स्त्रीके सहवाससे भक्तका पतन

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भक्त ब्राह्मण श्रीविप्रनारायण भक्तपदरेणुने वेदाध्ययन करनेके उपरान्त अपना जीवन भगवान् श्रीरङ्गनाथके वरणोंमें अर्पित कर दिया। मन्दिरके चारों और एक वगाँचा लगाया। प्रातःकाल ही वे उसके पुष्प उतारते और हार बनाकर भगवान्‌को अर्पित करनेके लिये नियमसे देते। स्वयं एक वृक्षके नीचे साधारण झोपड़ी में रहते। मन्दिरका प्रसाद पाकर शरीर निर्वाह करते हुए भगवान्का स्मरण तथा नाम जप करते रहते। उन्हें जगत्की कोई सुधि नहीं रहती। शेषशय्यापर भगवान्‌को शयन करते देखकर उनका शरीर प्रेमसे शिथिल हो जाया करता था।

किंतु भगवान् बड़े विलक्षण हैं। वे अपने प्रियजनोंकी परीक्षा कब किस प्रकार लेते हैं, कहा नहीं जाता। श्रीरङ्गनाथजीके मन्दिरमें एक अत्यन्त लावण्यवती देवदासी रहती थी, जिसके सौन्दर्यपर स्वयं राजा मुग्ध थे। उसका नाम देवदेवी था। एक दिन वह अपनी छोटी बहिनके साथ वाटिकामें घूमते हुए श्रीविप्रनारायणके समीपसे निकली; किंतु उसने देखा कि उक्त साधारण ब्राह्मणने उसकी ओर दृष्टितक नहीं डाली। उसके मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। अपनी बहिनसे उसने कहा- ‘देखो, मेरे रूपपर स्वयं नरेश मुग्ध हैं, पर यह अहंकारवश मेरों ओर देख भी नहीं रहा है। बहिनने उत्तर दिया ‘नहीं बहिन, जिन्होंने अपना जीवन भुवनमोहन परमेश्वरको अर्पित कर दिया है, उन्हें जगत्‌का कोई रूप अपनी और आकर्षित करनेमें सफल नहीं होता।’ देवदेवीने माभिमान कहा—’यदि छः मासमें इसे मैं अपना दास नहीं बना लूँ, अपने पीछे-पीछे नहीं घुमा दूँ तो छः मामतक तुम्हारी दासी होकर रहूँगी।’ छोटी बहिनने भी कह दिया- ‘यदि तुमने इसपर अपना प्रभाव डाल दिया | छः मासतक मैं तुम्हारी दासीकी भाँति सेवा करूंगी।’ – दोनों बहिनों में होड़ लग गयी।

एक दिन देवदेवीने संन्यासिनीके वेषमें आकर विनारायणसे अत्यन्त करुण स्वरमें कहा-‘महाराज! मेरी मुझे अपना धर्म बेचनेके लिये विवश कर रही है, इस कारण भागकर मैंने यह वेप अपनाया है।मैंने किया है कि अपना जीवन भगवा चरणोंमें अर्पित कर दूंगी। मुझे कहाँ आश्रय नहीं। आप कृपापूर्वक अपनी झोपड़ीके बाहर रहने की आज्ञा मुझे दें। मैं आपकी झोपड़ी में प्रवेश नहीं करूँगी और भगवानकी सेवा करती हुई अपना जीवन सफल कर लूँगी। आपने इतनी कृपा नहीं की तो मेरा जीवन नरकगामी बन जायगा।’

सरल ब्राह्मण देवदेवीकी कटारीको नहीं समझ सके। उन्होंने उसे अनुमति दे दी। देवदेवी यहाँ रहने लगी।

एक बारकी बात है, मापका महीना था। वर्षा हो रही थी। शीत समीर तेज छुरीकी भाँति शरीरको जैसे काट रहा था देवदेवी जलसे भीग गयी थी। गीली साड़ी में वह काँप रही थी। विप्रनारायणका करुण हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने उसे भीतर आनेकी आज्ञा दे दी और सूखा वस्त्र पहननेके लिये दिया।

