तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ।।
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।। भावार्थ-जैसे कोई नट (खेल करने
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।। भावार्थ-जैसे कोई नट (खेल करने

सैर करन को चली गोरा जीनारद मुनि ने दी मती, कहे गोरा जी हमें सुना दो, अमर कथा शिव मेरे

जो सूर्य के उदय और अस्तकाल में दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र के द्वारा भगवान सूर्य की स्तुति करता

हे हिम हेम किरीट शुभ्र शिव,वर निर्झर त्रिपुरारी।कर पन्नग,पन्नग ग्रीवा,सिरवर्द्धमान शशि धारी।। मस्तक मध्य त्रिलोचन शोभित,उर शोभित रघुनायक।वक्ष मुण्ड,कर शूल

रामनवमी के नौ राम, परमात्मा से राजा, पुत्र से पिता और पति तक भगवान राम के नौ रुप जो सिखाते

माता यशोदा वात्सल्य प्रेम की साकार मूर्ति हैं। परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र की नित्यलीला में वे नित्य माता है।
मीरा जब वृंदावन पहुंची तो वृंदावन में जो कृष्ण का सबसे प्रमुख मंदिर था, उसका जो पुजारी था, उसने तीस

राम नाम की महिमा अनंत और अपार है। भगवान राम से भी बड़ा है उनका नाम। भगवान स्वयं भी राम

राधाजी को वृंदावन की “अधीश्वरी”माना जाता है.स्कंद पुराण के अनुसार “राधाजी”भगवान “श्रीकृष्ण” की आत्मा हैं उनकी प्राणशक्ति हैँ.श्रीकृष्ण के बिना
राधे जू की चरित्र का वर्णन करने का सामर्थ्य ना तो ब्रह्मा जी में है,और ना ही श्री शारदा जी