
संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा 2
एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे

एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके मांगलिक कार्य

एक बुढ़िया माई थी। मिट्टी के गणेश जी की पूजा करती थी। रोज बनाए रोज गल जाए। एक सेठ का

एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आये। श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थी। छोटे छोटे बर्तनों में

“अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।”(श्रीमद्भगवद्गीता, ८/१४) “हे अर्जुन! जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण

एक निकुंज में कान्हा जी एक पत्र में कुछ लिख रहे हैं, तभी एक गोपी उस वन की ओर आने

बूंदी नगर में रामदासजी नाम के एक बनिया थे, वे व्यापार करने के साथ-साथ भगवान की भक्ति-साधना भी करते थे

ठाकुर जी अपने बाल सखाओं के संग गोपी के घर माखन चोरी करने के उद्देश्य से गए। गोपी अपनी चौखट

एक बार अर्जुन ने कृष्ण से पूछा-माधव.. ये ‘सफल जीवन’ क्या होता है ? कृष्ण अर्जुन को पतंग उड़ाने ले

दक्षिण भारत से किसी समय एक कृष्ण भक्त वैष्णव साधु वृंदावन की यात्रा के लिए आए थे । एक बार