अगुन सगुन दुइ ब्रम्ह सरुपा

प्रातःअभिवादन,प्रणाम नमस्कार। मात-पिता चरण कमलेभ्योःनम।
श्री गुरुचरण कमलेभ्योःनम ।
राम राम। जय सीताराम।
जयश्रीकृष्ण। बजरंग बली की जय।
जय मां भवानी।हर हर महादेव।
प्रातःवंदन ब्रह्म मुहूर्त सत्संग संवाद में आप सबों का स्वागत अभिनंदन कर, प्रणाम, नमस्कार, जय सीताराम कहते हैं।
विगत दिवस राम नाम महिमा प्रसंग के
अगुन सगुन दुइ ब्रम्ह सरुपा
अकथ ,अगाध,अनादि अनूपा पर हम संवाद कर रहे थे। विगत दिवस कथा के यथा स्थान से आगे बढते हैं।
संत गोस्वामी जी महाराज कहते हैं निर्गुण निराकार ब्रह्म सगुण साकार ब्रह्म पर दृष्टांत के साथ भाव स्पष्ट करते हैं।
एकु दारुगत,देखिअ एकू
पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू
उभय अगम जुग सुगम नाम तें
कहेंऊं नामु बड ब्रह्म राम तें
संत गोस्वामी जी भारत देश के विभिन्न क्षेत्र के क्षेत्रीय भाषा के भी भाषाविद् थे ।
जब निर्गुण निराकार ब्रह्म का दृष्टांत के उल्लेख पर झारखंड प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र के मुण्डारी भाषा शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। एकु दारुगत शब्द मुण्डारी भाषा में लकडी को कहते हैं।
यानी निर्गुण निराकार ब्रह्म सूखी लकडी के अंदर अदृश्य अग्नि के सदृश है। जो दिखता नहीं है।
सगुण साकार ब्रह्म दो सूखी लकडी के आपस में घर्षण से उत्पन्न प्रकट अग्नि के सदृश्य है।
घर्षण से उत्पन्न अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए रुई या सूखे पत्तों के चूर्ण को घर्षण उत्पन्न अग्नि से स्पर्श कराने पर अग्नि अपने साकार रूप में प्रज्वलित हो जाता है। यानी निर्गुण निराकार ही साकार सगुण बन जाता है।
दूध के अंदर ही मक्खन होता है। दूध को गर्म कर छांछ और छांछ को मंथने पर मक्खन प्रकट होता है।
उसी प्रकार राम नाम के जप से राम के दोनों स्वरुपों का दर्शन होता है। रामनाम जप में वो शक्ति है कि ब्रह्म राम स्वयं ही शामने आ जाते हैं।
पृथ्वी पर रावण के अत्याचार से देव ,मुनि, गौ,और गन्धर्व त्रस्त थे।
सभी एकत्रित होकर विचार करने पर ब्रह्मा जी के कथनानुसार परमात्मा ही रावण के आतंक से हम सबों को बचा सकते हैं। तब सब अपना अपना मत से परमात्मा के निवास स्थान का बोध कर परमात्मा को खोजने का मत रखते हैं।
वहां शंकर जी वंदे बोधमयं नित्यं गुरु शंकर रुपिणं
एकत्रित देव समाज को शंकर जी कहते हैं।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना
प्रेम तें प्रगट होंहिं मैं जाना।
भगवान इस जग के कण कण में विद्यमान हैं। सभी देवता प्रेम, स्नेह से परमात्मा का नाम से पुकार करते हैं। परमात्मा उनकी स्नेहमयी पुकार सुनकर उनको आश्वस्त करते हैं रावण के आतंक से निश्चय मुक्त करुंगा।
गोस्वामी जी स्पष्ट संकेत करते हैं कि
निर्गुण और सगुण ब्रह्म को जानना, समझना और प्राप्त करना सहज नहीं हैं पर नाम दोनों को सहज, सरलता के साथ प्राप्त करा देता है।
उभय अगम जुग सुगम नाम तें
अतएव गोस्वामी जी ब्रह्म राम के दोंनों रुपों से नाम को बडा कहने में संकोच नहीं करते हैं।
हम सबों को भी सदा सर्वत्र राम राम स्मरण करते रहना चाहिए।
जयश्रीकृष्ण।
जय सीताराम।
हर हर महादेव।



