्मणों में नीच, पापी! तू मेरे बच्चे का वध करना चाहता है, इसलिए तू भी बकरे की योनि में जन्म लेगा।”

द्विजश्रेष्ठ! तब कालवश मृत्यु को प्राप्त होकर मैं बकरा हुआ, यद्यपि मैं पशु योनि में पड़ा हूँ, तो भी मुझे अपने पूर्व-जन्मों का स्मरण बना हुआ है, ब्राह्मण! यदि आपको सुनने की उत्कण्ठा हो तो मैं एक और भी आश्चर्य की बात बताता हूँ, कुरुक्षेत्र नामक एक नगर है, जो मोक्ष प्रदान करने वाला है, वहाँ चन्द्र शर्मा नामक एक सूर्य-वंशी राजा राज्य करते थे, एक समय जब सूर्य-ग्रहण लगा था।

राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ कालपुरुष का दान करने की तैयारी की, उन्होंने वेद-वेदांगो के पारगामी एक विद्वान ब्राह्मण को बुलवाया और पुरोहित के साथ वे तीर्थ के पावन जल से स्नान करने को चले और दो वस्त्र धारण किये, फिर पवित्र और प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने श्वेत चन्दन लगाया और बगल में खड़े हुए पुरोहित का हाथ पकड़कर मनुष्यों से घिरे हुए अपने स्थान पर लौट आये। आने पर राजा ने यथोचित्त विधि से भक्ति-पूर्वक ब्राह्मण को काल-पुरुष का दान किया।

तब काल-पुरुष का हृदय चीरकर उसमें से एक पापात्मा चाण्डाल प्रकट हुआ फिर थोड़ी देर के बाद निन्दा भी चाण्डाली का रूप धारण करके काल-पुरुष के शरीर से निकली और ब्राह्मण के पास आ गयी, इस प्रकार चाण्डालों की वह जोड़ी आँखें लाल किये निकली और ब्राह्मण के शरीर में हठात प्रवेश करने लगी, ब्राह्मण मन ही मन गीता के नौवें अध्याय का जप करते थे और राजा चुपचाप यह सब कौतुक देखने लगे, ब्राह्मण के अन्तःकरण में भगवान गोविन्द शयन करते थे, वे उन्हीं का ध्यान करने लगे।

ब्राह्मण ने जब गीता के नौवें अध्याय का जप करते हुए अपने भगवान का ध्यान किया, उस समय गीता के अक्षरों से प्रकट हुए विष्णु-दूतों द्वारा पीड़ित होकर वे दोनों चाण्डाल भाग चले, उनका उद्योग निष्फल हो गया, इस प्रकार इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर राजा के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे, उन्होंने ब्राह्मण से पूछाः “विप्रवर! इस भयंकर आपत्ति को आपने कैसे पार किया? आप किस मन्त्र का जप तथा किस देवता का स्मरण कर रहे थे? वह पुरुष तथा स्त्री कौन थी? वे दोनों कैसे उपस्थित हुए? फिर वे शान्त कैसे हो गये? यह सब मुझे बताइये।

ब्राह्मण ने कहाः- राजन! चाण्डाल का रूप धारण करके भयंकर पाप ही प्रकट हुआ था तथा वह स्त्री निन्दा की साक्षात मूर्ति थी, मैं इन दोनों को ऐसा ही समझता हूँ, उस समय मैं गीता के नवें अध्याय के मन्त्रों की माला जपता था, उसी का माहात्म्य है कि सारा संकट दूर हो गया, महीपते! मैं नित्य ही गीता के नौवें अध्याय का जप करता हूँ, उसी के प्रभाव से ग्रह-जनित आपत्तियों के पार हो सका हूँ, यह सुनकर राजा ने उसी ब्राह्मण से गीता के नवम अध्याय का अभ्यास किया, फिर वे दोनों ही परम शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त हो गये।

यह कथा सुनकर ब्राह्मण ने बकरे को बन्धन से मुक्त कर दिया और गीता के नौवें अध्याय के अभ्यास से परम गति को प्राप्त किया।…..