एकान्तमें स्त्री-पुरुषको नहीं मिलना चाहिये। कन्या, बहिन और युवती माताके साथ भी एकान्तमें रहनेकी शास्त्र आज्ञा नहीं देते। देवदेवीका जादू चल गया। वह विप्रनारायणको पराजित करनेमें सफल रही। विप्रनारायणका मन भगवान् के चिन्तनसे हटकर मानवी वेश्याका चिन्तन करने लगा।

देवदेवी वहाँसे चली गयी। विप्रनारायण उसके घर जाने लगे। वे उसके यहाँ जाते नियमित रूपसे। धीरे धीरे उसने विप्रनारायणकी समस्त सम्पत्ति हड़प ली। इनके पास कुछ नहीं रहा। धनलुब्धा वेश्या फिर इन्हें कैसे पूछती उसने दुतकार दिया ये अधीर रहने लगे। देवदेवीके बिना इन्हें कुछ अच्छा नहीं लगता था। कई दिन बीत गये।

“यह सोनेका थाल ले लो, विप्रनारायणने भेजा है। मैं उनका नौकर हूँ।’ आवाज सुनकर देवदेवीने द्वार खोला और सोनेका थाल पाकर वह बड़ी प्रसन्न हुई उसने तुरंत विप्रनारायणको बुलवाया। विप्रनारायणकी प्रसन्नताका क्या कहना। दौड़े उसके घरकी ओर। दूसरे दिन हल्ला हुआ, भगवान् श्रीरङ्गनाथकीस्वर्ण चाली नहीं मिल रही है। गुप्तचर फैले। देवदेवी पकड़ी गयी। उसने बताया- ‘विप्रनारायणका नौकर मुझे दे गया। विप्रनारायणने निवेदन किया- ‘मुझ दरिद्र के पास नौकर कहाँसे आया।’

चोरीका माल स्वीकार करनेके कारण देवदेवीको राज्यकी ओरसे दण्ड दिया गया और विप्रनारायणको निगलापुरीके राजाने हिरासत में रखा। उनका विश्वास था कि विप्रनारायणजी भक्त हैं, इस प्रकारका कर्म इनसे कैसे सम्भव हुआ?

राजाको रात्रिमें स्वप्न हुआ, ‘नौकरके वेशमें देवदेवीको थाली दे आनेका काम मैंने किया था। विप्रनारायण बहक गया था। अब उसे मुक्त कर दो, जिससे जाकर मेरे भजनमें लग सके।’ राजाने सबेरे ही बड़े आदरसे विप्रनारायणको छोड़ दिया।

इस घटनासे विप्रनारायणके ज्ञाननेत्र खुल गये । उनका हृदय पश्चात्तापकी आगसे जल उठा। वे भगवान्‌के चरणोंमें गिरकर रोने लगे। अत्यन्त करुण शब्दों मेंउन्होंने कहा—‘प्रभो! मेँ अत्यन्त नीच और पतित हूँ, | तथापि आपने मेरी रक्षा की। मैंने सदाचारको तिलाञ्जलि दी, आपको भूल गया और बाजारकी एक वेश्याके रूपजालमें उलझ गया। अपना विवेक और आपका भजन – सब छोड़ दिया मैंने। प्रभो! तुम्हीं मेरी माता हो, तुम्हीं मेरे पिता हो, तुम्हीं मेरे रक्षक और तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो । अब मुझे तुम्हारी कृपाके सिवा और किसीका भरोसा नहीं है। अब मुझे अपने चरणोंसे किसी प्रकार भी पृथक् मत होने देना, नाथ!’ विप्रनारायणजी रोते रहे, बहुत देरतक रोते रहे

उनका जीवन बदल गया। उन्होंने ‘भक्तपदरेणु’ अपना नाम रखा । निरन्तर वे भगवान्‌के रूपका ध्यान और उनके नामका जप करते रहे। देवदेवीको भी पापसे घृणा हो गयी। वह अपनी सारी सम्पत्ति श्रीरङ्गनाथजीको भेंट करके उनकी सेवामें लग गयी। इस प्रकार श्रीभक्तपदरेणु और देवदेवी दोनोंका ही जीवन प्रभु पाद-पद्मोंमें समर्पित होकर सफल हो गया। -शि0 दु0

