श्री रामचरितमानस नाम-नामी प्रकरण नाम एवं रूप



गोस्वामी तुलसीदास जी ” नाम-नामी प्रकरण ” के अंतर्गत नाम एवं रूप की चर्चा करते हुए कहते हैं –
को बड़ छोट कहत अपराधू।
सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू।।
सरलार्थ – नाम और रूप में कौन बड़ा है तथा कौन छोटा है ? – यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे।

निहितार्थ – अब तुलसीदास जी केवल ” नाम ” शब्द को पकड़ते हैं और कहते हैं कि किसी व्यक्ति / वस्तु का नाम लेने से ही उसका रूप स्वत: अपने मानस-पटल पर अंकित हो जाता है। और रूप तो वास्तव में नामी का ही रहता है। अर्थात् नामी के रूप का दर्शन भी ” नाम ” करा देता है। तथापि तुलसीदास जी रूप एवं नाम दोनों के सूक्ष्म भेद को सज्जनों के समझ पर ही छोड़ देते हैं।

इसके पश्चात् इसी तथ्य को और स्पष्ट रूप से समझाते हुए भक्त तुलसीदास जी लिखते हैं –
देखिअहिं रूप नाम आधीना।
रूप ज्ञान नहीं नाम बिहीना।।
सरलार्थ – रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं। नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो पाता।

निहितार्थ –
किसी व्यक्ति / वस्तु का रूप सामने हो , फिर भी यदि हम उसका नाम नहीं जानते हैं , तो हम उसे पहचान नहीं पाते।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी का है। जब एक सज्जन उनसे मिलने के लिए स्टेशन पर उतरे और अपने सूटकेस को ले जाने के लिए एक व्यक्ति को बुलाया। वह व्यक्ति उसके सूटकेस को लेकर स्टेशन के बाहर चल पड़ा। जब उस सज्जन से पूछा गया कि कहां जाना है ? तो उसने कहा कि मुझे ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी से मिलना है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी ही उसके सामान को ढो रहे थे। जब ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी ने कहा कि मैं ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर हूं। तो वह सज्जन बड़े लज्जित हुए और विद्यासागर जी के चरणों पर गिर पड़े। नाम न जानने के कारण सामने खड़े विद्यासागर जी को भी वह सज्जन पहचान नहीं पाए। इसका कारण यह था कि रूप तो सामने था , पर वह रूप जिस व्यक्ति था, उसका नाम नहीं मालूम था।

रामचरितमानस में इसका सुंदर उदाहरण तुलसीदास जी ने प्रस्तुत किया है।
किष्किन्धाकाण्ड के अंतर्गत जब हनुमान जी श्री राम – लक्ष्मण के पास पहुंचे , तो उन्हें पहचान नहीं पाए , जबकि श्री राम एवं लक्ष्मण साक्षात् उनके सामने प्रकट थे। यदि हनुमानजी रूप देखकर पहचान गए होते , तो यह प्रश्न नहीं करते –
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा।
छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।
जब श्री रामजी ने कहा –
नाम राम लछिमन दोउ भाई।।
जब श्री रामजी ने नाम बताया , तब हनुमानजी पहचान पाए और जैसे ही पहचाना , वैसे ही उनके चरणों पर गिर पड़े – प्रभु पहचानि परेउ गहि चरना।।

इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्ति के प्रत्यक्ष सामने रहने पर भी नाम न जानने के कारण हम उन्हें पहचान नहीं पाते। इसका तात्पर्य यह है कि रूप के प्रत्यक्ष रहते हुए भी नाम आवश्यक है।
मिथिलेश ओझा की ओर से आपको नमन एवं वंदन।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।



Goswami Tulsidas ji, while discussing the name and form under “Naam-Nami episode”, says – Calling it very small is a crime. Listen Gun Bhedu Samujhihi Sadhu. Meaning – Who is bigger and who is smaller in name and form? – Saying this is a crime. The sages themselves will understand the harmony of their qualities after hearing them.

Implication – Now Tulsidas ji only catches the word “name” and says that by taking the name of a person/thing, its form automatically gets imprinted on one’s mind. And the form actually remains that of Nami. That is, seeing the form of Nami also makes one “name”. However, Tulsidas ji leaves the subtle differences between form and name to the understanding of the gentlemen.

After this, explaining this fact more clearly, devotee Tulsidas ji writes – See, the name of the form is Aadhina. No knowledge of form, no name. Saralartha – seen under the name form. Without name, form cannot be known.

Implications – Even if the form of a person/thing is in front of us, if we do not know its name, we are not able to recognize it. The best example of this is that of Ishwarchandra Vidyasagar ji. When a gentleman came down to the station to meet him and called a person to carry his suitcase. The man took his suitcase and walked out of the station. When that gentleman was asked where to go? So he said that I have to meet Ishwarchandra Vidyasagar ji. Ishwarchandra Vidyasagar ji was carrying his luggage. When Ishwar Chandra Vidyasagar ji said that I am Ishwar Chandra Vidyasagar. So that gentleman felt very ashamed and fell at the feet of Vidyasagar ji. Due to not knowing the name, that gentleman could not even recognize Vidyasagar ji standing in front. The reason for this was that the form was visible, but the name of the person who had that form was not known.

Tulsidas ji has presented a beautiful example of this in Ramcharitmanas. When Hanuman ji reached Shri Ram and Lakshman during the Kishkindhakand, he could not recognize them, even though Shri Ram and Lakshman were personally visible in front of him. If Hanumanji had recognized his appearance, he would not have asked this question – To you Syamal Gaur Sarira. I again became a bear in the form of an umbrella. When Shri Ramji said – Name Ram Lachiman Dou Bhai. When Shri Ramji told the name, then Hanumanji was able to recognize it and as soon as he recognized it, he fell at his feet – Prabhu Pahinidhi Pareu Gahi Charana.

In this way we see that even if a person is in front of us, we are not able to recognize him due to not knowing his name. This means that the name is necessary even if the form is evident. Salutations and salutations to you from Mithilesh Ojha. , Shri Ram Jai Ram Jai Jai Ram.

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