रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ।।
(श्रीरामचरितमानस से)

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सोरठा-
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

भावार्थ-
मैं पवनकुमार श्री हनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्निरूप हैं, जो ज्ञान की घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवन में धनुष-बाण धारण किए श्री रामजी निवास करते हैं।

चौपाई-
कपिपति रीछ निसाचर राजा।
अंगदादि जे कीस समाजा।।

बंदउँ सब के चरन सुहाए।
अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।

भावार्थ-
वानरों के राजा सुग्रीवजी, रीछों के राजा जाम्बवानजी, राक्षसों के राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितना वानरों का समाज है, सबके सुंदर चरणों की मैं वदना करता हूँ, जिन्होंने अधम (पशु और राक्षस आदि) शरीर में भी श्री रामचन्द्रजी को प्राप्त कर लिया।

रघुपति चरन उपासक जेते।
खग मृग सुर नर असुर समेते।।

बंदउँ पद सरोज सब केरे।
जे बिनु काम राम के चेरे।।

भावार्थ-
पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुर समेत जितने श्री रामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो श्री रामजी के निष्काम सेवक हैं।

सुक सनकादि भगत मुनि नारद।
जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।

प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा।
करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।

भावार्थ-
शुकदेवजी, सनकादि, नारदमुनि आदि जितने भक्त और परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरती पर सिर टेककर उन सबको प्रणाम करता हूँ, हे मुनीश्वरों! आप सब मुझको अपना दास जानकर कृपा कीजिए।

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।

ताके जुग पद कमल मनावउँ।
जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।

भावार्थ-
राजा जनक की पुत्री, जगत की माता और करुणा निधान श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकीजी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ।

पुनि मन बचन कर्म रघुनायक।
चरन कमल बंदउँ सब लायक।।

राजीवनयन धरें धनु सायक।
भगत बिपति भंजन सुखदायक।।

भावार्थ-
फिर मैं मन, वचन और कर्म से कमलनयन, धनुष-बाणधारी, भक्तों की विपत्ति का नाश करने और उन्हें सुख देने वाले भगवान् श्री रघुनाथजी के सर्व समर्थ चरण कमलों की वन्दना करता हूँ।

दोहा-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअ भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।

भावार्थ-
जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जल की लहर के समान कहने में अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तव में अभिन्न (एक) हैं, उन श्री सीतारामजी के चरणों की मैं वंदना करता हूँ, जिन्हें दीन-दुःखी बहुत ही प्रिय हैं।

।। जय सियाराम जय महावीर हनुमान ।।



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Soratha- Pranavu Pawankumar Khal Ban Pavak Gyan Ghan. Jasu hridaya agar agar bashin ram sir chap dhar.

gist- I bow to Pawankumar Shri Hanumanji, who is in the form of fire to destroy the forest of evil, who is the embodiment of knowledge and in whose heart-shaped palace resides Shri Ramji wearing a bow and arrows.

Chaupai- Kapipati bear, nocturnal king. What kind of society is Angadadi?

I worship the feet of all. Adham sarir ram jinh paaye.

gist- I worship the beautiful feet of the monkey king Sugrivaji, the bear king Jambavanji, the demon king Vibhishanaji and Angadji, as well as the society of monkeys, who have attained Shri Ramchandraji even in the inferior (animal and demon) bodies.

Raghupati Charan worshiper won. Khag mrig sur nar asur along with.

Bandaun pad saroj sab kare. Je binu kam ram ke chere.

gist- I worship the lotus feet of all the worshipers of Shri Ramji’s feet including animals, birds, gods, humans, demons, who are selfless servants of Shri Ramji.

Suk Sanakadi Bhagat Muni Narad. J Munibar Bigyan Bisarad.

Everything is earth and lead. Please please Janaani Munisa.

gist- I bow my head to the earth and pay my respects to all the devotees and highly knowledgeable sages like Shukdevji, Sankadi, Naradmuni etc., oh sages! All of you please consider me as your servant.

Janakasuta Jag Janani Janaki. of the most dear and merciful.

So that I can celebrate the lotus feet of the world. May I get a pure mind by your detective’s grace.

gist- I celebrate both the lotus feet of Shri Janakiji, the daughter of King Janak, the mother of the world and the beloved of Shri Ramchandra ji, by whose grace I may attain a pure mind.

Again mind words deeds Raghunayak. I worship the lotus feet of all.

Rajeevnayan Dharan Dhanu Saik. Bhagat Bipati Bhanjan is soothing.

gist- Then, through my mind, words and deeds, I worship the all-powerful lotus feet of Lord Shri Raghunathji, who has the lotus eyes, who has the bow and arrow, who destroys the troubles of the devotees and gives them happiness.

Doha- Gira artha jal bichi sam kahia bhinn na bhinn. I worship the feet of Sita Rama who is the most dear to me.

gist- I worship the feet of Shri Sitaramji, who is different in speech and its meaning and speaking like water and waves of water, but in reality are one and the same, who is very dear to the poor and the sad.

, Jai Siyaram Jai Mahavir Hanuman.

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