॥ हरि: ॐ तत् सत्



Lord Shiva says:- Parvati Now I will respectfully describe the greatness of the ninth chapter, you listen calmly.

On the banks of the Narmada there is a town named Mahishmati, there lived a brahmin named Madhava, who was a philosopher of Vedas and Vedangas and a lover of visiting guests from time to time, he performed a great sacrifice by earning a lot of money through learning. Started, a goat was called for sacrifice in that sacrifice, when his body was worshiped, then to everyone’s surprise, the goat laughed and said with a loud voice: “Brahmin! What is the use of these many sacrifices? The fruits are destroyed and these are the causes of birth, old age and death, even after doing all this, see my present condition,” Hearing this very curious word of the goat, all the people living in the yagya mandap were very much Astonished himself, then those brahmins with folded hands folded their hands and looked at the goat with respect and started asking respectfully.

The brahmin said: – What caste did you belong to? How was your nature and conduct? And by which act you got the goat’s vagina? Tell me all this.

The goat said: – Brahmin! I was born in a very pure family of brahmins in a previous birth, performer of all yagyas and was proficient in Vedas, one day my woman, being humbled by the devotion of Goddess Durga, sacrificed her child for the peace of her illness. Asked me for a goat, after that when that goat started being killed in Chandika’s temple, at that time his mother cursed me:

“O sinner, low among brahmins! You want to kill my child, so you too will be born in the vagina of a goat.”

Double best! Then I became a goat after death due to time, though I am lying in the animal vagina, yet I still remember my previous births, brahmin! If you are eager to hear then I will tell you one more surprising thing, there is a city called Kurukshetra, which is supposed to give salvation, there used to be a sun-dynasty king named Chandra Sharma, at a time when there was a solar eclipse. was.

The king with great reverence prepared to donate Kalapurush, he called a Brahmin, a learned scholar of Veda-Vedango, and with the priest he went to bathe in the holy water of the shrine and put on two clothes, then becoming pure and happy He applied white sandalwood and, holding the priest’s hand standing next to him, returned to his place surrounded by men. On his arrival, the king donated the Kaal-Purusha to the brahmin devoutly in a suitable manner.

Then after tearing the heart of Kaal-Purusha, a sinful Chandala appeared from him, then after a while even blasphemy, taking the form of Chandali, came out of Kaal-Purusha’s body and came to the Brahmin, thus the pair of Chandalas turned red. And the brahmin began to enter the body, the brahmin used to chant the ninth chapter of the Gita in his mind and the king silently began to see all this admiration, Lord Govind used to sleep in the brahmin’s heart, he started meditating on him.

When the brahmin meditated on his Lord while chanting the ninth chapter of the Gita, both the Chandalas fled after being victimized by the Vishnu-messengers who appeared from the letters of the Gita, their industry became fruitless, thus seeing this incident directly. The king’s eyes were astonished by surprise, he asked the brahmin: “Vipravar! How did you overcome this dreadful objection? Which mantra were you chanting and which deity were you remembering? Who was that man and woman? How did they both present? Then how did he become quiet? Tell me all this.

The brahmin said:- Rajan! A terrible sin had manifested itself by taking the form of a Chandal and that woman was a real idol of blasphemy, I understand both of them as such, at that time I used to chant the rosary of mantras of the ninth chapter of the Gita, the significance of that is that all the troubles Gone away, Maheepe! I chant the ninth chapter of the Gita regularly, because of its influence I have been able to overcome the objections caused by the planets, on hearing this, the king rehearsed the ninth chapter of the Gita from the same Brahmin, then both of them attain supreme peace (moksha). have been received.

Hearing this story, the brahmin freed the goat from bondage and attained the supreme speed through the practice of the ninth chapter of the Gita.

॥ Hari: Om Tat Sat

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