सार्थक जीवन

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सार्थक जीवन

हरी घासके बीच एक सूखी घासका तिनका पड़ा था। उसे देखकर हरी घास तिनकेके निष्क्रिय, अर्थहीन जीवनपर खिलखिलाकर हँस पड़ी और हँसते-हँसते वह उससे कहने लगी, ‘अरे। सूखे रसहीन तिनके, तेरा हम हरे-भरोंके बीचमें क्या काम ?’
हरी घासका यह ताना सुनकर सूखे तिनकेको अपने रसहीन जीवनपर अफसोस होने लगा और वह उदास हो गया। तभी तेज हवाका झोंका आया। हरी घास उसमें झूमने लगी। परंतु सूखा तिनका फुर्रसे उड़कर पासमें स्थित एक पानीके हौजमें जा गिरा। उस हौजके पानीमें एक चींटी अपनी जिंदगी बचानेके लिये मौतसे लड़ रही थी कि अचानक उसके सामने वह सूखा तिनका आ गया।
चींटी फौरन उस तिनकेको पकड़कर उसपर बैठ गयी। थोड़ी देरमें उस तिनकेके सहारे वह किनारेपर आ गयी और हौजकी दीवारपर चढ़ गयी। अपनी जान बच जानेपर चींटीने उस सूखे तिनकेको बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। इसपर तिनका बोला, ‘धन्यवाद तो आपका है, जिसने मेरे अर्थहीन जीवनका अर्थ मुझे समझा दिया।’

meaningful life
A straw of dry grass was lying among the green grass. Seeing him, the green grass laughed gleefully at the idle, meaningless life of the straw, and laughingly she said to him, ‘Hey! Dry, tasteless straws, what is your use in the midst of us greenery?’
its death to save its life in the water of that tank when suddenly that dry straw appeared in front of it.
The ant immediately grabbed that straw and sat on it. In a short while, with the help of that straw, she came to the shore and climbed on the wall of the tank. The ant thanked the dry straw for saving its life. To this Tinka said, ‘Thanks to you, who made me understand the meaning of my meaningless life.’

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