
महा शिवरात्रि
महाशिवरात्रि का व्रत तपस्या, आत्मसंयम और भक्ति का प्रतीक है।मान्यता है कि इस दिन उपवास रखने से नकारात्मक

महाशिवरात्रि का व्रत तपस्या, आत्मसंयम और भक्ति का प्रतीक है।मान्यता है कि इस दिन उपवास रखने से नकारात्मक

ठाकुरजीकी होली लीला बलिहारी प्रभु ठाकुरजी की ये लीला बडी ही मनमोहक है नंदलाल ने सुबह ही टेरकंदब पर अपने

एक गांव के पुराने शिव मंदिर में एक वृद्ध महिला प्रतिदिन झाड़ू लगाती और महादेव की सेवा करती थी। गांव

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ भावार्थ:- श्री रामजी अपार गुणों

और अचानक एक दिन कन्हैया ने चिढ़ कर कहा, यूँ बार बार मइया से शिकायत करोगी तो सबको छोड़ कर

मीराबाई जी यमुना किनारे जल लेकर लौट रही है धीरे-धीरे भाव जगत में खो गयी उनके नेत्र इधर उधर निहार

एक दिन ऎक युवक गुरु की मालिश कररहा था। गुरु की पीठ को मलते हुए उसने स्वगत ही कहा, ‘मंदिर

” जब हनुमान ने सभा के बीच अपना हृदय चीर दिया भक्ति का वह क्षण, जिसने अयोध्या को रुला दिया

ना भाए मोहे बैकुण्ठ, ब्रज की मोहे याद सताए, मन सुमिरे राधा राधा, छोड दाऊ सब राज पाठ, मोहे पुनः

गोपी, एक भाव है, स्थिति है, भक्ति मार्ग की एक अत्यंत उच्च और निर्मल अवस्था है। गोपी भाव का अर्थ