भक्त ब्राह्मण श्रीविप्रनारायण भक्तपदरेणुने वेदाध्ययन करनेके उपरान्त अपना जीवन भगवान् श्रीरङ्गनाथके वरणोंमें अर्पित कर दिया। मन्दिरके चारों और एक वगाँचा लगाया। प्रातःकाल ही वे उसके पुष्प उतारते और हार बनाकर भगवान्‌को अर्पित करनेके लिये नियमसे देते। स्वयं एक वृक्षके नीचे साधारण झोपड़ी में रहते। मन्दिरका प्रसाद पाकर शरीर निर्वाह करते हुए भगवान्का स्मरण तथा नाम जप करते रहते। उन्हें जगत्की कोई सुधि नहीं रहती। शेषशय्यापर भगवान्‌को शयन करते देखकर उनका शरीर प्रेमसे शिथिल हो जाया करता था।
किंतु भगवान् बड़े विलक्षण हैं। वे अपने प्रियजनोंकी परीक्षा कब किस प्रकार लेते हैं, कहा नहीं जाता। श्रीरङ्गनाथजीके मन्दिरमें एक अत्यन्त लावण्यवती देवदासी रहती थी, जिसके सौन्दर्यपर स्वयं राजा मुग्ध थे। उसका नाम देवदेवी था। एक दिन वह अपनी छोटी बहिनके साथ वाटिकामें घूमते हुए श्रीविप्रनारायणके समीपसे निकली; किंतु उसने देखा कि उक्त साधारण ब्राह्मणने उसकी ओर दृष्टितक नहीं डाली। उसके मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। अपनी बहिनसे उसने कहा- ‘देखो, मेरे रूपपर स्वयं नरेश मुग्ध हैं, पर यह अहंकारवश मेरों ओर देख भी नहीं रहा है। बहिनने उत्तर दिया ‘नहीं बहिन, जिन्होंने अपना जीवन भुवनमोहन परमेश्वरको अर्पित कर दिया है, उन्हें जगत्‌का कोई रूप अपनी और आकर्षित करनेमें सफल नहीं होता।’ देवदेवीने माभिमान कहा—’यदि छः मासमें इसे मैं अपना दास नहीं बना लूँ, अपने पीछे-पीछे नहीं घुमा दूँ तो छः मामतक तुम्हारी दासी होकर रहूँगी।’ छोटी बहिनने भी कह दिया- ‘यदि तुमने इसपर अपना प्रभाव डाल दिया | छः मासतक मैं तुम्हारी दासीकी भाँति सेवा करूंगी।’ – दोनों बहिनों में होड़ लग गयी।
एक दिन देवदेवीने संन्यासिनीके वेषमें आकर विनारायणसे अत्यन्त करुण स्वरमें कहा-‘महाराज! मेरी मुझे अपना धर्म बेचनेके लिये विवश कर रही है, इस कारण भागकर मैंने यह वेप अपनाया है।मैंने किया है कि अपना जीवन भगवा चरणोंमें अर्पित कर दूंगी। मुझे कहाँ आश्रय नहीं। आप कृपापूर्वक अपनी झोपड़ीके बाहर रहने की आज्ञा मुझे दें। मैं आपकी झोपड़ी में प्रवेश नहीं करूँगी और भगवानकी सेवा करती हुई अपना जीवन सफल कर लूँगी। आपने इतनी कृपा नहीं की तो मेरा जीवन नरकगामी बन जायगा।’
सरल ब्राह्मण देवदेवीकी कटारीको नहीं समझ सके। उन्होंने उसे अनुमति दे दी। देवदेवी यहाँ रहने लगी।
एक बारकी बात है, मापका महीना था। वर्षा हो रही थी। शीत समीर तेज छुरीकी भाँति शरीरको जैसे काट रहा था देवदेवी जलसे भीग गयी थी। गीली साड़ी में वह काँप रही थी। विप्रनारायणका करुण हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने उसे भीतर आनेकी आज्ञा दे दी और सूखा वस्त्र पहननेके लिये दिया।
