नमो राघवाय भगवान राम को प्रणाम ।।

।। नमो राघवाय ।।

अनन्तकोटिब्रह्माण्ड-नायक, भगवान् सर्वान्तरात्मा, सर्वशक्तिमान् की भृकुटि के संकेतमात्र से उनकी मायाशक्ति विश्वप्रपञ्च का सर्जन, पालन तथा संहार करती है। जैसे अयस्कान्त (चुम्बक) के सांनिध्य से लौह में हलचल होती है, वैसे ही भगवान् के सांनिध्य मात्र से मायाशक्ति को चेतना प्राप्त होती है।

जैसे झरोखों में सूर्य-किरणों के सहारे निरन्तर परिभ्रमण करते हुए अपरिगणित त्रसरेणु दिखाई देते हैं, वैसे ही प्रकृतिपारदृश्वा लोकोत्तर-पुरुष-धैरियों को भगवान् के सन्निधान में अनन्त विश्व दिखाई देते हैं-

यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि,
जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति।।

भगवान् अपने परमार्थिक रूप से निराकार, निर्विकार, निष्कल, निरीह, निर्गुण होते हुए भी मायाशक्ति-युक्तरूप से अनादिबद्ध, स्वांशभूत जीवों पर कृपा करके उनके कल्याणार्थ विश्व के सर्जन एवं संहारादि लीलाओं में प्रवृत होते हैं। मनीषी बड़े कुतूहल से सकल विरुद्ध धर्माश्रय भगवान् के इस कौतुक को देखकर कहते हैं-

त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान्विभो
वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात्।
त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुद्ध्यते
त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते तथा।।

अर्थात्, हे नाथ ! विज्ञजन निर्गुण, निरीह, अविक्रिय से ही इस विविध वैचित्र्योपेत विश्व का जन्म, स्थिति तथा संहार बतलाते हैं। भला जो निरीह तथा सर्वथा निष्क्रिय है वही निरन्तर चाञ्चल्यपूर्ण विश्व की सृष्टि करनेवाला है- यह कैसे ?

परंतु भगवान् के ईश्वर तथा ब्रह्म इन दो रूपों में इन विरुद्ध धर्म के सामञ्जस्य होने में कोई भी आपत्ति नहीं है। मायायुक्त ऐश्वररूप में विश्वनिर्माण के उपयुक्त निखिल क्रियाएँ हैं, परंतु मायारहित ब्रह्मरूप में निरी निरीहता एवं निष्क्रियता ही है।

अर्थात् मायाशक्ति के सहारे होनेवाले समस्त व्यवहारों का मायाधिष्ठान, स्वप्रकाश, विशुद्ध ब्रह्म में उपचार होता है। अस्तु, वही व्यापक ब्रह्म निरञ्जन, निर्गुण, विगत-विनोद, भक्तप्रेमवश श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूप में श्रीकौसल्याम्बा के मंगलमय अंग में व्यक्त होता है।

।। श्री रामाय नमः ।।



।। Namo Raghavaya.

With the mere gesture of the eyebrow of the Lord, the Supreme Soul, the Almighty, the leader of the infinite millions of universes, His illusory power creates, maintains and destroys the universe. Just as the presence of a magnet causes iron to stir, so the mere presence of God gives consciousness to the illusory power.

Just as innumerable trasarenu are visible in the windows, constantly roaming with the help of sun-rays, similarly the worldly-purush-bearers who are in the company of God see the infinite world in the presence of God-

in the presence of which it is like magnetic iron, They are always moving around in the world.

The Lord, though supremely formless, unchanging, pure, devoid of qualities, is engaged in the creation and destruction of the world for their welfare by showing mercy to the eternally bound, self-contained beings in the form of illusory power. The sage, with great curiosity, observes this curiosity of the Lord, who is opposed to all religions, and says:

From you, O Lord, are the restraints of his birth and state They say that it is from the quality of non-existence and from the reaction. It is contrary to us in You, the Lord, the Brahman It is treated as such because it depends on you.

That is, O Lord! The experts explain the birth, position and destruction of this various peculiar world from the Nirguna, Niriha, Avikriya. Well, the One who is helpless and totally inactive is the one who creates the constantly moving world- how is this?

But there is no objection to the harmony of opposite religion in these two forms of God, Ishwar and Brahman. In the Maya-yukt form of God, there are perfect activities suitable for world-building, but in the form of Maya-free Brahma, there is nothingness and inaction.

That is, all behaviors that are supported by the power of illusion are treated in the illusory abode, self-illumination, pure Brahman. So, the same pervasive Brahman, Niranjan, Nirguna, Vigata-Vinod, manifests Himself in the auspicious limb of Sri Kausalyamba in the form of Srimad Raghavendra Ramachandra out of devotional love.

।। Ome Sri Ramaya Namah ।।

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