रामचरितमानस

प्रभु श्रीराम का सौंदर्य वर्णनातीत है।
प्रसंग –


यह प्रसंग उस अवसर का है , जब राजा जनक के पुष्प-वाटिका में अपने गुरु के पूजन हेतु पुष्प संकलन के लिए श्रीराम एवं लक्ष्मण आए हुए हैं। उसी अवसर पर सखियों सहित जानकी जी भी अपनी माता की आज्ञा से गौरी (पार्वती) देवी की पूजा करने आई हैं।

एक सखी श्रीराम एवं लक्ष्मण को देखती है और प्रेम में विह्वल होकर सीता के पास आती है। तब सखियां पूछती हैं कि अपनी प्रसन्नता का कारण बताओ।
तब वह सखी कहती है –
स्याम गौर किमि कहौं बखानी।
गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।
अर्थ – वे (श्रीराम तथा लक्ष्मण) सांवले और गोरे रंग के हैं। उनके सौंदर्य को मैं कैसे बखान कर कहूं ? वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों की वाणी नहीं है।

निहितार्थ – आइए ! इस वचन के भाव-सागर में डूबने का प्रयास करें।
जिनके भीतर ज्ञान-प्रवणता होती है, वे ज्ञान योग के माध्यम से प्रभु की उपासना करते हैं। जिनमें कर्म – प्रवणता होती है , वे कर्मयोग का सहारा लेते हैं और जिनमें भाव-प्रवणता होती है , वे भक्तियोग के पथ पर चल पड़ते हैं । तुलसीदास जी भक्ति-भाव से ओतप्रोत हैं।
उन्हें अपने परम आराध्य-देव श्रीराम में ही सर्वाधिक सौंदर्य की अनुभूति होती है। एक सखी के माध्यम से इस सौंदर्य-भाव की अभिव्यक्ति तुलसीदास कराने का प्रयास करते हैं।

यहां पर तुलसीदास जी ने मनुष्य के ज्ञानेंद्रियों की सीमा को व्यक्त किया है। एक ज्ञानेंद्रिय दूसरे ज्ञानेंद्रिय का कार्य नहीं कर सकती। हम जो अनुभव करते हैं , वे सभी वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं कर पाते।
उदाहरण के लिए केवल मिठास को ही लें। मिठास को व्यक्त करने के लिए हमारे पास एक ही शब्द है , वह है – मीठा। चाहे हम रसगुल्ला का स्वाद लें ,चाहे गुड़ का स्वाद लें या चाहे पके हुए जामुन का स्वाद लें और कोई हमसे पूछे कि उसका स्वाद कैसा है ? तो हम कहते हैं – मीठा है। तीनों के मिठास के अंतर को स्पष्ट करने के लिए हमारे पास अलग – शब्द नहीं हैं। जब हम उस मिठाई विशेष को खिलाते हैं , तभी उसके स्वाद का पता चलता है अन्यथा नहीं। किसी भी वस्तु के स्वाद को हम वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते , जबकि वाणी और स्वाद दोनों का स्रोत एक ही होता है – मुख।

यहां तो और भी विचित्र बात है। दृश्य का अवलोकन आंखें करती हैं , सौंदर्य की अनुभूति मन करता है और उसे व्यक्त करने का प्रयास वाणी करती है। वाणी केवल उस सौंदर्य के प्रति व्यक्ति की उत्सुकता को बढ़ावा देती है ताकि वह अपने नेत्रों से सौंदर्य का पान कर सके। प्रकृति के सौंदर्य का ही वर्णन करने में वाणी असमर्थ है , फिर परम-सत्ता प्रभु श्रीराम के सौंदर्य की अभिव्यक्ति कोई कैसे कर सकता है ? – इस भाव की ओर तुलसीदास जी हम सभी का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं।
मिथिलेश ओझा की ओर से आपको नमन एवं वंदन ।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

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