एकान्तमें स्त्री-पुरुषको नहीं मिलना चाहिये। कन्या, बहिन और युवती माताके साथ भी एकान्तमें रहनेकी शास्त्र आज्ञा नहीं देते। देवदेवीका जादू चल गया। वह विप्रनारायणको पराजित करनेमें सफल रही। विप्रनारायणका मन भगवान् के चिन्तनसे हटकर मानवी वेश्याका चिन्तन करने लगा।
देवदेवी वहाँसे चली गयी। विप्रनारायण उसके घर जाने लगे। वे उसके यहाँ जाते नियमित रूपसे। धीरे धीरे उसने विप्रनारायणकी समस्त सम्पत्ति हड़प ली। इनके पास कुछ नहीं रहा। धनलुब्धा वेश्या फिर इन्हें कैसे पूछती उसने दुतकार दिया ये अधीर रहने लगे। देवदेवीके बिना इन्हें कुछ अच्छा नहीं लगता था। कई दिन बीत गये।
“यह सोनेका थाल ले लो, विप्रनारायणने भेजा है। मैं उनका नौकर हूँ।’ आवाज सुनकर देवदेवीने द्वार खोला और सोनेका थाल पाकर वह बड़ी प्रसन्न हुई उसने तुरंत विप्रनारायणको बुलवाया। विप्रनारायणकी प्रसन्नताका क्या कहना। दौड़े उसके घरकी ओर। दूसरे दिन हल्ला हुआ, भगवान् श्रीरङ्गनाथकीस्वर्ण चाली नहीं मिल रही है। गुप्तचर फैले। देवदेवी पकड़ी गयी। उसने बताया- ‘विप्रनारायणका नौकर मुझे दे गया। विप्रनारायणने निवेदन किया- ‘मुझ दरिद्र के पास नौकर कहाँसे आया।’
चोरीका माल स्वीकार करनेके कारण देवदेवीको राज्यकी ओरसे दण्ड दिया गया और विप्रनारायणको निगलापुरीके राजाने हिरासत में रखा। उनका विश्वास था कि विप्रनारायणजी भक्त हैं, इस प्रकारका कर्म इनसे कैसे सम्भव हुआ?
राजाको रात्रिमें स्वप्न हुआ, ‘नौकरके वेशमें देवदेवीको थाली दे आनेका काम मैंने किया था। विप्रनारायण बहक गया था। अब उसे मुक्त कर दो, जिससे जाकर मेरे भजनमें लग सके।’ राजाने सबेरे ही बड़े आदरसे विप्रनारायणको छोड़ दिया।
इस घटनासे विप्रनारायणके ज्ञाननेत्र खुल गये । उनका हृदय पश्चात्तापकी आगसे जल उठा। वे भगवान्‌के चरणोंमें गिरकर रोने लगे। अत्यन्त करुण शब्दों मेंउन्होंने कहा—‘प्रभो! मेँ अत्यन्त नीच और पतित हूँ, | तथापि आपने मेरी रक्षा की। मैंने सदाचारको तिलाञ्जलि दी, आपको भूल गया और बाजारकी एक वेश्याके रूपजालमें उलझ गया। अपना विवेक और आपका भजन – सब छोड़ दिया मैंने। प्रभो! तुम्हीं मेरी माता हो, तुम्हीं मेरे पिता हो, तुम्हीं मेरे रक्षक और तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो । अब मुझे तुम्हारी कृपाके सिवा और किसीका भरोसा नहीं है। अब मुझे अपने चरणोंसे किसी प्रकार भी पृथक् मत होने देना, नाथ!’ विप्रनारायणजी रोते रहे, बहुत देरतक रोते रहे
उनका जीवन बदल गया। उन्होंने ‘भक्तपदरेणु’ अपना नाम रखा । निरन्तर वे भगवान्‌के रूपका ध्यान और उनके नामका जप करते रहे। देवदेवीको भी पापसे घृणा हो गयी। वह अपनी सारी सम्पत्ति श्रीरङ्गनाथजीको भेंट करके उनकी सेवामें लग गयी। इस प्रकार श्रीभक्तपदरेणु और देवदेवी दोनोंका ही जीवन प्रभु पाद-पद्मोंमें समर्पित होकर सफल हो गया। -शि0 दु0

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