प्रातःअभिवादन,प्रणाम नमस्कार। मात-पिता चरण कमलेभ्योःनम। श्री गुरुचरण कमलेभ्योःनम । राम राम। जय सीताराम। जयश्रीकृष्ण। बजरंग बली की जय। जय मां भवानी।हर हर महादेव। प्रातःवंदन ब्रह्म मुहूर्त सत्संग संवाद में आप सबों का स्वागत अभिनंदन कर, प्रणाम, नमस्कार, जय सीताराम कहते हैं। विगत दिवस राम नाम महिमा प्रसंग के अगुन सगुन दुइ ब्रम्ह सरुपा। अकथ ,अगाध,अनादि अनूपा पर हम संवाद कर रहे थे। विगत दिवस कथा के यथा स्थान से आगे बढते हैं। संत गोस्वामी जी महाराज कहते हैं निर्गुण निराकार ब्रह्म सगुण साकार ब्रह्म पर दृष्टांत के साथ भाव स्पष्ट करते हैं। एकु दारुगत,देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेंऊं नामु बड ब्रह्म राम तें। संत गोस्वामी जी भारत देश के विभिन्न क्षेत्र के क्षेत्रीय भाषा के भी भाषाविद् थे । जब निर्गुण निराकार ब्रह्म का दृष्टांत के उल्लेख पर झारखंड प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र के मुण्डारी भाषा शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। एकु दारुगत शब्द मुण्डारी भाषा में लकडी को कहते हैं। यानी निर्गुण निराकार ब्रह्म सूखी लकडी के अंदर अदृश्य अग्नि के सदृश है। जो दिखता नहीं है। सगुण साकार ब्रह्म दो सूखी लकडी के आपस में घर्षण से उत्पन्न प्रकट अग्नि के सदृश्य है। घर्षण से उत्पन्न अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए रुई या सूखे पत्तों के चूर्ण को घर्षण उत्पन्न अग्नि से स्पर्श कराने पर अग्नि अपने साकार रूप में प्रज्वलित हो जाता है। यानी निर्गुण निराकार ही साकार सगुण बन जाता है। दूध के अंदर ही मक्खन होता है। दूध को गर्म कर छांछ और छांछ को मंथने पर मक्खन प्रकट होता है। उसी प्रकार राम नाम के जप से राम के दोनों स्वरुपों का दर्शन होता है। रामनाम जप में वो शक्ति है कि ब्रह्म राम स्वयं ही शामने आ जाते हैं। पृथ्वी पर रावण के अत्याचार से देव ,मुनि, गौ,और गन्धर्व त्रस्त थे। सभी एकत्रित होकर विचार करने पर ब्रह्मा जी के कथनानुसार परमात्मा ही रावण के आतंक से हम सबों को बचा सकते हैं। तब सब अपना अपना मत से परमात्मा के निवास स्थान का बोध कर परमात्मा को खोजने का मत रखते हैं। वहां शंकर जी वंदे बोधमयं नित्यं गुरु शंकर रुपिणं। एकत्रित देव समाज को शंकर जी कहते हैं। हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होंहिं मैं जाना। भगवान इस जग के कण कण में विद्यमान हैं। सभी देवता प्रेम, स्नेह से परमात्मा का नाम से पुकार करते हैं। परमात्मा उनकी स्नेहमयी पुकार सुनकर उनको आश्वस्त करते हैं रावण के आतंक से निश्चय मुक्त करुंगा। गोस्वामी जी स्पष्ट संकेत करते हैं कि निर्गुण और सगुण ब्रह्म को जानना, समझना और प्राप्त करना सहज नहीं हैं पर नाम दोनों को सहज, सरलता के साथ प्राप्त करा देता है। उभय अगम जुग सुगम नाम तें अतएव गोस्वामी जी ब्रह्म राम के दोंनों रुपों से नाम को बडा कहने में संकोच नहीं करते हैं। हम सबों को भी सदा सर्वत्र राम राम स्मरण करते रहना चाहिए। जयश्रीकृष्ण। जय सीताराम। हर हर महादेव।

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