भगवान राम के अयोध्या आने पर चोपाई

जासु बिरहं सोचहु दिन राती।

रटहु निरंतर गुन गन पांती॥

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता।

आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।

सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

सुनत बचन बिसरे सब दूखा।

तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥

हरषि भरत कोसलपुर आए।

समाचार सब गुरहि सुनाए॥
पुनि मंदिर महं बात जनाई।

आवत नगर कुसल रघुराई॥

सुनत सकल जननीं उठि धाईं।

कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं॥

समाचार पुरबासिन्ह पाए।
नर अरु नारि हरषि सब धाए॥

दधि दुर्बा रोचन फल फूला।

नव तुलसी दल मंगल मूला॥

भरि भरि हेम थार भामिनी।


गावत चलिं सिंधुरगामिनी॥

जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं।

बाल बृद्ध कहं संग न लावहिं॥

एक एकन्ह कहं बूझहिं भाई।

तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥


अवधपुरी प्रभु आवत जानी।

भई सकल सोभा कै खानी॥

बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा।

भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥


हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर

बृंद समेत। चले भरत मन,

प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥

बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह

निरखहिं गगन बिमान।

देखि मधुर सुर हरषित

करहिं सुमंगल गान॥

राका ससि रघुपति पुर सिंधु

देखि हरषान। बढ़्यो कोलाहल

करत जनु नारि तरंग समान॥

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं।
मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥

कनक थार आरती उतारहिं।
बार बार प्रभु गात निहारहिं॥

नाना भांति निछावरि करहीं।

परमानंद हरष उर भरहीं॥

कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि।

चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥
सुमन बृष्टि नभ संकुल

भवन चले सुखकंद।

चढ़ी अटारिन्ह देखहिं

नगर नारि नर बृंद॥

कंचन कलस बिचित्र संवारे।

सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥

बंदनवार पताका केतू।

सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई।

गजमनि रचि बहु चौक पुराईं।

नाना भांति सुमंगल साजे।

हरषि नगर निसान बहु बाजे॥

जहं तहं नारि निछावरि करहीं।

देहिं असीस हरष उर भरहीं॥

कंचन थार आरतीं नाना।

जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥

होहिं सगुन सुभ बिबिधि

बिधि बाजहिं गगन निसान।

पुर नर नारि सनाथ करि

भवन चले भगवान॥

सीताराम जय जय राम

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