महर्षि वाल्मीकि द्वारा भगवान राम के निवास स्थान का निरूपण

प्रभु प्रसाद सूचि सुभग सुबासा।
सादर जासु लहइ नित नासा।।

तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं।
प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी।
प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।

कर नित करहिं राम पद पूजा।
राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा।।

चरन राम तीरथ चलि जाहीं।
राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा।
पूजहिं तुम्हहिं सहित परिवारा।।

तरपन होम करहिं बिधि नाना।
बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।

तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी।
सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह केँ मन मंदिर बसहु सिय रघुंनदन दोउ।।
(श्रीरामचरितमानस- २ / १२८ / १ – १६; १२९)

भावार्थ-
जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगन्धित (पुष्पादि) सुन्दर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती (सूँघती) हैं, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बडी नम्रता के साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी (आप) के चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी (आप) के तीर्थों में चलकर जातें है; हे रामजी ! आप उनके मन में निवास कीजिये।

जो नित्य आपके (राम- नामरूप) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार (पर्रिकर) सहित आपकी पूजा करते हैं; जो अनेकों प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते है; तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचंद्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो; उन लोगों के मनरूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये।

।। जय भगवान श्री सीताराम ।।



Lord Prasad Suchi Subhag Subasa. Sadar jasu lahai nit nasa।।

I request you to have food. Prabhu Prasad Pat Bhushan Dharahi.

Sis Navahin Sur Guru Dwij Dekhi. Kari Binay Biseshi with love.

Do Ram Pad Puja daily. Trust Ram, not the heart, but others.

Charan Ram Teerath Chali Jahin. Ram dwells in their hearts.

Mantraraju, I chant yours daily. We worship you and your family.

Tarpan Homa Karhin Bidhi Nana. Bipra jewai dehin bahu dana.

You should know more about yourself. Sakal Bhayan Sevhi Sanmani.

May everyone’s wishes become a fruit and rest at the feet of Ram. The temple resides in the heart of the three. (Shri Ramcharitmanas- 2 / 128 / 1 – 16; 129)

gist- Whose nostrils daily receive (smell) the sacred and fragrant (flowerbed) beautiful offerings of the Lord (you) with respect, and who eat food after offering it to you and wear clothes and ornaments in the form of your offerings;

Whose heads bow with great humility and love after seeing Gods, Gurus and Brahmins; Whose hands daily worship the feet of Shri Ramchandraji (Aap), and whose heart has faith in Shri Ramchandraji (Aap) only, no one else and whose feet go to the holy places of Shri Ramchandraji (Aap); O Lord Rama ! You reside in their mind.

Those who daily chant your (Ram- Namrup) Mantraraja and worship you along with their family (Parrikar); Those who perform tarpan and havan in many ways, and give a lot of donations by providing food to Brahmins; And those who respect the Guru with all their heart, considering him greater (bigger) than you in the heart, and by doing all these deeds, the only result they ask for is that we should have love at the feet of Shri Ramchandraji; You two, who brought joy to Sitaji and Raghukul, resided in the temples of those people’s imagination.

, Jai Lord Shri Sitaram.

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